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एक और देशद्रोही ! 

कुमार प्रशांत|Opinion - Opinion|30 September 2025

कुमार प्रशांत

इस बार वह धुर लद्दाख में मिला ! एक वही जगह बाकी थी शायद जहां देशद्रोहियों की पहुंच नहीं थी. लेकिन हम गलती पर थे. वहां भी ये निकल ही आए ! आप देखिए न, कहां-कहां, किस-किस रूप में ये लोग पहुंचे हुए हैं, फैले हुए हैं. यहां वह उपवास की आड़ ले कर बैठा था. वह एक साथ पाकिस्तान, चीन, अमरीका आदि का एजेंट था. हम पहले समझ ही नहीं पाए, क्योंकि हम सहज विश्वासी मन के लोग हैं. लगा शांति की बात करने वाला, उपवास आदि का रास्ता पकड़ने वाला, हमारी राजनीतिक चालबाजी आदि को नहीं समझने वाला एक निरर्थक-सा आदमी है तो उसे करने दो जो करना चाहे. कहां-कहां हम सबको सूंघते फिरें ! आखिर लोकतंत्र भी तो एक रस्म है न कि जिसे भी हमें निभाना पड़ता है. लेकिन अब लगता है कि वे अंग्रेज ही सही थे कि जो उपवास, शांति, अहिंसा आदि का ढोंग समझते थे और गांधी को ज्यादा घास नहीं डालते थे. हमने डाली तो देखिए यह सोनम वांगचुक भी शेर बनने लगा ! अब शेर को उसके जंगल में छोड़ दें तो और खतरा; सो उसे जोधपुर जेल में ला धरा है हमने. अब उसे यहां अपना-सा कुछ भी न मिलेगा — न हवा, न पानी, न लोग, न धरती ! अपनी जमीन से काट दो बड़े-से-बड़ा सूरमा भी चूहा बन जाता है.

यह कहानी है जो पिछले 5-7 दिनों से बेतहाशा लिखी-कही-फैलाई जा रही है. सरकार का आईटी सेल पूरी वफ़ादारी के साथ सोशल मीडिया पर, गोदी मीडिया पर, फोटो मीडिया पर जहां, जो सूझ रहा है वही चेंपे जा रहा है. ‘जी आका’ के उन्माद में वे यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि एक व्यक्ति को एक साथ चीन, अमरीका, पाकिस्तान का एजेंट करार देना आपके ही दिमागी दिवालियापन का प्रमाण है. कोई अमरीकी डीप स्टेट का और चीन की ‘रेड आर्मी’ का काम एक साथ कैसे कर सकता है, यह हमारे अतिशय कुशाग्र विदेशमंत्री जयशंकर के अलावा दूसरा कोई न समझ सकता है, न समझा सकता है.

अब सोनम वांगचुक को बचने-छिपने के लिए कोई जगह नहीं मिलेगी. सत्ता की ऐसी अंधी धमक चला रखी है दिल्ली ने कि कार्यपालिका के जी-हुजूरों की बात कौन करे, दिल्ली अपनी मूल्यविहीन सत्ता-लालसा का सिक्का चलाए रखने के लिए फौज-पुलिस का खुला राजनीतिक इस्तेमाल करने से भी नहीं हिचक रही है. याद है न कि ऑपरेशन सिंदूर के झूठ को सच बनाने के लिए किस तरह सेना के अधिकारियों का इस्तेमाल किया गया था और किस तरह वायु सेनाध्यक्ष एयर मार्शल ए.पी. सिंह और फिर भारतीय सैन्य सेवा प्रमुख जेनरल अनिल चौधरी ने इनकी पोल खोल दी थी ! इस बार सामने लाए गए हैं लद्दाख के पुलिस महानिदेशक कोई श्रीमान एस.डी.सिंह जामवाल. उनसे कहलवाया जा रहा है कि लद्दाख में हुई हिंसा के प्रेरक-जनक-योजनाकार सोनम वांगचुक थे जिनके तार पाकिस्तान से जुड़े हैं, अमरीकी फंडिंग की ताक़त हैं उनके पास. जामवाल का कहना है कि यदि प्रदर्शनकारियों पर गोली चला कर हमने कुछ लोगों को ढेर नहीं कर दिया होता तो सारा लद्दाख जल कर राख हो जाता. जामवाल ने ही यह रहस्य भी खोला कि उनके 70-80 पुलिसकर्मी घायल पड़े हैं; और  यह भी कि उन लोगों को खुफिया जानकारी थी कि वांगचुक व उनके साथी शांति भंग करने की तैयारी कर रहे हैं. वे यह नहीं बताते हैं कि जब उन्हें पता था कि वे ऐसी तैयारी कर रहे हैं तब आप क्या कर रहे थे? निकम्मी सरकार के निकम्मे अधिकारी!

