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‘ગ્રેટ સોલ્ટ લેક’ અને કચ્છના ‘સફેદ રણ’ વચ્ચે શું તફાવત છે?

રમેશ સવાણી|Diaspora - Features|25 July 2025

23 જુલાઈ 2025ના રોજ સવારે 7 વાગ્યે ઉટાહ રાજ્યના ‘ગ્રેટ સોલ્ટ લેક’ તરફ પ્રયાણ કર્યું. 

Great Salt Lake – ગ્રેટ સોલ્ટ લેક પશ્ચિમી ગોળાર્ધમાં સૌથી મોટું ખારા પાણીનું તળાવ છે. અને વિશ્વનું આઠમું સૌથી મોટું ટર્મિનલ તળાવ છે. તે ઉટાહ રાજ્યના ઉત્તરીય ભાગમાં આવેલું છે અને તળાવ-પ્રભાવિત બરફના કારણે સ્થાનિક આબોહવા પર નોંધપાત્ર અસર કરે છે. તે 1,700 ચોરસ માઈલમાં પથરાયેલું છે. વધુમાં વધુ 75 માઈલ લાંબું અને 28 માઈલ પહોળું છે. તેની સરેરાશ ઊંડાઈ 16 ફૂટ છે. વધુમાં વધુ ઊંડાઈ 33 ફૂટ છે. 

સરોવરની ત્રણ મુખ્ય ઉપનદીઓ, Jordan – જોર્ડન, Weber – વેબર અને Bear મળીને દર વર્ષે તળાવમાં લગભગ 1.1 મિલિયન ટન ખનિજો જમા કરે છે. તળાવમાં બાષ્પીભવન સિવાય કોઈ આઉટલેટ ન હોવાથી, આ ખનિજો એકઠાં થાય છે અને તળાવને ઉચ્ચ Salinity – ખારાશ (દરિયાઈ પાણી કરતાં ઘણી ખારી) અને ઘનતા આપે છે. આ ઘનતાને કારણે લોકો ખૂબ જ ઓછા કે કોઈ પણ પ્રયાસ વિના ‘કોર્કની જેમ તરતા’ રહે છે. આ તળાવને ‘અમેરિકાના મૃત સમુદ્ર’ તરીકે ઓળખવામાં આવે છે અને તે લાખો સ્થાનિક પક્ષીઓ, Brine shrimp – ખારા ઝીંગા, કિનારાનાં પક્ષીઓ અને જળચર પક્ષીઓ માટે રહેઠાણ પૂરું પાડે છે, જેમાં Wilson’s phalarope – વિલ્સનના ફાલેરોપ પક્ષીની સૌથી મોટી વસ્તીનો સમાવેશ થાય છે.

Bonneville Salt Flats – બોનેવિલે સોલ્ટ ફ્લેટમાં, સૂકાયેલા મીઠાની વિશાળ જાજમ પર ચાલવાનો રોમાંચ અલગ હોય છે. આવો રોમાંચ કચ્છના સફેદ રણમાં પણ થાય છે. જો કે ઉટાહનું ‘ગ્રેટ સોલ્ટ લેક’ અને કચ્છના સફેદ રણ વચ્ચે તફાવત છે. બંને અનોખા છે. ગ્રેટ સોલ્ટ લેક એક ટર્મિનલ તળાવ છે, જેનો અર્થ છે કે તેમાં કોઈ આઉટલેટ નથી અને તે મુખ્યત્વે બાષ્પીભવન દ્વારા પાણી ગુમાવે છે. પાણીની ખારાશનું સ્તર 5% અને 27%ની વચ્ચે વધઘટ થાય છે, જે સમુદ્ર કરતા 2 થી 9 ગણી ખારાશ છે. જ્યારે કચ્છનું સફેદ રણ ચોમાસામાં ભીનું અને શિયાળા-ઉનાળામાં સૂકું હોય છે. જે 26,000 ચોરસ કિલોમીટરનો વિસ્તાર આવરી લે છે, જે ગ્રેટ સોલ્ટ લેક કરતાં મોટો વિસ્તાર છે. કચ્છનું સફેદ રણ દરિયાઈ પાણીનો પ્રવાહ મેળવે છે. કચ્છના સફેદ રણની ખારાશ કરતાં ગ્રેટ સોલ્ટ લેકની ખારાશ વધુ છે. કચ્છનું રણ seasonal – મોસમી છે, તેમાં નાહી શકાતું નથી. ગ્રેટ સોલ્ટ લેક seasonal નથી, કાયમી છે અને તેમાં નાહી શકાય છે અને બોટિંગ થઈ શકે છે. કુદરતી સૌંદર્યની દૃષ્ટિએ ગ્રેટ સોલ્ટ લેક વધુ આકર્ષક છે કેમ કે તે પર્વતોથી ઘેરાયેલ છે.

ગ્રેટ સોલ્ટ લેક અનેક ઉદ્યોગોને ટેકો આપે છે. Morton Salt અને Compass Minerals જેવી કંપનીઓ તળાવમાંથી મીઠું કાઢે છે. આ મીઠાનો ઉપયોગ વિવિધ હેતુઓ માટે થાય છે, જેમાં રસ્તાઓમાંથી બરફ દૂર કરવા, પાણીને નરમ કરવા અને રાસાયણિક ફીડસ્ટોક તરીકે સમાવેશ થાય છે. તળાવમાંથી મેગ્નેશિયમ ધાતુ કાઢે છે, જેનો ઉપયોગ એલોય અને અન્ય ઔદ્યોગિક એપ્લિકેશનોમાં થાય છે. લિથિયમ મળે છે જે બેટરી ઉત્પાદનમાં વપરાય  છે. Sulfate – potash કાઢે છે, જે એક મૂલ્યવાન ખાતર છે.

