
कुमार प्रशांत
जब भारत की न्यायपालिका के सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत साहब, भारतीय गर्मी से बेहाल अपने 77 न्यायाधीशों की टोली लेकर केंद्रीय कानून मंत्री के शीतल साये में लंदन में छुट्टियां मनाते हुए, बैडमिंटन खेल रहे थे, मध्यप्रदेश में चुनाव आयोग सरकार के साथ मिल कर बैडमिंटन खेल रहा था. नतीजा यह हुआ कि मध्यप्रदेश के किसी चुनाव अधिकारी ने कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन की राज्यसभा की उम्मीदवारी का पर्चा खारिज कर दिया. वे बैठे-बैठे हार गईं. अदालत की मौन सहमति से भारतीय जनता पार्टी के सभी 3 उम्मीदवार बैठे-बैठे जीत गए. यह हमारा नया लोकतंत्र है. फैसला आपको करना है कि आप इस लोकतंत्र के लायक हैं या नहीं.
मध्यप्रदेश में हार कर मीनाक्षीजी की कांग्रेस जब चुनाव आयोग के दरवाजे पहुंची तो उसे बताया गया कि आज दरवाजा बंद है. जब खुलेगा तब आना. एकदम सौ टंच खरा लोकतंत्र है यह ! याद कीजिए, जब बिहार से बंगाल तक करोड़ों मतदाता अपना वोट नहीं डाल सके थे और वे सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पहुंचे तो न्यायालय ने भी यही कहा था : आज न्याय का दरवाजा बंद है. जल्दी क्या है, अगले चुनाव में वोट डाल लेना ! ऐसा समभाव ! नेता आएं कि जनता, दरवाजा बंद है तो बंद है. लोकतंत्र ऐसा ही होना चाहिए- सबके लिए समभाव !
वैसे मीनाक्षीजी और राहुल गांधी की कांग्रेस को यह पहचानना चाहिए कि वे दोनों हार तो तभी गए थे जब उन्हें अपने 62 विधायकों को हवाई जहाज में बिठा कर कर्नाटक भेजना जरूरी लगा था. कांग्रेस अपने पतन की यह दशा समझ पा रही है ? पिछले लंबे समय से राहुल गांधी अपने कांग्रेस के संगठन को संवारने की जो कोशिशें कर रहे हैं, वह कहां पहुंची है, इसका एक नमूना मध्यप्रदेश के वे 62 विधायक हैं जिनका ख़ुद पर या जिन पर संगठन का इतना भी भरोसा नहीं है कि वे किसी भी हाल में संघी-जाल में नहीं फंसेंगे. जब कांग्रेस अपने राजनीतिक अस्तित्व के सबसे नाज़ुक दौर से गुजर रही है, सारा देश देख रहा है कि राहुल-प्रियंका अपना सारा बल समेट कर इसे पटरी पर लाने में जुटे हैं, संघ परिवार इनसे भयभीत है अौर अपनी पूरी ताकत व चातुरी से इन्हें बदसूरत साबित करने में लगा है, तब राहुल-प्रियंका को इतना भरोसा भी नहीं है कि उनके विधायक न खरीदे जा सकते हैं, न डराए जा सकते हैं. उनके विधायकों में इतना राजनीतिक शील भी नहीं बचा है कि वे अपने नेतृत्व से बता दें कि वे न डरेंगे, न बिकेंगे. क्या कांग्रेस में सिंधिया-संस्कृति से अलग कुछ भी नहीं बचा है; राहुल गांधी की कोशिशों से कुछ भी नहीं बना है ? कांग्रेस के संकट का असली चेहरा यही है.
कांग्रेस के इस आंतरिक पतन को भाजपा का वाह्य व आंतरिक पतन पहचानता है. वह उसका फायदा उठाता है. संघ परिवार हमेशा से इसी दर्शन में मानता आया है कि अपना फायदा ही पहला व अंतिम फायदा है. वह जो मानता है, उसी अनुरूप चलता है. कांग्रेस अब कुछ मानती नहीं है, वह केवल चाहती है. चाहने से कुछ मिलता नहीं है, यह वह भूल गई है. यह कांग्रेस का संकट है. वह इस सच को पहचाने कि नहीं, वह इससे जूझे कि नहीं, यह वह जाने.