अब हम घटना की तरफ लौटते हैं.

सोनम अनशन पर पांचवीं बार उतरे थे. केंद्र सरकार लद्दाख के नागरिक संगठन को दिया अपना कोई वाद पूरा करने को तैयार नहीं थी. वह लद्दाख जन संगठन से बातचीत करने को भी तैयार नहीं थी. बातचीत की हर बातचीत किसी-न-किसी बहाने भटका दी जा रही थी. गुस्सा व निराशा गहरा रही थी. उसे एक मोड़ दे कर क़ाबू में रखने के लिए और सरकार पर दवाब बढ़ाने के लिए सोनम अनशन पर उतरे. आपको याद है न कि लद्दाख से चल कर सैकड़ों नागरिक कुछ माह पहले ही सोनम के साथ दिल्ली पहुंचे थे. दिल्ली में उन्हें घोर उपेक्षा मिली थी.

यह यात्रा व इससे पहले के सारे अनशन व संवाद के प्रयास इसी कोशिश में थे कि सरकार बातचीत करे, लद्दाख की सुने ताकि वहां का तनाव ढीला पड़े और बात आगे बढ़े. शुरू से ही सोनम वांगचुक की सोच व उनकी पहल इसी दिशा में रही है कि सत्ता से संवाद कर, समस्याओं का रास्ता निकाला जाए. लेकिन यह सरकार भी  शुरू से ही लोगों की मांग पर बातचीत करने व लोगों का कहा सुनने को अपनी हेठी समझती रही है. एक खास विचारधारा की सरकार का मिजाज ऐसा होता है. भूमि अधिग्रहण से ले कर किसान आंदोलन, बेरोजगार आंदोलन, शिक्षक आंदोलन, पूर्व सैनिक आंदोलन जैसे अनेक उदाहरण हैं जब यह सरकार सुनने व बातचीत करने में अपनी हेंकड़ी दिखाती रही है. वैसा ही लद्दाख के साथ भी होता रहा.

सोनम व लद्दाख का कहना क्या है ? ठीक वही जो हिमालय का कहना है कि हम लोग प्राकृतिक बनावट व भौगोलिक संरचना में बाकी देश से सर्वथा भिन्न व अत्यंत नाजुक पर्यावरण के वाशिंदे हैं. हमारी जरूरतें अलग हैं, हमारी प्राथमिकताएं अलग हैं. इसलिए दिल्ली की सोच व दिल्ली का मिजाज हम पर थोपिए मत ! हमसे बात कीजिए और हमें जिसकी जितनी जरूरत है, उतना हमें दे कर आप देश का दूसरा काम कीजिए. इतनी सरल-सी, सीधी लोकतांत्रिक आकांक्षा है हिमालय व लद्दाख की. लेकिन कोई राज्य, कोई समाज अपनी आकांक्षा हमसे पूछे बग़ैर तय करे और हमें उसे पूरा करना पड़े, ऐसा लोकतंत्र सरकारों ने पढ़ा कब है ! इसलिए वह अपने एजेंट छोड़ती है ताकि वे हिमालय या लद्दाख में जा कर, अंदमान जा कर वहां के लोगों की एकता को तोड़ें व दिल्ली की घुसपैठ का रास्ता बनाएं. कौन हैं ये एजेंट ? नौकरशाही, पार्टी व पुलिस-फौज. यही खेल सब जगह चलता है.

