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इतिहास को भूलने का खतरा

कुमार प्रशांत|Opinion - Opinion|2 April 2021

अपनी स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ मना कर बांग्लादेश ने फुर्सत पा ली. प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारतीय प्रधानमंत्री को मुख्य मेहमान बना कर अपनी राजनीतिक राह आसान करने की कोशिश की तो भारतीय प्रधानमंत्री ने हमेशा की तरह इस मौके से भी अपने लिए राजनीतिक फायदे की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेने की कोशिश की. उन्होंने खुद को बांग्लादेश की आजादी का सिपाही भी घोषित कर लिया और उस भूमिका में अपनी जेलयात्रा का विवरण भी दे दिया जबकि सच तो यह है कि उनकी पार्टी के उस कार्यक्रम में उन जैसे सैकड़ों जनसंघी कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था. ‘मैं भी उन कार्यकर्ताओं में एक था’, ऐसा कहने की विनम्रता प्रधानमंत्री की विशेषता नहीं रही है. वे उस फिल्मी संवाद के मूर्तिमान स्वरूप हैं कि मैं जहां खड़ा होता हूं, लाइन वहीं से शुरू होती है. और यह भी तथ्य है कि तब शायद ही कोई विपक्षी दल था कि जिसने सरकार के विरोध में वैसे कार्यक्रम न किए हों और गिरफ्तारी न दी हो.

लेकिन इतिहास बताता है कि 50वीं वर्षगांठ के इस ऐतिहासिक मौके पर बांग्लादेश व भारत दोनों ने जाने-अनजाने में बला की ऐतिहासिक निरक्षता का परिचय दिया. 2015 में शेख हसीना की सरकार ने एक बड़ा चमकीला आयोजन किया था और उन सबको ‘बांग्लादेश लिबरेशन एवार्ड’ से सम्मानित किया था जिन्होंने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका अदा की थी. ऐसे लोगों में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटलबिहारी वाजपेयी भी थे. वे तब इतने बीमार थे कि ढाका जा नहीं सकते थे. उनकी तरफ से यह सम्मान ग्रहण करने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ढाका पहुंचे थे – मुक्ति संग्राम के सहयोगी सिपाही के रूप में नहीं, किसी अनुपस्थित की जगह भरने !

उस समारोह में एक और भारतीय सम्मानित किया गया था जिसे समर्पित सम्मान-प्रतीक मेरे सामने के टेबल पर धरा रहता है और हमेशा मुझे घूरता रहता है. बंगबंधु शेख मुजीब की प्रधानमंत्री बेटी शेख हसीना भले भूल जाएं और भारत के प्रधानमंत्री आत्ममुग्धता से भले बाहर न निकल सकें लेकिन इतिहास तो जानता है कि पहले दिन से ही बांग्लादेश के संघर्ष को सही संदर्भ में समझने, उसे देश-दुनिया को समझाने और उसके लिए देश-दुनिया की अंतररात्मा को झकझोरने का अनथक काम किसी एक व्यक्ति ने किया था तो उसका नाम जयप्रकाश नारायण था. 50वीं वर्षगांठ के समारोह में किसी ने गलती से भी उस जयप्रकाश को याद न करके अपनी छिछली ऐतिहासिक समझ का परिचय दिया. जयप्रकाश के पास न सत्ता की कोई कुर्सी थी, न सत्ता पर दावा करने वाली कोई पार्टी थी और न पर्दे के पीछे से काम करने वाला कोई एजेंडा था. वे लोकतंत्र की आराधना करने वाले एक ऐसे नागरिक थे जिसने ताउम्र संसार के किसी भी कोने से उठने वाली लोकतांत्रिक आकांक्षा को हमेशा स्वर भी दिया और समर्थन भी.

देश-विभाजन का अंत-अंत तक खुला विरोध करने वाले गिने-चुने नामों में जयप्रकाश का नाम आता है. उन्होंने पाकिस्तान की परिकल्पना का कभी भी स्वागत-समर्थन नहीं किया. सांप्रदायिक राजनीति के कट्टर विरोधियों की किसी भी सूची में उनका नाम दर्ज होगा ही. लेकिन वही जयप्रकाश आजादी के तुरंत बाद से ही, भारत-पाकिस्तान के बीच संवाद की पहल करने और उसके लिए नागरिक मंच बनाने वालों में हमें सबसे आगे खड़े मिलते हैं. आजादी के तुरंत बाद शांति-सद्भावना के लिए प्रयास करने वालों का एक नागरिक प्रतिनिधि मंडल ले कर पाकिस्तान जाने वाले पहले भारतीय नेता जयप्रकाश ही थे. हम यह भी पाते हैं कि सैनिक बगावत से सत्ता हड़पने वाले पाकिस्तानी जेनरल अयूब खान ने जब ‘बुनियादी लोकतंत्र’ के नाम से एक प्रयोग की बात की तब गलतफहमी का खतरा उठा कर भी जयप्रकाश ने उसे सराहा. गलतफहमी होनी थी, हुई और उन्हें तीखी आलोचना का शिकार होना पड़ा लेकिन वे समझाते रहे कि मेरा समर्थन अयूब की तानाशाही को नहीं, लोकतंत्र के उनके प्रयोग को है. दोनों दो अलग बातें हैं. राजनीति का संकीर्ण मतलब करने व समझने वालों को ऐसे जयप्रकाश को पचाना हमेशा मुश्किल रहा है. संघ परिवार के लिए तो जयप्रकाश हमेशा ही अबूझ पहेली रहे. नरेंद्र मोदी जिस दल के सदस्य हैं व जिसकी तरफ से प्रधानमंत्री हैं उसने जयप्रकाश को ‘देशद्रोही’ भी कहा था और उन्हें ‘फांसी’ देने की मांग भी की थी. इतिहास में ऐसी कितनी ही गलियां मिलेंगी आपको जिनमें नासमझों की फौज कवायद करती दिखाई देती है. लेकिन अभी बात बांग्लादेश की ही करूंगा.

1971 में जब पाकिस्तान के आम चुनाव का नतीजा सामने आया और शेख मुजीब की अवामी लीग ने पूर्व पाकिस्तान की 169 सीटों में से 167 सीटें जीत कर पश्चिम पाकिस्तान की दादागिरी को सीधे जमीन पर ला पटका था, तब जयप्रकाश ही थे कि जिन्होंने इसका सही संदर्भ समझा था और इसकी हर खुलती परत पर नजर रखी थी. वे इससे पहले से पाकिस्तान के भीतर उठ रही परिवर्तन की लहरों को देख रहे थे और समझा रहे थे कि हमें इन संकेतों के आधार पर अपनी नीतियां बनानी चाहिए.