ऐसा ही कुछ ममता बनर्जी के साथ हुआ. अपनी तृणमूल कांग्रेस को उन्होंने कभी समझाया ही नहीं कि इस तृण का मूल कहां है. उन्हें सत्ता की तलाश थी, सो उन्होंने यही सच सबको समझाया कि सत्ता जैसे व जहां मिले, हथियानी है. इस अंधे, अनैतिक दर्शन में इतनी ही संभावना है कि वह आपको दो-चार चुनाव जिता दे. उसने ममताजी को जिता दिया. वे जीतती गईं, और फिर हार गईं. ऐसी हारीं कि अब वापसी संभव नहीं है. सारे क्षेत्रीय दल इसी दर्शन से चलते आए हैं और अपनी वक्ती जीत को अपनी असली ताक़त मान कर फूलते रहे हैं. गुब्बारा फूलने की भी एक हद तो होती है न ! फिर वह फूट जाता है. फूट जाता है, तो फिर फूलता नहीं है. नेतृत्व की कसौटी यही है कि वह बताए-सिखाए कि हवा कब, कितनी भरनी है और कब ठहर जाना है. इसलिए प्राय: सभी क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व की अंतिम कगार पर हैं. तमिलनाड के थलपति विजय इससे कुछ सीख सकें, तो सीखें. उनके सामने संभावनाओं का संसार खुला धरा है. उस संसार को समेटने का इल्म उनमें है कि नहीं, विजय को साबित करना है. वे दूसरे चंद्रबाबू नायडू बनेंगे तो हाराकिरी करेंगे.
भारतीय राजनीति भी आज अत्यंत संभावनाओं के समक्ष खड़ी है. एक तरफ संघ परिवार है जो सत्ता का सत्य समझ चुकी है और इसलिए वह ऐसा हर कुछ कबूलती जा रही है जो उसके ही घोषित आदर्शों के विपरीत है. संघ जिस रास्ते पर चल पड़ा है उससे उसकी वापसी भी मुश्किल है. आज इनके हाथ से सत्ता निकल जाए तो यह सारा ढांचा खोखला हो कर भहरा जाएगा. इस सरकार की भी अपनी कोई नैतिक रीढ़ नहीं है. यह सत्ता-लोभ की गोंद से चिपकी हुई है और सांप्रदायिकता व दूसरी तमाम संकीर्णताओं के उन्माद को अपनी ताकत बना रही है. यह बहुमत खो चुकी है और जिस बैसाखी पर यह चल रही है वह लगातार कमजोर होती जा रही है.
दूसरी तरफ खंड-खंड विपक्ष है. राजनीतिक सार्थकता की निम्नतम पायदान पर यह खड़ा है. इसे यहां से उठना ही है, क्योंकि इससे नीचे जाने की कोई जगह नहीं है. राहुल गांधी को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने न केवल कांग्रेस को खड़ा रखा है बल्कि विपक्ष का राष्ट्रीय कद भी बना कर रखा है. इंडिया गठबंधन कांग्रेस की अक्षमता व दूसरे घटकों की बेमाप आकांक्षा का शिकार रहा है. ये सभी साथ आने के लिए साथ नहीं आए, अपना-अपना सिक्का जमाने व जताने के लिए साथ आए. इन्होंने राज्यों को राज की तरह बांट लिया – बंगाल ममता का, उत्तरप्रदेश अखिलेश का, बिहार यशस्वी का, महाराष्ट्र उद्धव का, वामपंथियों ने केरल को अपना घोषित कर लिया, कश्मीर अब्दुल्ला-मुफ्ती की अपनी खिचड़ी कश्मीर में. कांग्रेस को इन सबने अपने राज से दूर रखने की सावधानी रखी और अब हाल यह है कि ये सब टके सेर हुए जा रहे हैं. ये चाहते थे कि जो उच्छिष्ट बचा है, राहुल उसी में सीमित रहें. इस हाल में भी राहुल भारत से छोटी पहचान से जुड़े नहीं.
उन्होंने इन सबसे अलग हो कर जब कदम बाहर निकाला तो भारत जोड़ो की हवा बहाई. भाजपा को पता है कि जाति-धर्म-भाषा-लिंग से ऊपर उठी यह भारतीयता उसके लिए खतरा है अौर राहुल कांग्रेस को साथ ले कर देश में यह भाव जगा सकते हैं. इसलिए प्रधानमंत्री से ले कर भाजपा का हर छुटभैय्या राहुल को पप्पू अौर नेहरूवाली कांग्रेस को नाकारा साबित करने में जुटी रही. शुरू में इसने एक माहौल बनाया भी जिसे अंधभक्तों ने ख़ूब उछाला. लेकिन इतिहास भी अपना चक्र पूरा करता ही है. अब उस माहौल की हवा निकल रही है. यह नई राजनीतिक बेचैनी है जो संघ परिवार को घेरती जा रही है.