सोनम शिक्षा से जुड़े सज्जन व्यक्ति रहे हैं. वे बताते हैं कि वे विज्ञान में – ऑप्टिक्स, लाइट, मिरर में डूबे रहने वाले विज्ञान की धरा के युवा थे जिसे पारिवारिक वजहों से अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए बच्चों को पढ़ाने का काम करना पड़ा; और लद्दाखी बच्चों को पढ़ाते हुए उनकी अपनी शिक्षा भी हुई और वे पहचानने लगे कि यह शिक्षा नहीं, भूसा है जो वे और दूसरे सारे शिक्षक बच्चों के दिमाग में भरते जा रहे हैं. इसी अनुभव में से नए सोनम वांगचुक का जन्म हुआ. दुनिया देखी, विदेशी शिक्षण संस्थानों को देखा-समझा और फिेर अपने लद्दाख को अपने बच्चों के लिए बनाने में जुट गए. अपनी संस्था बनाई, विज्ञान की अपनी पढ़ाई व अपनी मौलिकता का इस्तेमाल कर वह बहुत कुछ बनाया जिसकी चर्चा तब भी और अब भी सब तरफ़ होती है. लद्दाख की बर्फानी प्रकृति से जूझते भारतीय फौजियों को देखा तो उनके लिए ऐसे हल्के व आरामदेह टेंट बनाए की फौज धन्य हो गई. लद्दाखी बच्चों के लिए पाठ्यक्रम बनाया, उसके लिए योग्य शिक्षक तैयार किए, वहां के नाज़ुक पर्यावरण के अनुकूल विकास के कितने ही नए ढांचे खड़े किए. देश-दुनिया से तमाम सम्मान व पुरस्कार बरस पड़े, बरसते ही रहे. हर सरकार का स्नेह पाया, हर सरकार के स्नेही रहे. कभी कोई एक उदाहरण भी नहीं खोज पाएंगे आप जब किसी सवाल पर सोनम ने सरकार की मुखालफत की हो. उनकी यह कच्ची समझ यहां तक गई कि जब जम्मू-कश्मीर को तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित कर, धारा 370 खत्म कर दी गई और पूरा राज्य एक बड़ी जेल में बदल दिया गया, तो उसका सबसे मुखर स्वागत सोनम ने किया. लद्दाख के लिए स्वतंत्र प्रांत की अपनी मांग के रास्ते में वे धारा 370 को सबसे बड़ी बाधा मानते थे. इसलिए वह धारा खत्म की गई तो सोनम ने यह समझा कि अब लद्दाख का रास्ता खुल जाएगा. वे यह सीधी व सच्ची बात नहीं समझ सके कि दूसरे का घर लूटने वाले, पड़ोस का घर नहीं भरते हैं बल्कि उसी पड़ोस को लूटते हैं जिसने पहला घर लूटने में मदद की थी. लद्दाख के साथ यही हुआ.

ऐसी आदमी की संरचना में आप देशद्रोही का एक धागा भी खोज नहीं पाएंगे. 2020 सरकार की चीन से अनचाही तनातनी हो गई तो लद्दाख से पहली आवाज सोनम की ही उठी कि हमें नागरिक स्तर पर भी चीन को हराना है, सो हर नागरिक अपने ‘पर्स का हथियार’ चलाए व चीनी सामान नहीं खरीदने का संकल्प ले ! सोनम को सरकार ने हाथोंहाथ लिया. कितना प्रचार व समर्थन मिला तब सोनम को.

लेकिन बात बिगड़ी तब जब प्रधानमंत्री की लक्ष्मण-रेखा जाने-अनजाने में सोनम ने पार की. यह अपने गुजरात के साबरमती में जिनपिंग को झूला झुलाने व गले लगाने बाद का हादसा है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति को गले लगाने का खेल समझने वाले प्रधानमंत्री को अचानक जिनपिंग ने दिखा दिया कि यहां गला काटने में देर नहीं लगती है. मोदी  सरकार डर गई और हर डरे हुए आदमी की तरह उसने इस खतरे को झूठ की चादर से ढकना चाहा. प्रधानमंत्री ने भरी संसद में कहा कि न सीमा पार से कोई आया है, न कोई घुसा था, न कोई घुसा है. प्रधानमंत्री देश की आंख में धूल झोंक रहे थे; लद्दाख में सोनम खुली आंखों से देख रहे थे कि चीन भीतर आ घुसा है, कि लद्दाखी चरवाहों की धरती उसने कब्जा कर ली है, कि जानवरों को चराने की जगह नहीं बची है, लद्दाखी लोगों का अपनी ही धरती पर आना-जाना दूभर हो गया है. उन्होंने यह सच देश को बता दिया.