शेख मुजीब और जयप्रकाश एक-दूसरे के लिए अजनबी नहीं थे. दोनों आजादी की लड़ाई के दिनों से एक-दूसरे को जानते थे भले सीधे परिचित न हों और अलग-अलग रास्तों के राही हों. लेकिन पूर्व पाकिस्तान के मुजीब संपूर्ण पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनें, सत्ता से पश्चिमी पाकिस्तान का एकाधिकार टूटे, यह जयप्रकाश के लिए यह पाकिस्तान की राजनीति का आंतरिक मामला नहीं, लोकतंत्र के विकास का संकेत था. इसलिए फौजी तानाशाह याहय्या खान व तिकड़मी राजनीतिज्ञ जुल्फिकार अली भुट्टो की जोड़ी ने मिल कर जब शेख मुजीब को उनके इस अधिकार से वंचित करने की चालें शुरू कीं तो जयप्रकाश सावधान हो गए. तब वे देश-दुनिया से प्राय: कटे, बिहार के ठेठ ग्रामीण क्षेत्र मुसहरी में ग्रामस्वराज्य का प्रयोग करने बैठे हुए थे. लेकिन एक सावधान समाजविज्ञानी के नाते वे हर नई हलचल पर नजर रखते थे. शेख मुजीब को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की हर तिकड़म करने के बाद पश्चिम पाकिस्तान ने पूर्व पाकिस्तान पर बाजाप्ता हमला ही बोल दिया. फौजी दमन का ऐसा नृशंस दौर शुरू हुआ कि जिसकी तब भी और आज भी कल्पना कठिन है. मुसहरी की अपनी झोपड़ी के अंधेरे में, ट्रांजिस्टर से वहां की खबरें सुनते जयप्रकाश को पत्तों की तरह कांपते और विह्वल होते मैंने देखा है. उन्होंने बांग्लादेश संकट के एकदम शुरुआती दौर में ही अपने संपर्कों से दिल्ली को खबर भिजवाई थी कि भारत सरकार को पूर्व पाकिस्तान की घटनाओं की तरफ से न चुप रहना चाहिए, न उदासीन. लेकिन दिल्ली की हवा-पानी का ही दोष है शायद कि वह तब भी और आज भी ऊंचा ही सुनती है. जब किसी ने जयप्रकाश से कहा कि यह सब राजनीतिक बातें राजनीतिज्ञों के लिए ही छोड़ देनी चाहिए तब बहुत दर्द से वे बोले थे : मैं क्या करूं, उनकी चीखें मेरे कानों में गूंजती हैं ! पवनार आश्रम से सलाह आई : सरकार के पास ज्यादा जानकारियां होती हैं ! जयप्रकाश ने जवाब भिजवाया : सवाल जानकारी का नहीं, उसे समझने का है.

जयप्रकाश पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के दमन को लोकतंत्र के दमन का नाम दिया और शांतिमय जनांदोलन का रास्ता अपनाने के लिए शेख मुजीब का समर्थन किया. तब तक देश-दुनिया इस दमन की दर्शक बनी बैठी थी. शेख मुजीब ने सारे पूर्वी पाकिस्तान को जिस तरह प्रतिकार में खड़ा किया और जैसी राष्ट्रव्यापी हड़ताल आयोजित की उसे देखकर जयप्रकाश झूम उठे और अपने सर्वोदय साथियों से कहने लगे कि यह गांधी की दिशा को उन्नत करने वाला है. पाकिस्तानी दमन देखते-देखते नरसंहार में बदल गया. सड़कों पर, विश्वविद्यालयों में, संस्थानों में निहत्थे लोग थोक के भाव से मारे जाने लगे. घटनाएं इतनी तेजी से घट रही थीं कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी विमूढ़-सी हो रही थीं. विपक्ष के पास कोई दृष्टि नहीं थी. लेकिन यहां देश में भी और वहां दुनिया में भी एक अनोखा विभाजन आकार लेने लगा था : जनता इस दमन के खिलाफ मुखर होती जा रही थी, ‘जनता की सरकारें’ मौन साधे हुई थीं. पश्चिमी देश अधिकांशत: इसे ‘अश्वेतों की असभ्यता’ का नाम दे कर अपनी राजनीतिक चालें चल रहे थे.

संकट आगे बढ़ा तो मुजीब साहब ने पूर्व पाकिस्तान को बांग्ला भाषा व संस्कृति से जोड़ कर एक नया ही संदर्भ खड़ा कर दिया और पूर्व पाकिस्तान की जगह ‘बांग्लादेश’ नाम हवा में तैरने लगा. जयप्रकाश ने इसे नई राजनीतिक दिशा दी और पहली बार यह मांग उठाई कि भारत सरकार बांग्लादेश को राजनीतिक मान्यता दे ! विनोबा समेत कई लोगों को लगा कि जयप्रकाश सर्वोदय की लक्ष्मण-रेखा लांघ रहे हैं. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को लगा कि जयप्रकाश अपरिपक्वता का परिचय दे रहे हैं. लेकिन बांग्लादेश को राजनीतिक मान्यता की जयप्रकाश की मांग ने विश्व जनमत को एक दिशा दे दी. लोकतंत्र में जनमत एक हथियार है, ऐसा कहा था गांधी ने; जयप्रकाश उस हथियार को बनाने में जुट गये. इंदिराजी के लिए यह दवाब खासा मुश्किल साबित हुआ. वे अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन व पश्चिमी देशों के रवैये से घबराई हुई थीं. उन्हें कहीं यह भी लग रहा था कि जयप्रकाश उनसे राजनीतिक पहल छीनते जा रहे हैं. उन्होंने मान्यता का सवाल यह कह कर टाल दिया कि दुनिया भर का माहौल तैयार करने के बाद ही ऐसा करना उचित होगा. उन्होंने सोवियत संघ के साथ शांति-सुरक्षा की संधि कर अमरीका को जवाब देने की कोशिश की. जयप्रकाश इस कूटनीति को समझ भी रहे थे और इसका समर्थन भी कर रहे थे लेकिन वे यह भी कह रहे थे कि भारत को मजबूत राजनीतिक पहल करनी चाहिए.

जयप्रकाश कह ही नहीं रहे थे, वे आगे बढ़ते जा रहे थे. भारत सरकार जब ऊहापोह में फंसी थी, भारत के जयप्रकाश बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी के साथ तालमेल बना चुके थे और पूर्वी पाकिस्तान की धरती पर जा कर परिस्थिति का आकलन कर आए थे. मुजीब तब तक मंच से गायब कर दिए गए थे लेकिन अवामी लीग के दूसरे नेताओं के साथ जयप्रकाश का सीधा संपर्क बन चुका था, उनमें मंत्रणा चलने लगी थी. जयप्रकाश सरकार से अलग व समानांतर भूमिका में काम  कर रहे थे. वे देश में जगह-जगह सभाएं कर रहे थे, प्रेस से बातें कर रहे थे, दुनिया भर से नागरिक स्तर पर संवाद चला रहे थे. उनके अनथक प्रयासों व उनके अकाट्य तर्कों से बांग्लादेश को मान्यता देने का सवाल सत्ताओं के गले की फांस बनता जा रहा था, तो विश्व जनमत को एक केंद्रबिंदु प्रदान कर रहा था.

वे बार-बार यही सवाल पूछते रहे : हम देखते रहें और हमारे पड़ोस में उठी लोकतांत्रिक आकांक्षा को फौजी बूटों तले कुचल दिया जाए तो लोकतंत्र का संरक्षण कैसे होगा ?  वे हर मंच से यह साफ करते थे कि सवाल पाकिस्तान का नहीं, लोकतंत्र का है. पाकिस्तान ने खुद को ऐसे चक्रव्यूह में फंसा लिया है तो उसे ही इससे निकलने की पहल करनी होगी.  वे यह भी साफ कह रहे थे कि इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता एक ही है कि पाकिस्तान बंगबंधु मुजीब को वापस मंच पर लाए, उनसे बराबरी में बातचीत करे और उनको पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाए. वे बार-बार पूछते थे : अपने ही संविधान और अपने ही चुनाव को धता बता कर कोई लोकतंत्र यशस्वी कैसे हो सकता है ? पाकिस्तान संभले, दमन बंद करे व अपना देश संभाले ऐसा कहते हुए वे पाकिस्तान को सावधान भी कर रहे थे कि ऐसा करने का वक्त बीतता जा रहा है. बांग्लादेश की स्वतंत्र भूमिका बनती जा रही है.