जब दोनों तरफ अपनी-अपनी तरह की बेचैनी फैली हो तभी नई पहल का सही समय होता है. तिकड़म अलग चीज है. इस कला में भारतीय जनता पार्टी व सरकार को महारत हासिल है. जिसने नैतिकता, संविधान, लोकतांत्रिक परंपरा आदि-आदि को गंदे कपड़ों-सा उतार फेंका हो, उन सबके लिए ऐसी महारत हासिल करना संभव है. भारतीय जनता पार्टी इसी मुकाम पर खड़ी है. वह कोई नई पहल नहीं कर सकती है. इसलिए कोई नई पहल संभव है तो ‘इंडिया’ की तरफ से संभव है. शर्त यह है कि वह पहल शुद्ध हो, संविधानसम्मत हो, लोकतंत्र के बुनियादी असूलों को पूरा करती है और सारे देश को समेट कर चलती हो. विपक्ष वाली तिकड़मों की भी यहां जगह नहीं होगी. क्या कांग्रेस के नेतृत्ववाली ‘इंडिया’ में यह समझ व प्रतीति है ? देश यही समझना चाहता है, देश यही होता हुआ देखना चाहता है.
(13.06.2026)
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આવશે અને બુદ્ધપૂર્ણિમા એટલે કે વૈશાખ મહિનાની પૂનમ આ વર્ષે 1 મેએ હતી. આ એક. અને બીજું એ કે ટાગોરને જાતકકથાઓ બહુ ગમતી. જાતકકથાઓ એટલે બુદ્ધના પૂર્વજન્મની વાર્તાઓ – માનવજીવનને સદાચાર તરફ વાળવાનો પ્રયાસ કરતી બોધકથાઓ. આ કથાઓની સંખ્યા 550 જેટલી છે અને મહાયાન અને હીનયાન આ બંને બૌદ્ધ સંપ્રદાયો જાતકકથાઓનો આદર કરે છે.
‘શ્રેષ્ઠી, બીજો વખત હોત હું પણ એક પુષ્પ માટે તમારી સાથે ચડસાચડસીમાં ન ઊતરત. પણ હું પણ ભગવાન બુદ્ધનાં દર્શને જઈ રહ્યો છું. મારે પણ તેમનાં ચરણે ધરવા માટે જ આ પુષ્પ જોઈએ છે. ગમે તેટલું દ્રવ્ય આપવા હું પણ તૈયાર છું.’
તેનાં હાલહવાલ જોઈ લોકોએ તેને રોકી. ભગવાન બોલ્યા, ‘તેને આવવા દો.’ અને પટાચારાને કહ્યું, ‘તારી ચેતના પાછી લાવ, ભગિની.’ એ ભગવાનના ચરણોમાં પડી હૈયાફાટ રડી અને પછી બેભાન થઈ ગઈ.
વાત ચાલતી હતી અભિવ્યક્તિની નજાકતની. નાજુક અભિવ્યક્તિ માટે પ્રેમીનું, કવિનું ગજું હોય તો જ કળીને નુકસાન ન થાય એવી ઋજુતાથી તેની પાંખડી જરા જેટલી ખસેડીને અંદર છુપાયેલી સુગંધને મુક્ત કરી શકાય. આ કોઈ રેંજીપેંજીનું કામ નથી. ‘અનુપમા’નું ગીત ‘કુછ દિલ ને કહા, કુછ ભી નહીં’ સાંભળીએ ત્યારે આપણને એવી ગજાદાર પણ કુસુમકોમળ કલમનો પરિચય થાય. સ્ત્રીત્વની આવી નજાકતનો સ્નેહ-આદર કરનાર કવિ જ્યારે સ્ત્રીને ગરમ શ્વાસોની આંચમાં પીગળી જવા માટે ઠપકો આપે અને કહે, ‘રુત બદલ ડાલ અગર ફૂલના-ફલના હૈ તુઝે, જિસ મેં જલતા હૂં ઉસી આગ મેં જલના હૈ તુઝે’ ત્યારે તેમાંથી ક્રાંતિની જ્વાળાઓ પણ પ્રગટે. સાચું જ છે, કલમના વ્યાપનો કોઈ અંત નથી. એટલે જ તો આ ગીત બન્યાને 60 વર્ષ થઈ ગયાં છતાં તે આપણને દુનિયાની આટલી ધમાલ વચ્ચે પણ વહેલી સવારની હવા જેવું તાજું અને ફૂલની પાંખડી પર અટકેલી ઝાકળ જેવું ભીનું લાગે છે. આમ થવાનાં બીજાં કેટલાક કારણ પણ છે : જેનાં નામ છે સંગીતકાર હેમંતકુમાર, ગાયિકા લતા મંગેશકર, ધર્મેન્દ્ર-શર્મિલા ટાગોરની જોડી અને લેખક-દિગ્દર્શક ઋષિકેશ મુખર્જીનું કલાત્મક સાદગીભર્યું ફિલ્માંકન.