उस दिन से सोनम सरकार की नजर से गिर गए. उनकी छवि खराब करने का काम चलने लगा. उनकी उपेक्षा होने लगी और यह सावधानी बरती जाने लगी कि उनको कैसी भी, कोई भी सफलता न मिले. यह सरकार हमेशा चौकन्ना रहती है कि कहीं, कोई भी ऐसा व्यक्तित्व न उभर सके कि जो कभी, किसी भी मौके पर सरकार से- प्रधानमंत्री से – सवाल-जवाब की हैसियत में आ जाए. सोनम यह करने लगे थे.

अब लद्दाख को अकेला कर सरकार उसे चुप कराना चाहती है. सोनम उसकी सबसे स्पष्ट व मुखर आवाज थे. उसे उसने ऐसी धारा में पकड़ कर अंदर कर दिया है जिसमें जमानत मिलना आसान नहीं है. जब सर्वोच्च अदालत हर जिम्मेवारी से कंधा झटकने में लगी हो तब तो सोनम का बाहर आना ज्यादा ही मुश्किल है. अब रास्ता एक ही है कि सारा देश लद्दाख की साथ बोले व सोनम की रिहाई की मांग करे. यह सब सोनम के रास्ते से ही हो लेकिन कमजोर या प्राणहीन न हो. हमें खुल कर और बुलंद आवाज में कहना चाहिए कि जब देश में देशद्रोहियों की संख्या इस कदर बढ़ जाए तब लोगों को नहीं, सरकार को पकड़ना चाहिए. 

(29.09.2025) 
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https://kumarprashantg.blogspot.com

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શૂન્યરાત્રી

પ્રદ્યોત પ્રિયદર્શી|Opinion - Opinion|30 September 2025

દૂર ક્યાંક ઢોલ વાગી રહ્યો છે ત્યારે મને મારું બાળપણ યાદ આવી રહ્યું છે. અમે મહિનાઓ પહેલાં નોરતાંની રાહ જોતાં. કારણ એ કે એ દિવસો દરમિયાન અમને ખૂબ રમવા મળતું અને એ ય પાછું આખા ગામમાં.

સામાન્ય રીતે નિશાળેથી છૂટ્યા બાદ પોતાના વાસમાં રમવાનું હોય, પણ નોરતાં દરમિયાન તો ગામમાં રમવા જવાનું. આમ તો એની તૈયારી ચાલતી હોય એ દિવસથી અમારા ત્યાં ધામા. સાંજ પડે આખા વાસના છોકરાં ચોકમાં ભેગા થાય અને મંડે રમવા. રમવામાં અડવાદાવ સૌથી વધુ લોકપ્રિય. એમાં ય સાંકળ તો મજાની. એ ય આખા ગામમાં દોટમદોટ … સામાન્ય રીતે જ્યાં જવા ના મળતું હોય/જવાનું ના થતું હોય એવી બધી જગ્યાઓ ખૂંદી વળીએ. અન્ય વાસના છોકરાં પણ અમારી પેઠે જ ધમાચકડી મચાવતા હોય. નિશાળમાં બધા સાથે રમીએ પણ અહીં બધા જ્ઞાતિ/વાસ/વિસ્તાર પ્રમાણે રમતા. બધાં બાળકો આ દિવસો દરમિયાન ખૂબ મજા કરતા જોવા મળે. (જાણે કે રમતની ઋતુ)

અમારાથી મોટી ઉંમરની છોકરીઓ અમને ચકરડી ખવડાવતી એ હજુ ય યાદ આવે. સરખેસરખાં હોઈએ એ બધા ફેરફુદરડી ફરીએ. ક્યારેક અમારાથી મોટા બહુ મજબૂત છોકરા અમને પગેથી પકડીને ચકરડી ખવડાવતા. મગજ ભમી જાય ત્યાં સુધી ના છોડે, બોલો! પણ એની ય મજા તો ખરી જ.