इंदिरा गांधी अब समझ रही थीं कि जयप्रकाश की भूमिका देश-दुनिया में लोक-आकांक्षा बन गई है. उन्हें यह भी पता चला कि गांधी-विचार से प्रभावित कई विदेशी समाजशास्त्री अपने मित्र जयप्रकाश को बांग्लादेश के संदर्भ में उनकी भूमिका समझाने के लिए अपने देश में आमंत्रित कर रहे हैं. इंदिराजी को सलाह दी गई कि भारत सरकार जयप्रकाश को भारत का पक्ष समझाने के लिए अपना दूत बना कर भेजे तो वे एक रचनात्मक भूमिका अदा कर सकते हैं. जयप्रकाश ने अपनी स्थिति स्पष्ट की: मैं भारत सरकार की हर संभव मदद करने को तैयार हूं लेकिन उसका दूत या प्रतिनिधि बनकर नहीं. मेरी भूमिका और सरकार की भूमिका अलग-अलग है फिर भी बांग्लादेश को मान्यता देने की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बने, यह हम दोनों चाहते हैं. मैं अपनी निजी हैसियत से ही जाऊंगा लेकिन सरकार के लिए सुविधाजनक जमीन बनाने का काम करूंगा. इंदिराजी ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया और यह सुविधा भी बना दी कि जयप्रकाश जहां भी जाएंगे वहां का भारतीय दूतावास हर तरह की अनुकूलता बनाने में उनकी मदद करेगा.

जयप्रकाश का स्वास्थ्य ऐसा नहीं था कि वे ऐसी जटिल, कूटनीतिक मुहिम पर निकलते लेकिन अभी मेरे नहीं, देश व लोकतंत्र के स्वास्थ्य का सवाल है, कह कर वे अ-सरकारी- सरकारी प्रतिनिधि की दोहरी भूमिका निभाने का करतब करने 1971 के मध्य में निकल पड़े. पहला पड़ाव काहिरा था. फिर वे यासर अराफात से मिले. युगोस्लाविया में मार्शल टीटो और जर्मनी में अपने पुराने मित्र चांसलर विली ब्रांट से मिले. वे पोप से भी मिले. मास्को, हेलसिंकी, फ्रांस, इंग्लैंड और अमरीका होते हुए वे वापस लौटे. ‘ यह पाकिस्तान का आंतरिक मामला है’, जैसी भूमिका समझाने वालों को उनका यह जवाब अवाक कर गया  था कि लोकतंत्र किसी का भी आंतरिक मामला नहीं होता है. दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र लोक का मामला है और उसका दमन हर किसी की चिंता का विषय होना चाहिए. अमरीका में जब उसके काइयां विदेशमंत्री हेनरी कीसिंजर ने भी ‘आंतरिक मामला’ की ढाल सामने की तो जयप्रकाश ने कहा: मेरे पड़ोसी के घर में लगी आग उसका आंतरिक मामला नहीं हो सकती है क्योंकि उसकी और मेरी छत जुड़ी हुई है. अमरीकी अखबारों ने इसे ही सुर्खी बनाया और यह भी लिखा कि कीसिंजर जयप्रकाश के इस तर्क के सामने निरुत्तर रह गये. उनका कोई 40 दिनों लंबा यह दौरा इस अर्थ में विफल रहा कि वे सरकारों का रवैया नहीं बदल सके लेकिन इस अर्थ में बेहद सफल रहा कि बांग्लादेश को मान्यता देने का नागरिक आंदोलन खूब मजबूत बना. यह दवाब आगे बहुत काम आया. जयप्रकाश ने इस दौरे में तीन बातें पहचानीं : मुस्लिम देश पाकिस्तान की ज्यादतियों की अनदेखी इसलिए करते हैं कि यह मामला इस्लाम का है; पश्चिमी देशों का ‘सफेद चमड़ी का खोखला घमंड’ अब तक गया नहीं है और तीसरा यह कि सारी दुनिया में लोक और तंत्र का आमना-सामना बढ़ता जा रहा है. बाद में इंदिराजी खुद भी 21 दिनों के ऐसे ही मिशन पर निकलीं और जयप्रकाश जैसी ही विफलता के साथ वापस आईं.

जयप्रकाश देख रहे थे कि उनके अपने भारत में भी तंत्र की जड़ता बनी हुई थी. वह बांग्लादेश की मदद कर तो रहा था लेकिन ऐसी निर्णायक लड़ाई में जैसी खुली मदद जरूरी थी, वह मुक्ति वाहिनी को नहीं मिल पा रही थी. जयप्रकाश अपने प्रभाव से हर तरह से मदद जुटाने में लगे थे और सरकार को भी सुझाव दे रहे थे कि वह खुली सैनिक मदद दे. इंदिराजी ने 4 दिसंबर 1971 को जयप्रकाश का दवाब झटकते हुए कहा कि हमें आदेश देना बंद करें लोग; और दो दिन बाद, 6 दिसंबर को बांग्लादेश को मान्यता दे दी. सत्ता इसी तरह हमेशा अपना हाथ ऊंचा दिखाने में लगी रहती है. उसके बाद का इतिहास यहां दोहराने का प्रयोजन नहीं है. सोवियत संघ को साथ ले कर इंदिराजी ने कूटनीतिक बारीकियों के मोर्चे पर भी और युद्ध में भी पाकिस्तान को पराजित किया. यह प्रकारांतर से अमरीका की कूटनीतिक पराजय भी थी. इंदिराजी का यश आसमान पर था. जयप्रकाश ने भी उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की. लेकिन यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि पाकिस्तान के फौजी शासन की भोंडी कूटनीति और पश्चिम की खोखली हेंकड़ी के कारण अंटक-अंटक कर चलने वाली इंदिरा गांधी को सफलता मिल तो गई लेकिन यह बाजी उल्टी भी पड़ सकती थी और बांग्लादेश का जन उभार कुचला जा सकता था. जयप्रकाश ने देश-विदेश में जैसी हवा बनाई, उससे इस विफलता से बचने में बहुत मदद मिली.

शेख मुजीब ने जयप्रकाश की इस भूमिका को पहचाना और जब वे अपनी अज्ञात कैद से निकल कर, ढाका जाने के लिए लंदन पहुंचे तो विश्व को अपने पहले संबोधन में उन्होंने जयप्रकाश का अलग से जिक्र किया. इंदिराजी ने इसे पसंद नहीं किया. अपने तरीकों से उन्होंने जयप्रकाश से दूरी बनाए रखने की हिदायत भी शेख मुजीब तक पहुंचा दी. ढाका जाने के लिए लंदन से मुजीब दिल्ली पहुंचे तो भी उन्होंने जयप्रकाश को याद किया. ढाका की अपनी विजय-सभा में मुजीब चाहते थे कि जयप्रकाश भी मौजूद रहें लेकिन दिल्ली ने इसे भी हतोत्साहित किया. संघर्ष के दिनों में अवामी लीग के जिन शीर्ष नेताओं से लगातार विार-विमर्श चलता था, वे अब जयप्रकाश के पास आने से हिचकने लगे. आगे का इतिहास बताता है कि बांग्लादेश बनने के साथ ही इंदिराजी का भी और बंगबंधु का काम भी पूरा हो गया. लेकिन बांग्लादेश बन जाने और शेख साहब के प्रधानमंत्री बन जाने से जयप्रकाश का काम पूरा नहीं हुआ.