સામાન્ય રીતે અમારે મંદિરમાં જવાનું ના થાય પણ આ દિવસો દરમિયાન તો માતાજી જ ચોકમાં હોય. એટલે અમે પગે લાગવા જઈએ અને આમ કહો તો પૂજારી જોડે ચાંદલો કરાવવા! દરેક ઉંમરના પોતાના રોમાંચ હોય છે!

ચડાવો શરૂ થાય એટલે અમને રમવાનું બંધ કરવાની સૂચના મળવા મંડે. અમારા ગામના (પટેલ) સાંકા મગન રોજ આરતીનો ચડાવો બોલાવે. ને મહાકાળી, મહાલક્ષ્મી, મહાસરસ્વતીનું નામ લઈને એને ઊંચાઈ પર લઈ જાય. એકવાર … બે વાર … ત્રણ વાર … થતું હોય ત્યારે આખું ગામ રોમાંચિત હોય.

ક્યારેક તો આરતી ચાલુ થાય ત્યાં સુધી અમે રમતા હોઈએ.

ને પછી જય આજા શક્તિ …

(એ સમયે શબ્દો બરાબર પકડાતા નહોતા હોં …)

એક બાજુ પ્રસાદી વહેંચાતી હોય અને બીજી બાજુ માઈકમાંથી પ્રસાદીના દાતા અને આજના તથા આવતીકાલના ચોકીદારના નામ બોલાતાં હોય. વર્ષો સુધી એકનાએક ચોકીદારોનાં નામ સાંભળીને અમને પણ મોઢે થઈ ગયેલાં!

તમે કહો તો અત્યારે પણ બે ચાર નામ બોલી શકું!

અમારા ગામમાં એક જ માંડવી નીકળે એટલે આખું ગામ એક જ જગ્યાએ ભેગું થાય. પ્રસાદીના દાતાએ પણ એ પ્રમાણે ખાસ્સા જથ્થામાં ચીજો લાવવી પડે. જો કે પટેલો ઘણા આર્થિક સમૃદ્ધ એટલે વાંધો ના આવે. મોટાભાગે આરતી ને પ્રસાદી એમનાં જ હોય. ઘણીવાર તો બે-ત્રણ પ્રસાદી પણ હોય. અત્યારે બહુ યાદ નથી, પણ બાળપણમાં ક્યારેક બીજીવાર પ્રસાદી લેવાની ચેષ્ટા પણ કરી હોય! જો કે વહેંચનારા પણ કાયમી એકના એક એટલે એ ય ઉસ્તાદ હોય પાછા!

બસ પ્રસાદીનું પતે એટલે અમારી આંખો સિવાયનાં બધાં અંગો સ્થિર થઈ જાય. આમ તો પ્રસાદી બાદ તરત ઢોલ વાગવાનો શરૂ થાય, એટલે અંગોમાં ચહલ-પહલ થવી જોઈએ. પણ અમારાં અંગોને એની છૂટ નહોતી. અમે રહ્યા ચમાર-વણકર ને રાવળ. અમારે તે વળી શેનું ગાવાનું? અમારે તો માત્ર  જોવાનું. જોઈ રહેવાનું!