इतिहास के पन्नों में जयप्रकाश का वह पत्र दबा मिलता है हमें जो पटना से लिखा गया है और जिस पर 31 जनवरी 1972 की तारीख पड़ी है. यह पत्र बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान को लिखा गया है. पत्र भावुकता से शुरू होता है और फिर शेख मुजीब को उनकी गहरी भूमिका समझाता है. शुरू में जयप्रकाश लिखते हैं : “अपनी इस उम्र और स्वास्थ्य के कारण मुझ जैसे आदमी के मन में अब इसके अलावा कोई लालसा बची नहीं है कि बगैर किसी लोभ-लालच-आकांक्षा के, शांत व खुश मन से अपने सिरजनहार से मिल सकूं. लेकिन जिस दिन आप लंदन से दिल्ली आए, उस दिन के ऐतिहासिक अवसर पर वहां हाजिर रहने की जबरदस्त इच्छा ने मुझे विवश-सा कर दिया था. आपके दर्शन करने, आपको फूलों की माला पहनाने और पल भर के लिए आपको अपनी पूरी ताकत से गले लगा लेने के लिए मेरा मन मचल उठा था …” फिर पत्र का भाव बदलता है : “ ईश्वर आपको लंबी उम्र व बढ़िया तंदुरुस्ती दे ताकि आप न केवल अपने व अपने साढ़े सात करोड़ बंधुओं के सपनों का सोनार बांग्ला साकार कर सकें बल्कि इस अभागे उपमहाद्वीप को स्वतंत्र, स्वायत्त राष्ट्रों का सुसभ्य, सुबुद्ध, सहयोगी और समृद्ध समुदाय बनाने के ऐतिहासिक कार्य में मददगार हो सकें… विनोबाजी, जवाहरलालजी, राममनोहर लोहिया और मेरे सहित इस देश के कई लोगों का सपना रहा है कि केवल भारतीय उपमहाद्वीप का नहीं बल्कि समूचे दक्षिण एशिया का भविष्य इसमें ही निहित है कि इस क्षेत्र के सभी देश किसी-न-किसी प्रकार के संघ अथवा भाईचारे से बंधे-जुड़े रहें… ऐसा लगता है मानो नियति ने राजनीतिक, आर्थिक और अन्य हितों का एक भाईचारा खड़ा करने के लिए इस क्षेत्र की रचना की है !… इस सपने में आपको साझीदार बनाने का कारण यह है कि मेरे विचार में इस सपने को साकार करने के लिए आवश्यक नैतिक और राजनीतिक व्यक्तित्व आपके पास है… इसके अलावा 51 साल की आपकी उम्र आपको इस ऐतिहासिक, चुनौती भरे काम को अंजाम तक पहुंचाने का भरपूर समय भी देती है… आपने लंदन में खुद को गांधी परंपरा का व्यक्ति बताया था … तो मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि आजकल चलते-फिरते जिस समाजवाद की बात करना फैशन हो गया है उससे गांधीजी का समाजवाद भिन्न था. वे उसे सर्वोदय कहना पसंद करते थे और उनका समाजवाद या सर्वोदय ‘अंत्योदय’ से शुरू होता था… बांग्लादेश की परिस्थितियों के कारण राज्य की सर्वोच्च सत्ता अपने हाथ में लेना आपके लिए अनिवार्य बन गया था लेकिन गांधीजी की रीति इससे भिन्न थी… इसके बावजूद मैं यह उम्मीद रखता हूं कि जिस तरह अपने लड़खड़ाते स्वास्थ्य और प्रशासन पर अपनी पकड़ ढीली होते जाने के बावजूद जवाहरलालजी सत्ता में बने ही रहे, आप वैसा नहीं करेंगे…” वे मुजीब साहब को सावधान करते हैं कि वे भारत की गलतियां न दोहराएं और नौकरशाही को समाजवाद का आधार न बनाएं… “ मैं अपनी तरफ से यह उत्कट आशा रखता हूं कि आपके नेतृत्व में बांग्लादेश को समाजवाद की अपनी खामियों और भूलों को समझने में हमारी तरह चौथाई सदी के बराबर समय नहीं लगेगा… आपको इस तरह लिखने का मुझे कोई अधिकार नहीं है. मेरे समान एक साधारण नागरिक एक महान राष्ट्र के आपके जैसे निर्विवाद महान नेता को सलाह देने की धृष्टता भला कैसे करे ! लेकिन गांधीजनों के एक अदना प्रतिनिधि के रूप में आपके और आपकी बहादुर व धैर्यवान जनता के प्रति अपनी स्नेह-भावना के वशीभूत होकर मैंने यह सब आपको लिखा है.”

जयप्रकाश यह लिख सके; बंगबंधु कोई जवाब नहीं दे सके. इतिहास ने शेख साहब के कंधों पर संभावनाओं की जो गठरी डाल दी थी, वे उससे कहीं छोटे साबित हुए. 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में जो कुछ हुआ उसे दूसरों से एकदम भिन्न धरातल पर जयप्रकाश ने पहचाना था और उसे साकार करने में अपना पूरा बल लगा दिया था. लेकिन मुजीब न वह दिशा समझ सके और न वैसी हैसियत ही बना सके.  सत्ता की सबसे बड़ी गद्दी पर पहुंच कर वे खो गये. वे न दूरदर्शी राजनेता साबित हुए, न कुशल प्रशासक. सत्ता की ताकत से देश को मुट्ठी में रखने की कोशिश में वे सारे अधिकार अपने हाथों में समेटते गये और अंतत: 1975 में खुद को प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति बना लिया और एक तानाशाह की भूमिका में आ गये. लेकिन उनका अंत बहुत करीब था. 15 जनवरी 1975 को फौजी व राजनीतिक बगावत में वे सपरिवार मार डाले गये. तब जयप्रकाश अपने देश की दिशा मोड़ने के अपने अंतिम अभियान के संचालन के ‘अपराध’ में चंडीगढ़ के अस्पताल में नजरबंद थे. वे नजरबंद तो थे लेकिन उनकी नजर बंद नहीं थी. देश-दुनिया की हलचलों के प्रति वे सावधान थे. चंडीगढ़ की नजरबंदी के दरम्यान वे डायरी लिखते थे. अपनी उस जेल डायरी में, 16 अगस्त 1975 को वे लिखते हैं : “ बांग्लादेश से अत्यंत पीड़ादायक खबर है- अविश्वसनीय की हद तक ! लेकिन जिस तरह मुजीब ने अपनी निजी व दलीय तानाशाही वहां स्थापित कर रखी थी, यह उसका ही नतीजा है. दिल्ली में उन दिनों यह अफवाह गाढ़ी हो चली थी कि मुजीब ने जो किया है उसकी योजना, उनके भरोसे के लोगों के साथ मिल कर दिल्ली में ही बनाई गई थी. उस वक्त अपने एकाधिकार का औचित्य बताने के लिए मुजीब ने भी वैसे ही कारण दिए थे जैसे अब श्रीमती गांधी दे रही हैं. तब यह बात भी हवा में थी कि यदि श्रीमती गांधी की चली तो वे भी बांग्लादेश के रास्ते ही जाएंगी.” अगले दिन की डायरी में वे फिर बांग्लादेश का सवाल उठाते हैं और मुजीब व बांग्लादेश के प्रति अपनी पुरानी भावनाओं का जिक्र करते हुए लिखते हैं: “लेकिन जब उन्होंने रंग बदला और एकदलीय शासन की स्थापना कर ली, उनके प्रति मेरे कोमल भाव हवा हो गये. मैं उनकी दिक्कतें समझ रहा था. लेकिन यदि उनमें योग्यता होती तो अपनी जनता पर उनका जैसा गहरा असर और अधिकार था, बहुत कुछ जवाहरलाल जैसा, उसके सहारे वे लोकतंत्र को दफनाए बिना भी परिस्थिति पर काबू कर सकते थे. लेकिन उन्होंने मूर्खता की और विफल हुए. कल जब मैंने उनकी हत्या की खबर पढ़ी तो मैं उदास जरूर हुआ लेकिन मुझे कोई धक्का नहीं लगा, न मेरे दिल में उनके लिए कोई गहरा संताप ही जागा.” 22 अगस्त 1975 की डायरी फिर बांग्लादेश का जिक्र करती है : “ बांग्लादेश की खबरें अधिकाधिक भयावह होती जा रही हैं. बगावत के दिन मुजीब के साथ-साथ उनकी पत्नी, उनके तीन बेटों, दो बहुओं, दो भतीजों जैसे मुजीब के निकटस्थ 18 रिश्तेदारों की हत्या हुई. ऐसी क्रूरता को समझ पाना भी कठिन है… मुजीब को मार कर सारी सत्ता हथिया लेने के बाद अब खोंडकर मुश्ताक अहमद लोकतंत्र की बात कर रहे हैं. मैं यह खेल समझता हूं. सारे तानाशाह ऐसी ही बातें करते हैं. हमारे पास भी तो अपनी श्रीमती गांधी हैं ! लेकिन मुजीब के सारे परिवार को क्यों नष्ट कर दिया ?… जो भी हो, हाल-फिल्हाल के इतिहास का यह सबसे काला कारनामा है.”

अब न जयप्रकाश हैं, न शेख मुजीब, न इंदिराजी. वह बांग्लादेश भी नहीं है जिसे जयप्रकाश ने एक संभावना के रूप में देखा था. आज तमाम देशों की भीड़ में बांग्लादेश भी शरीक है और तमाम भेंड़ियाधसान शासकों की भीड़ में उसकी भी अपनी जगह है. लेकिन आज बांग्लादेश किसी संभावना का नाम नहीं है. वह संभावना क्या थी, कैसे बनी और क्यों खो गई, यह जानना जरूरी इसलिए हो जाता है कि इतिहास इसी तरह वर्तमान को रचता है. यह लेख इसलिए ही लिखा गया. इसलिए नहीं कि जयप्रकाश की भूमिका का गुणगान किया जाए, न इसलिए कि यह खतरा है कि हम जयप्रकाश को भूल जाएं. खतरा यह है कि हम अपना इतिहास ही न भूल जाएं ! बांग्लादेश को भी और हमें भी अपना इतिहास बार-बार पढ़ने की और उसे साफ-साफ समझने की जरूरत है. जो अपना इतिहास भूल जाते हैं वे वर्तमान को न समझ पाते हैं, न बना पाते हैं. हम सब इसी त्रासदी से गुजर रहे हैं.

(01.04.2021)

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શિક્ષણની હાલત ન સુધરે એને માટે આખું ગુજરાત તનતોડ મહેનત કરે છે …

રવીન્દ્ર પારેખ|Opinion - Opinion|2 April 2021

બાળક 6 વર્ષનું ન હોય તો એક જમાનામાં તેને પ્રાથમિક શાળામાં પ્રવેશ અપાતો ન હતો, ત્યારે ખાનગી સ્કૂલોનો વાવર ન હતો ને કે.જી., નર્સરીનો પવન પણ ફૂંકાયો ન હતો. એ પહેલાં બાલમંદિરનો થોડો ઉઘાડ થયેલો. છોકરું ઘરમાં પજવે તેના કરતાં બાલમંદિરનું માથું ખાય એ માતાને ઠીક લાગતું એટલે બાળકની ત્યાં પધરામણી થતી, ત્યાં પણ બાળક રમે તે કરતાં ભણાવી દેવાની ઉતાવળ તો હતી જ. એ પછી કે.જી., નર્સરી શરૂ થયું, એનો હેતુ પણ બાળકના નૈસર્ગિક વિકાસનો જ હતો, પણ પોતાનું બાળક એ.બી.સી.ડી. બોલતું થઈ જાય ને મહેમાનો સામે વટ પડે એવી માબાપને ઇચ્છા રહેતી ને મા ફરિયાદ કરતી કે વરસ થવા આવ્યું, પણ છોકરું, એપલ ખાવા છતાં, એ ફોર એપલ, બોલતું નથી. એટલે સ્કૂલોને પણ ચાનક ચડી, છોકરાંઓને અંગ્રેજ બનાવી દેવાની ને એમ ફી વધતી ગઈ ને પછી તો ધંધો ધમધોકાર ચાલવા લાગ્યો. એમાં થયું એવું કે ખાનગી સ્કૂલોનો રાફડો ફાટયો ને સરકારી સ્કૂલો ઘટતી ગઈ. બાળકનો વિકાસ નાની ઉંમરે થાય એ સાચું, પણ તેને ભણાવીને બોચિયું કરી દેવાનું તો કોઈ પણ શિક્ષણ વ્યવસ્થામાં નથી. સારું છે કે માતા નર્સરીમાં જ બાળકને જન્મ નથી આપતી, નહિતર જન્મતાંની સાથે જ બાળક એ.બી.સી.ડી. બોલતું થઈ જાય. આવા પ્રકારના ઉતાવળિયા બાળશિક્ષણથી, આગળ જતાં બાળકને કોઈ લાભ થયાનું બહાર આવ્યું નથી, કારણ ડફોળ હોવાનું તો ઉંમર વધતાં જ ખબર પડે છે.

સાચું તો એ છે કે આપણે શિક્ષણ બાબતે સભાન જ નથી.

આપણે એ.સી., પંખા, તગડી ફી, માબાપનું સ્ટેટસ વગેરેને જ શિક્ષણ માની લીધું. એમાં બાળક ગૌણ થઈ ગયું. તે તો જાણે કાર કે રિક્ષામાં આવનજાવન કરતું દફ્તર જ થઈ ગયું. સરકારો ઘણી આવી ને તેણે પણ જોયું કે ખાનગી સ્કૂલોને લાઇસન્સ આપી દેવામાં જ “મળતર” છે ને એને પગલે કોઈ પણ પૈસાદાર હાલીમવાલીને સ્કૂલ ખોલવાની છૂટ આપી દેવાઈ. આ રીતે સ્કૂલો ખોલનારાને અડ્ડો ચલાવવો કે સ્કૂલ ચલાવવી, એ બેમાં બહુ ફરક ન હતો. સરકારે ખાનગી સ્કૂલોને સંચાલકોના રૂપમાં ઘણા સરમુખત્યારો પૂરા પાડ્યા છે ને એમણે નબળા આચાર્યો, નબળા શિક્ષકો ને તગડા વાલીઓને સાથે રાખીને શિક્ષણની પથારી ફેરવી દીધી છે. વાલીઓને સારી સ્કૂલને નામે વર્ષો સુધી સંચાલકોએ બેવકૂફ બનાવીને લૂંટયા જ છે. વાલીઓને પણ ખરા ખોટા ધંધા કરીને ફી ચૂકવવા સિવાય સંતાનનાં શિક્ષણ સંદર્ભે ભાગ્યે જ બીજું કૈં સૂઝ્યું છે. કોરોનામાં પણ એમને તો એક જ રસ રહ્યો છે. સ્કૂલો બંધ હોય તો ફી ન લેવાય ને ચાલુ હોય તો ફીમાં ઘટાડો થાય. એટલું થાય તો વાલીઓને ફરજ પૂરી થઈ ગયાનું લાગે છે. એની સામે સરકારી સ્કૂલો સુધરી રહી છે, પણ વાલીઓને શિક્ષણ કરતાં સંપત્તિ લૂંટાવવાનો રસ વધારે છે એટલે સરકારી સ્કૂલોને એ અસ્પૃશ્ય ગણે એમાં નવાઈ નથી.

એનો અર્થ એવો નથી કે બધી સરકારી સ્કૂલો ઉત્તમ છે ને બધી ખાનગી સ્કૂલો નબળી જ છે. એવું નથી. એવું હોત તો જે કૈં આશા હજી શિક્ષણ માટે છે એ દીવો ક્યારનો હોલવાઈ ગયો હોત. આ સંજોગોમાં પણ થોડા સાચા ને ઉત્તમ શિક્ષકો ને વિદ્યાર્થીઓ આવ્યા જ છે તે ભૂલવા જેવું નથી.