ગામની લગભગ 1/3 વસ્તી આમ ગરબે રમવામાંથી બાકાત. અને આમાં કોઈને કશું અજુગતું લાગે નહિ! (સર્વસ્વીકૃત)

ત્રીજા ધોરણમાં ન્યાયનો વિરુદ્ધાર્થી શબ્દ પૂછાતો હતો કે નહીં એ ખ્યાલ નથી પણ ઉપરોક્ત બાબત મને અન્યાય જેવી લાગેલી. મને થયું કે બધા ગરબા ગાય છે તો આપણે કેમ નહિ?! ને મેં તૈયાર કરી ચડ્ડીધારી ગેંગ. અમારી જ લાઈનમાં રહેતા મારી સાથે જ ભણતા અન્ય ત્રણ છોકરાઓને મેં તૈયાર કર્યા. અને અમે ગરબાની લાઈનમાં ઘૂસવાનું નક્કી કર્યું. મેં ચડ્ડીની ઉપર સદરો પહેરેલો એ મને યાદ છે. લગાર વ્યવસ્થિત દેખાવા માટે મેં વસ્ત્ર પરિધાન નિયમ વિરુદ્ધ જઈને સદરાનું ઇન કરેલું!

અમારા વાસના લોકો જે ખૂણે બેસતા હતા ત્યાંથી જ અમે ચાર જણે સિફતપૂર્વક ગરબાની લાઈનમાં હોંશભેર પ્રવેશ લીધો. એક રીતે તો અમારા માટે આ કાર્ય પરાક્રમથી ઓછું ન હતું. કદી ગરબા ના ગાયા હોય એટલે ના આવડે એ સ્વાભાવિક છે. તો ય અમે અધિકૃત ગરબેદારોને જોઈ જોઈને, એમની નકલ કરીને આગળ વધતા રહ્યા. અમે લગભગ 50 ફૂટ જેટલું અંતર કાપ્યું હશે ને કેટલીક ચબરાક આંખોની નજર અમારા પર પડી ગઈ. ને પછી શું? અમને હાથ ઝાલીને બહાર કાઢવામાં આવ્યા.

કદાચ વિરોધ કરવાની તાકાત એ વખતે નહિ હોય. એટલે 50 ફૂટનું પરાક્રમ કરીને ફરી પાછા અમે અમારા ટોળામાં આવીને બેસી ગયા. અમારા ટોળામાં થોડોક ગણગણાટ થયો ને પછી બધું જેમનું તેમ. ગામ તરફથી આ ઘટનાના કોઈ પ્રત્યાઘાતો આવ્યા નહિ. 2001ની આ ઘટના આટલાં વર્ષો બાદ તો કદાચ બધા ભૂલી પણ ગયા હશે, પણ અમે ચાર ચડ્ડીધારી તો શેના ભૂલીએ!

દર આસો માસે એને યાદ કરીને હરખાઈએ છીએ. કદાચ અમારા જીવનનું પહેલું ‘સાત્ત્વિક તોફાન’.

પણ આજે 21 વર્ષ બાદ પણ સ્થિતિ બદલાઈ નથી.

ઘણા સમયથી એમ થતું હતું કે આ ઘટનાનું વર્ણન કરું પણ પાછું એમ થતું હતું કે લોકો મને દલિત લેખકના ખાનામાં ખતવી દેશે, જે મને નથી પાલવતું. (અલબત્ત લેખક શબ્દ તો મોટો કહેવાય, હું તો અનુભવો વહેંચતો ફરું છું.)

 હા, હવે તો અમારા વાસના બહુ લોકો પ્રસાદી લેવા કે જોવા પણ નથી જતા.

મારી વાત કરું તો ત્રીજા ધોરણમાં આવું થયું એ પછી ઘણાં વર્ષો તો રમવાનું, પ્રસાદી લેવાનું ને જોઈને બેસી રહેવાનું ચાલુ જ રહ્યું હતું. લગભગ કૉલેજમાં આવ્યો ત્યારે જોવા જતો પણ અન્યાયના પ્રતીકાત્મક વિરોધ તરીકે પ્રસાદી લેવાનું બંધ કરેલું. પણ પછી એમ થયું કે આવું કરશું તો એમ પણ અંતર વધતું જશે. ને પછી પ્રસાદી લેવાનું શરૂ પણ કર્યું.

છેલ્લાં થોડાંક વર્ષોથી તો સહજપણે જ બધું બંધ થઈ ગયું છે. જાણે માંડવી સાથે કાંઈ લેવાદેવા જ ના હોય.

અન્યો માટે નવરાત્રી ને અમારા માટે ‘શૂન્યરાત્રી’.

આજે આટલાં વર્ષે વિચાર આવે છે કે ગામના એક તૃતીયાંશ ભાગના ભાઈઓ ને જવા દો બહેનોને કેવું થતું હશે! આપણા જ વર્ગમાં ભણતા અન્ય બાળકો સરસ રીતે તૈયાર થઈને ગરબે રમતા હોય અને આપણે દૂર બેઠા બેઠા જોઈ રહીએ એ કેવું લાગે! કદાચ ગરબે રમવા નહીં મળતું એટલે જ અમે આરતી પહેલાં બીજાઓ કરતાં વધુ રમી લેતા! મને અત્યારે ગરબા ગાતાં (રમતાં) નથી આવડતું એનું એક કારણ આ પણ ખરું. (જેમ નિશાળમાં કોઈ ઘરની પહેલી પેઢી ભણવા આવી હોય અને બહુ ના આવડે એમ!)

અલબત્ત કેટલાક લોકો લગ્નના વરઘોડામાં નાચી-નાચીને શીખી ગયા. (અમારા ગામમાં વરઘોડા સામે વિઘ્ન નથી એટલું સારું છે.)

કોઈ કહેશે કે તમે તમારી અલગ માંડવડી કાઢી શક્યા હોત, પણ એ કાંઈ ઉકેલ નથી.

અને હા, શહેરો અને પાર્ટીપ્લોટમાં થતા ગરબાની વાત જુદી છે.

ગરબો/નવરાત્રી તો હવે ભારતભરમાં લોકપ્રિય થયાં છે ત્યારે મૂળે ગુજરાતી એવા લાખો લોકો એનાથી અછૂત હોય એ કેમ ચાલે?

અમારા ગામની એક સારી કહી શકાય એવી વિચિત્ર સ્થિતિ કહું. જે રાવળોને નવરાત્રીમાં ગાવા દેવામાં નથી આવતા એ રાવળો એમને ત્યાં થતા દિવાળીના (જોગણીમાના) ગરબામાં ‘બધાને’ ગાવા દે છે. કેવા ઉદાર!

અસ્પૃશ્યતાનું નિવારણ ક્યારે આવશે?

જ્ઞાતિવાદ ક્યારે દૂર થશે?

કેટલી પેઢીઓએ વેઠવું પડશે!

માણસને માત્ર માણસ ક્યારે ગણીશું!

ગાંધી-આંબેડકર વગેરેના આત્માને ટાઢક ક્યારે પહોંચાડીશું?

આ સવાલો સાથે ગુજરાતનાં હજારો ગામડાંના કાંઈક લાખો પગ પૂછી રહ્યા છે,

હેં થનગનાટ એટલે શું?

અમારું ગામ રામપુરા(મા) તો પાટનગરથી ઘણું નજીક છે અને કાયદાનું શાસન પણ ઠીક ઠીક પ્રમાણમાં છે. જ્યાં લોકો કાયદાને કશું નથી ગણતા હોતા ત્યાં શું સ્થિતિ હશે!?

[આ તબક્કે એ પણ નોંધવું રહ્યું કે અસ્પૃશ્યતા મુદ્દે થોડોક સુધારો થયો છે પણ એ પૂરતો નથી.]