ત્રીસ માર્ચને રોજ શિક્ષણ મંત્રીએ એવી જાહેરાત કરી કે અમદાવાદ અને ગાંધીનગર સહિતના 6 જિલ્લાની પ્રાથમિક શાળાઓમાં લાયકાત અને તાલીમ વિનાના 4,510 શિક્ષકો છે, એમાંથી એકલા અમદાવાદમાં જ 2,967 છે. આ તો શિક્ષણ મંત્રીનો આંકડો છે, એ ઉપરાંત લાયકાત વિનાના બીજા શિક્ષકો ન જ હોય એમ માનવાને કોઈ કારણ નથી. RTE 2009થી અમલમાં આવ્યું. એ પહેલાં 1થી 7 માટે પી.ટી.સી.ની લાયકાત જરૂરી હતી. RTE પછી 1થી 5 માટે પી.ટી.સી. સમકક્ષ અને 6થી 8 માટે સ્નાતક કક્ષાના તાલીમી શિક્ષકનો આગ્રહ રખાયો. શિક્ષણ મંત્રીનું કહેવું છે કે તાલીમી શિક્ષકો ન મળતાં લાયકાત વગરના શિક્ષકોની નિમણૂક કરવામાં આવી. અહીં પ્રશ્ન એ થાય કે ઢગલો તાલીમી અને લાયકાતવાળા શિક્ષકો બેકાર બેઠા હોય ત્યારે લાયકાત વગરના શિક્ષકોની નિમણૂક કોણે અને કેમ કરી? એ તો દેખીતું છે કે લાયકાત વગરના શિક્ષકો એમને એમ તો સ્કૂલોમાં નહીં ભરાઈ નહીં હોય! એમની નિમણૂક કરનારાઓ લાયકાતવાળા હતા કે એ પણ એવા જ લેભાગુ હતા? કયો લાભ ખાટવા એ લોકોએ આવા શિક્ષકોની નિમણૂક કરી? શિક્ષણ મંત્રી નિખાલસતાથી લાયકાત વગરના શિક્ષકોની જાહેરાત કરે ત્યારે ગમે, પણ એવી નિખાલસતાથી સમસ્યા ઉકલતી ન હોય તો એનો કશો અર્થ નથી. શિક્ષણ મંત્રી પૂરી કડકાઈથી એવી ખોટી નિમણૂક આપનાર અધિકારીઓ પર શિક્ષાત્મક કાર્યવાહી કરે તો જ એ નિખાલસતા લેખે લાગે.

શિક્ષણ મંત્રીએ 25 માર્ચે એવી જાહેરાત પણ કરી કે રાજ્યમાં 9,710 શિક્ષકો અને 927 અધ્યાપકોની નવી ભરતી કરવામાં આવશે. આશા રાખીએ કે આ ભરતી લાયક અને તાલીમી ઉમેદવારોથી થાય. એ જ દિવસે શિક્ષણ મંત્રીએ એમ પણ કબૂલ્યું કે રાજ્યના પાટનગર ગાંધીનગર જિલ્લામાં એક જ સરકારી શાળા છે. એનો અર્થ એ થયો કે સરકારી સ્કૂલમાં ભણવું હોય તો પણ વિદ્યાર્થીઓ પાસે વિકલ્પ નથી ને તેણે ખાનગી સ્કૂલમાં જ જવું પડે. કમાલ તો એ છે કે દાયકા પહેલાં આ જ ગાંધીનગર જિલ્લામાં 10 માધ્યમિક અને ઉચ્ચતર માધ્યમિક શાળાઓ હતી જ. જો હતી, તો એ બંધ કેમ થઈ? ખરેખર તો ખાનગી સ્કૂલોને અપાયેલું વધારે પડતું ઉત્તેજન અને સરકારી સ્કૂલો ન ચલાવવાની દાનત આનાં મૂળમાં છે. શિક્ષણનું ધોરણ કથળ્યું એમાં ખાનગી સ્કૂલોને અપાયેલું ઉત્તેજન જવાબદાર છે. લાયકાત ને તાલીમ વગરના શિક્ષકો ખાનગી સ્કૂલોમાં વધુ નિમણૂક પામ્યા હોવાનો સંભવ છે, કારણ જે ખાનગી સ્કૂલોએ ધંધો જ કર્યો છે તે ઓછી લાયકાતવાળા શિક્ષકો નીમે તો ઓછા પગારથી ચાલી જાય. એમાં ઓછી લાયકાતવાળા પર ઉપકાર થાય ને વધુ ફીને કારણે નફાનો માર્જિન પણ વધે. આવો લાભ કોણ છોડે?

તાજેતરમાં જ પાટણ યુનિવર્સિટીમાં એમ.બી.બી.એસ.ના ત્રણ નાપાસ વિદ્યાર્થીઓને પાસ કરી દેવાનું બહાર આવ્યું છે. આવી રીતે ડોક્ટરો, એન્જિનિયરો, વકીલો, અધ્યાપકો બહાર પડે ને ધંધે લાગે તો આપણે કેવા ધંધે લાગી જઈએ તે કહેવાની જરૂર ખરી?

એક વાત સ્પષ્ટ છે કે આપણે શિક્ષણ જોડે ઘણી રમત કરી છે. એને ગંભીરતાથી લીધું જ નથી. એમાં ઘણા અખતરા થયા છે, કોરોના કાળમાં તો વધારે. એ પણ છે કે દરેક ક્ષેત્રમાં શિક્ષણની સાથે તાલીમ જરૂરી છે. પાઇલટ હોય ને વિમાન ચલાવતાં ન આવડે કે ડ્રાઇવિંગ લાઇસન્સ હોય ને કાર ચલાવતાં ન આવડે કે સર્જયન હોય ને સર્જરી ન આવડે તો શું થાય તે સમજી શકાય એવું છે, છતાં બોગસ સર્ટિફિકેટ પર વેપલો કરનારાઓ મળી જ રહે છે. બધે જ વત્તે ઓછે અંશે આવી ભ્રષ્ટતા વ્યાપેલી જ છે, એમાં સૌથી વધુ ભ્રષ્ટતા શિક્ષણ ક્ષેત્રે છે. તે તરફ ધ્યાન ઓછું જ ગયું છે, કારણ તેનાથી થતું નુકસાન તરત દેખાતું નથી, પણ તેની દૂરગામી અસરો ઊંડી ને વ્યાપક હોય છે. એમાં લાયકાત કે તાલીમ વગરના શિક્ષકોથી કામ લેવાય જ નહીં, પણ આપણે શિક્ષકને બહુ હળવાશથી લીધો છે. એની પાસે કારકૂની કરાવીએ છીએ, વસતિ ગણતરી કરાવીએ છીએ. એને ચૂંટણીમાં જોતરીએ છીએ ને અપેક્ષા રાખીએ છીએ કે તે ઉત્તમ શિક્ષણ આપે. તે બી.એડ.ની તાલીમ લે છે તે વસતિ ગણતરીની માહિતી ભેગી કરવા? તે પીએચ.ડી. થાય છે તે શું પ્રિસાઇડિંગ ઓફિસર બનવા? આવાં કામો શિક્ષિત બેકારોને અપાય તો તેમને કામ અને દામ મળશે ને શિક્ષક તેની ફરજ સારી રીતે બજાવી શકશે.

એક તરફ શિક્ષણ મંત્રી લાયકાત વગરના શિક્ષકોની નિમણૂક અંગે ફરિયાદ કરે છે, પણ શિક્ષણ વિભાગ જ સરખી લાયકાતવાળા શિક્ષકો વચ્ચે ભેદ કરે છે એ પણ જોવાવું જોઈએ. એક શિક્ષક પોતાની લાયકાત અને તાલીમને જોરે પૂરો પગાર મેળવે છે ને બીજો એટલી જ પાત્રતાવાળો શિક્ષક વિદ્યા સહાયક તરીકે ઓછો પગાર મેળવે છે ત્યારે લાયકાતવાળા શિક્ષકનો દુરુપયોગ થઈ રહ્યો છે એવું નહીં? ખરેખર તો શિક્ષણ વિભાગે સમાન લાયકાત અને તાલીમ ધરાવતા શિક્ષકોને સમાન તકો આપી વિદ્યા સહાયકની જગ્યાને પૂરા પગારની જગ્યામાં તબદીલ કરી દેવી જોઈએ. આવું થશે?

એનું આશ્ચર્ય જ છે કે આપણે પટાવાળાની લાયકાત નક્કી કરી છે, પણ પ્રધાનની લાયકાત નક્કી કરી નથી. પ્રધાન લાયકાતવાળો મળી જાય તો નસીબ, પણ કોઈ અભણ પ્રધાન બની જાય તો તેને રોકી શકાતો નથી. એવા પ્રધાનના હાથ નીચે કામ કરતા અધિકારીઓ ઉચ્ચ લાયકાત ધરાવતા હોય તેની પૂરી કાળજી રખાય છે. ટૂંકમાં, મંત્રી અંગૂઠા છાપ હોય તો તેનો વાંધો નથી. એ કેવું વિચિત્ર છે કે સ્કૂલ ચલાવવા તાલીમની અપેક્ષા છે, પણ દેશ ચલાવવા કોઈ મંત્રી માટે લાયકાત કે તાલીમ જરૂરી નથી ગણાઈ!

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પ્રગટ : ‘આજકાલ’ નામક લેખકની કટાર, “ધબકાર”, 02 ઍપ્રિલ 2021

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નદી જોડાણની યોજનામાં આયોજન કેટલું?

કિરણ કાપુરે|Opinion - Opinion|2 April 2021

હાલમાં મધ્ય પ્રદેશના મુખ્ય મંત્રી શિવરાજસિંઘ ચૌવ્હાણ અને ઉત્તર પ્રદેશના મુખ્ય મંત્રી યોગી આદિત્યનાથ વચ્ચે કરાર થયો; અને તે કરારને વધાવવા માટે ઓનલાઈન મિટિંગમાં વડા પ્રધાન નરેન્દ્ર મોદી પણ ઉપસ્થિત રહ્યા. ઘટના હતી મધ્ય પ્રદેશની કેન નદી અને ઉત્તર પ્રદેશની બેતવા નદીને જોડવાની. રાષ્ટ્રિય પ્રોજેક્ટ તરીકે આ પ્રોજેક્ટને મૂકવામાં આવ્યો છે અને તેનો ખર્ચ પણ કેન્દ્ર દ્વારા ઊઠાવવામાં આવશે. બંને રાજ્યોના ભાગે માત્ર દસ ટકા રકમ ખર્ચ પેટે આવશે. આ પ્રોજેક્ટને પૂરો કરતાં આઠ વર્ષનો સમય અંદાજવામાં આવ્યો છે ને પ્રોજેક્ટનો પૂરો ખર્ચ 37,611 કરોડ થશે. ખર્ચની રકમ અને લાગનારા સમય પરથી આ પ્રોજેક્ટનો વ્યાપનો અંદાજ લગાવી શકાય. આ ઉપરાંત, તેનો જે લાભ ગણાવવામાં આવી રહ્યાં છે તે પણ મસમોટા છે. જેમ કે, દસ લાખ હેક્ટરથી વધુ ખેતીની જમીનને સિંચાઈનું પાણી ઉપલબ્ધ થશે, 62 લાખ લોકોને પીવાનું સ્વચ્છ પાણી મળશે અને તેનાથી સારી એવી વીજળીનું ઉત્પાદન પણ થશે. આવા તો અસંખ્ય લાભ મળશે તેવા દાવા કેન્દ્ર અને બંને રાજ્ય સરકાર કરી રહી છે. પરંતુ નદીઓને જોડવાનું કાર્ય એક પ્રોજેક્ટ માત્રથી થઈ જાય? જોડવાથી લાભ થાય કે નુકસાન? કુદરતને વળોટીને જ્યારે આવું પગલું લેવાય ત્યારે તેનું પર્યાવરણીય નુકસાન કેટલું થાય? ઉપરાંત, નદીઓને જોડીએ ત્યારે ડૂબમાં આવતાં વિસ્તારોનું શું? આવાં અનેક પ્રશ્નો અત્યારે આ રિવરલિંક પ્રોજેક્ટને લઈને પૂછાઈ રહ્યા છે. પ્રોજેક્ટને લઈને કાગળ અને ગ્રાઉન્ડ પર કેટલો ભેદ છે તે વિશે જાણીએ …

નદીઓને જોડવાને લઈને અનેકવાર કેન્દ્રની સરકાર પાસે પ્રસ્તાવ આવતા ગયા અને તેના પર વિચાર થયો, ક્યારેક અમલ માટે કરારેય થયા, પણ આજે જે સ્થિતિ કેન નદી-બેતવા નદી અંગે આવી છે તેવું નહોતું બન્યું. વિધિવત્ રીતે નદીઓને જોડવાની યોજનાનો અમલ આ રીતે નિર્ધારથી થયો નહોતો. આવું બન્યું એટલાં માટે કે નદીઓને જોડવાનો પ્રોજેક્ટ જંગી લાભ બતાવીને તેને સાકાર કરવાનાં સ્વપ્નાં જોવામાં આવ્યાં તેમ તેની સામેના પડકાર પણ હતા. આ પડકારોને પહોંચી વળવાની અત્યાર સુધી ભીતિ હતી, પણ વર્તમાન સરકારે તે ભીતિને કોરાણે મૂકીને આ પ્રોજેક્ટના શ્રીગણેશ કરી દીધા છે.

નદીઓ જોડવાનો પહેલવહેલાં પ્રોજેક્ટ ભારતમાં અંગ્રેજ શાસન દરમિયાન બ્રિટિશ સૈન્ય એન્જિનિયર આર્થર થૉમસ કૉટન લાવ્યા હતા. તે કાળે નદીઓને જોડવાનો ઉદ્દેશ માત્ર ને માત્ર અંગ્રેજોને નદીઓ વચ્ચે નહેર બનાવવાથી બંદરની સુવિધા નિર્માણ કરવાનો હતો. પણ આજે જેટલો આ પ્રોજેક્ટ ખર્ચાળ છે, તેમ તે કાળે તેની સામેની મુશ્કેલી ખૂબ હતી. તેથી તે વાત કાગળ પર જ રહી. પછી 1970માં તત્કાલિન સિંચાઈ મંત્રી ડો. કે.એલ. રાવ દ્વારા પણ નદીઓના જોડવાનો પ્રસ્તાવ મૂકવામાં આવ્યા. તેમણે બ્રહ્મપુત્ર અને ગંગાનું પાણી દક્ષિણ રાજ્યના સૂકા પ્રદેશોમાં લાવવાનું આયોજન આપ્યું હતું. જો કે તેના પર કોઈ ઝાઝી ચર્ચા ન થઈ. પછી પણ કેન્દ્રીય સ્તરે નદીઓને જોડવાને લઈને રિપોર્ટ બનતા રહ્યા. દેશની અલગ અલગ નદીઓને જોડવાની તેમાં ચર્ચા થતી રહી, પરંતુ તેમ છતાં પ્રોજેક્ટને અમલમાં મૂકી શકાય તેવા યોગ ન આવ્યા.

1999માં નેશનલ ડેમોક્રેટીક અલયાન્સની સરકાર બની અને વડા પ્રધાન તરીકે અટલ બિહારી વાજપેયી આવ્યા ત્યારે નદીઓને જોડવાની યોજનાને લઈને ફરી ચર્ચા શરૂ થઈ અને તે અંગે ખુદ વડા પ્રધાને પણ રસ લીધો. જો કે પર્યાવરણ અને અન્ય મુદ્દાના કારણે યોજના પડતી મૂકાઈ. યુ.પી.એ. સરકારના પ્રથમ ટર્મ દરમિયાન પણ આ પ્રોજેક્ટ પર કામ થવા માંડ્યું અને વડા પ્રધાન મનમોહનસિંઘની ઉપસ્થિતિમાં ઉત્તર પ્રદેશ અને મધ્ય પ્રદેશના તત્કાલિન મુખ્યમંત્રીઓએ કેન અને બેતવા નદી જોડાણને લઈને કરાર પર હસ્તાક્ષર કર્યા. આ પછી પણ યોજના સાકાર ન થઈ શકી. 2014માં નરેન્દ્ર મોદીની આગેવાનીમાં કેન્દ્રીય સરકાર બની, ત્યાર બાદ નદી જોડાણને લઈને કામ જોરો પર થયું. રિપોર્ટ બન્યા, વિશ્લેષણ થયું, ચર્ચા થઈ અને તે પછી તેનાં પર અંતિમ ડ્રાફ્ટ બન્યો. મતલબ કે હવે આ કાર્યને પ્રાથમિકતા આપીને આગળ ધપાવવાનું છે.