નોંધ : 21મી સદીનું 25મું વર્ષ ચાલે છે.
e.mail : pradhyotpriyadarshi@gmail.com

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પુસ્તકની વેદના

હિતેશ એસ. રાઠોડ|Poetry|30 September 2025

શબ્દોને સંઘરી-સાચવી,
ગ્રંથાલયમાં લગોલગ
ખડકાયેલાં પુસ્તકો
વાટ જુએ છે વાચકની …
પણ, વાચકો હવે ક્યાં પધારે છે
પુસ્તકોને પસવારવા!
સૌ કોઈ વ્યસ્ત છે આજકાલ
સોશિયલ મીડિયાના
“સામાજિક” સંપર્કોમાં,
પુસ્તકોને હવે કોણ પૂછે છે
કારણ વિના!!
હાથમાં પુસ્તકધારી
વ્યક્તિના દર્શન દુર્લભ છે હવે!
એક સમયે વેદનાને
ખાળતાં પુસ્તકો
આજે વેદના સમેટી
બેઠાં છે ગ્રંથાલયોમાં,
એ આશ પર કે
એક દિવસ એનો વાચક આવશે
અને ધૂળ ખંખેરી
પાનાં ફંફોસશે …!
‘દરેક પુસ્તકને એનો વાચક મળે’
એ વાત પર
મરકાય છે પુસ્તક,
ને વદે છે : “રાખો હવે,
દરેક ગ્રંથાલયને
એનો વાચક મળે
તો પણ અમે રાજી!”

સરગાસણ, ગાંધીનગર.
e.mail : h79.hitesh@gmail.com

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Opinion

  • એક યુવક જન્તર મન્તર છોડતી વખતે પોલીસને કહેતો જાય કે, “ફિર આયેંગે ઔર તબ બંદૂક લેકર આના.”
  •  પ્રાથમિક શિક્ષણથી યુનિવર્સિટી શિક્ષણ સુધી ભ્રષ્ટાચાર એ જ શિષ્ટાચાર …
  • ૨૧મી સદીમાં ઘર પુન: બાંધવું
  • Gen Zનો રોષ: કઠેડામાં આજની કે અગાઉની પેઢી નહીં, વ્યવસ્થા છે
  • ચલ મન મુંબઈ નગરી—353

Diaspora

  • યુ.કે.માં ડ્રાઇવિંગની પરીક્ષા
  • અમીના પહાડ (1918 – 1973) 
  • છ વર્ષનો લંડન નિવાસ
  • દીપક બારડોલીકરની પુણ્યતિથિએ એમની આત્મકથા(ઉત્તરાર્ધ)ની ચંદ્રકાન્ત બક્ષીએ લખેલી પ્રસ્તાવના.
  • ગાંધીને જાણવા, સમજવાની વાટ

Gandhiana

  • શું આ જ કળિયુગની પરિભાષા હશે ? 
  • આંતરિક શક્તિ : હિંમત, અંતરાત્માનો અવાજ અને અહિંસક પ્રતિકાર 
  • માનવતાવાદી ત્રિપુટીને સ્મરણાંજલિ 
  • ગાંધી ‘મોહન’માંથી ‘મહાત્મા’ બન્યા, અને આપણે?
  • ગાંધીહત્યાના પડઘા: ગોડસેથી ગોળવલકર સુધી …

Poetry

  • નિષ્ક્રમણ
  • ગઝલ
  • માર્યા જશે
  • ચાર સાંપ્રત હિન્દી કાવ્યો
  • ગઝલ

Samantar Gujarat

  • ઇન્ટર્નશિપ બાબતે ગુજરાતની યુનિવર્સિટીઓ જરા પણ ગંભીર નથી…
  • હર્ષ સંઘવી, કાયદાનો અમલ કરાવીને સંસ્કારી નેતા બનો : થરાદના નાગરિકો
  • ખાખરેચી સત્યાગ્રહ : 1-8
  • મુસ્લિમો કે આદિવાસીઓના અલગ ચોકા બંધ કરો : સૌને માટે એક જ UCC જરૂરી
  • ભદ્રકાળી માતા કી જય!

English Bazaar Patrika

  • State-Sponsored Communal Profiling : The Gujarat Government Must Be Held Accountable
  • My mother cries on the phone’: TV’s war spectacle leaves Indians in Israel calming frightened families
  • “Why is this happening to me now?” 
  • Letters by Manubhai Pancholi (‘Darshak’)
  • Vimala Thakar : My memories of her grace and glory

Profile

  • તપસ્વી સારસ્વત ધીરુભાઈ ઠાકર
  • સરસ્વતીના શ્વેતપદ્મની એક પાંખડી: રામભાઈ બક્ષી 
  • વંચિતોની વાચા : પત્રકાર ઇન્દુકુમાર જાની
  • અમારાં કાલિન્દીતાઈ
  • સ્વતંત્ર ભારતના સેનાની કોકિલાબહેન વ્યાસ

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