નદીઓ જોડાણના પ્રસ્તાવ મૂકવાનો અને રદ કરવાનો સિલસિલો આટલાં વર્ષો સુધી ચાલતો રહ્યો. હવે જ્યારે આ ઘટના આકાર પામવા જઈ રહી છે ત્યારે તેના પણ પર પ્રશ્નો ઊઠી રહ્યા છે. જેમ કે હાલની કેન-બેતવા નદીનાં જોડાણને લઈને વાઘોનું પન્ના અભયારણ્ય પર જોખમ ઊભું થયું છે. બીજું કે આ યોજના કાગળ પર જેટલી સુંદર બતાવી શકાય છે તેનું તેવું જમીની અમલીકરણ મુશ્કેલ છે તેવું નિષ્ણાતોનું માનવું છે. આ માટે કેટલાંક ઉદાહરણો પણ છે. ઉત્તર પ્રદેશમાં આવું એક ઉદાહરણ શારદા સહાયક નદીમાં જોવા મળે છે. 2000ના વર્ષમાં 260 કિલોમીટર લાંબી નહેર સાથે પૂર્ણ થયેલી આ યોજનાનું લક્ષ્ય 16.77 લાખ હેક્ટરને સિંચાઈ પૂરી પાડવાની હતી. પરંતુ તેમાં અડધા સુધી પણ ન પહોંચી શકાયું. આ ઉપરાંત, હજારો હેક્ટર જમીનમાં નદીનું પાણી જમા થતું રહે છે, જેનાથી અનેક પાક બરબાદ પણ થઈ રહ્યા છે. નદી જોડોમાં સરકાર જેટલું ગુલાબી ચિત્ર દાખવે છે તે વાસ્તવિકતા નથી, તેવું અનેક નિષ્ણાતો કહી રહ્યા છે.

પાણી મુદ્દે આજીવન કાર્ય કરનારાં તો આને જોખમી પ્રોજેક્ટ ગણાવે છે. નર્મદા બચાવ આંદોલનના મેઘા પાટકરનો પણ આ પરિયોજના અંગે જે મત છે તે જાણી લેવા જેવો છે. તેમનું કહેવું છે કે, આ પૂરી યોજના અવ્યવહારું છે. સામાજિક, આર્થિક અને પર્યાવરણની રીતે તેના પરિણામ ખૂબ ખરાબ આવી શકે છે. સરકાર એવું કહી રહી છે કે આ યોજનાથી પૂરની સમસ્યાથી બચી શકાશે. હવે જ્યારે ગંગાને માત્ર વીસ ટકા હિસ્સાને વળાંક આપવાની વાત છે ત્યારે તેનાથી પૂર કેવી રીતે રોકાઈ શકે? આ દાવાનો કોઈ વૈજ્ઞાનિક આધાર નથી. પાટકરનો એક અન્ય મુદ્દો આ યોજના હેઠળ ખર્ચનારાં નાણાં અંગેનો છે. દેશભરમાં નદીઓ જોડવાને લઈને કુલ સાડા પાંચ લાખ કરોડ રૂપિયા ખર્ચ થનારાં છે. આટલી રકમ સરકાર ખર્ચી ન શકે તેવું પાટકરનું માનવું છે અને તે કારણે આ યોજનામાં કોર્પોરેટ જગતની એન્ટ્રી થશે અને પછી તેઓ તેની કિંમત વસૂલશે. મતલબ કે નદીઓ લોકોના હાથમાંથી સરકીને કંપનીઓના હાથમાં જશે.

નદીઓ જોડાણને લઈને સાવધાની ન રાખવામાં આવે તો તેનાથી ખુંવારી થઈ શકે છે. આ ખુંવારી હિમાલયી નદીઓમાં આપણે દર વર્ષે સમયાંતરે જોઈએ છીએ. હિમાલયમાં નદીઓનું જોડાણ થયું નથી, પરંતુ જે રીતે કુદરત સાથે ત્યાં છેડછાડ થઈ છે તેથી તે નદીઓના પ્રકોપ જોવા મળે છે. અમેરિકામાં પણ આ પ્રકારના પ્રયોગ થઈ ચૂક્યા છે. કોલેરાડોથી લઈને મિસિસિપી નદીના ઘાટ સુધી મોટી સંખ્યામાં આવી પરિયોજના બની છે અને તે યોજનામાં કળણ ભરાઈ ગયા હોવાથી આસપાસના વિસ્તારમાં પૂરનો પ્રકોપ વધવા માંડ્યો છે. આખરે આ યોજના અંતર્ગત નિર્માણ કરવામાં આવેલાં બાંધોને તોડવા પડ્યા છે. તેના પર જે ખર્ચ થયો તે તો વેગળો. પાણીના જાણકારો કહે છે કે, ગંગા અને બ્રહ્મપુત્રમાં દર વર્ષે આવનારું કળણ મિસિસિપી નદીથી બમણું છે. સોવિયેત સંઘના યુગમાં સાઇબેરિયાની નદીઓને નેહરોની નેટવર્ક દ્વારા કઝાકિસ્તાન અને મધ્ય એશિયાના સૂકા પ્રદેશોની નદીઓ તરફ જોડવાનું કામ થયું હતું. યોજનાનો મુખ્ય ભાગ 2,200 કિલોમીટર લાંબી એક નહેર હતી. આ યોજનાથી અનેકગણું અનાજ પાકશે તેવા દાવા કરવામાં આવ્યા હતા. પરંતુ જ્યાં જ્યાં નહેર પહોંચી ત્યાં કળણવાળી જમીન અને ખારા પાણીથી ખેડૂતોની કમર તૂટી ગઈ. 80ના દાયકામાં આ સમગ્ર યોજનાને પડતી મૂકી દેવામાં આવી.

પાણીની વિકરાળ સમસ્યા સામે જ્યારે તેના ઉકેલ શોધાય છે અને તે તરફ આવાં પ્રશ્નો ઊઠે ત્યારે તેનો વાસ્તવિક ઉકેલ શો હોઈ શકે, તે પણ જાણવું જોઈએ. જાણકારોના મતે પીવાનાં પાણીનું આયોજન અલગ અલગ ક્ષેત્રોમાં વેગવેગળું હોય છે. આના બદલે એક જ આયોજન થોપવું યોગ્ય નથી. આપણાં જ દેશમાં નાના પ્રયાસો દ્વારા નદીઓને પુર્નજીવિત કરવાના કિસ્સા પણ મોજૂદ છે, ત્યારે નદીઓને જોડવાનો જોખમી માર્ગ શું કામ લેવો?

આ વિશે જાણીતા પર્યાવરણવિદ્ અનુપમ મિશ્રનું કહેવું હતું કે, નદીઓને જોડવાનું કાર્ય પ્રકૃતિનું છે. જ્યાં બે નદી જોડાય છે ત્યાં તે જગ્યા તીર્થસ્થળ બની જાય છે. હવે નદીઓને નહેરો દ્વારા જોડવાનો પ્રયાસ થાય છે. આનાથી ખેડૂતોને તો નહીં પણ નેતાઓ અને અધિકારીઓને જરૂર લાભ થશે. મિશ્રનું આ પાણીના આયોજન અંગેનું ગણિત ખૂબ કિફાયતી હતું અને તે વાતનું તેઓ મોડલ પણ જમીન પર લાવી શક્યા હતા. પણ હવે યોજનાઓમાં મસમોટી રકમ ખર્ચીને પ્રયોગો થઈ રહ્યા છે અને નક્કર આયોજનનો અભાવ છે.

e.mail : kirankapure@gmail.com

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