કચ્છના મીઠાના રણ પર આધારિત ઉદ્યોગ મુખ્યત્વે મીઠાનું ઉત્પાદન કરે છે. ચોમાસા દરમિયાન, કચ્છનું નાનું રણ ખારાં પાણીથી ભરાઈ જાય છે, જે પછી ઓક્ટોબરની આસપાસ ઓસરી જાય છે. અગરિયા તરીકે ઓળખાતા મીઠાના ખેડૂતો કૂવા ખોદે છે અને ખારાં ભૂગર્ભજળને છીછરા ચોરસ ખેતરોમાં પમ્પ કરે છે જ્યાં પાણી કુદરતી રીતે બાષ્પીભવન થાય છે, અને મીઠું મળે છે. દેશના કુલ મીઠાના લગભગ 74% ઉત્પાદન કચ્છમાં થાય છે. કચ્છ રણમાં સલ્ફેટ ઓફ પોટાશ(SOP)નું ઉત્પાદન થાય છે.

ટૂંકમાં, કુદરત પાસેથી માનવી ઘણું ઘણું મેળવે છે. કુદરતનો ઉપયોગ માત્ર માનવીએ કરવાનો નથી, કુદરત સમગ્ર જીવસૃષ્ટિ માટે છે, એટલી સમજ આપણે કેળવવી પડે !

24 જુલાઈ 2015 
સૌજન્ય : રમેશભાઈ સવાણીની ફેઇસબૂક દીવાલેથી સાદર

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दो धमाके ! 

कुमार प्रशांत|Opinion - Opinion|25 July 2025

कुमार प्रशांत

दो धमाके करीब-करीब साथ ही हुए ! एक धमाके से महाराष्ट्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार के परखच्चे उड़ गए, दूसरे धमाके से उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने नरेंद्र मोदी सरकार में पलीता-सा लगा दिया. पहला धमाका मुंबई हाइकोर्ट ने किया जिसने 7 नवंबर 2006 को, मुंबई की लोकल ट्रेनों में एक लगातार हुए 7 बम विस्फोटों  के सारे अपराधियों को निर्दोष करार कर रिहा कर दिया. जिंदगी के अनमोल 18 लंबे वर्ष सरकार की जेल में निरपराध बंद रह रहे ये सभी लोग मुसलमान हैं और उन्हें इसकी ही सजा मिली थी.

मुंबई शहर में व लोकल गाड़ियों में हुआ बम विस्फोट कांड हाल के वर्षों की सबसे घिनौनी, क्रूर और सांप्रदायिकता से भरी आतंकी कार्रवाई थी. लोकल ट्रेनों में शाम 6.30 बजे एक-के-बाद एक 7 गाड़ियों में हुए इन विस्फोटों में 189 लोग मारे गए तथा 824 लोग बुरी तरह जख्मी हुए. मुंबई में शाम का यह वक्त होता है जब ट्रेनें आदमियों को ढो रही हैं कि आदमी ट्रेन को, बताना मुश्किल होता है. ऐसी भीड़ के वक्त इस तरह का हमला कोई दुश्मन कर सकता है या फिर कोई हैवान ! इसलिए यह बहुत जरूरी था, और है कि इस अमानवीय कांड के पीछे के षड्यंत्रकारियों को खोजा जाए, पकड़ा जाए और कानून के हवाले किया जाए. यह किसी भी सरकार व प्रशासन की योग्यता व सार्थकता की कसौटी है.

महाराष्ट्र सरकार की आतंकरोधी टुकड़ी (एटीएस) ने यह मामला संभाला और हर तरफ़ धर-पकड़ शुरू हुई. एटीएस ने 17 लोगों को आरोपी बनाया जिनमें से 15 की वह गिरफ्तारी कर सकी. लंबी पुलिसिया कार्रवाई के बाद, महाराष्ट्र सरकार के मोकोका एक्ट के तहत विशेष अदालत में इन पर मुकदमा चला. अदालत ने 2015 में सुनवाई पूरी की और सजा सुनाई – एक आरोपी की रिहाई, 5 को फांसी तथा 7 को आजीवन कैद ! तब से जेल ही इन 15 लोगों का घर बना हुआ था. कोविड-19 में फांसी की सजा पाए एक अपराधी की मृत्यु भी हो गई.

मामला हाईकोर्ट पहुंचा. अब उसका फैसला एक धमाके की तरह आया है जिसकी चर्चा से मैंने यह लेख शुरू किया है. हम भी पूछते हैं और हाइकोर्ट ने भी पूछा है कि अपराधी की खोज का मतलब यह नहीं है कि आप सड़क से किसी को भी पकड़ कर, अपराधी घोषित कर दें और जेल में डाल दें. वे सालों जेलों में सड़ें और आप अपनी कुर्सी पर बैठ चैन की बांसुरी बजाएं. क्या जो सरकार और प्रशासन ऐसा करे, उसे सरकार या प्रशासन माना भी जा सकता है ? और यह भी देखिए कि आपकी शंका के दायरे में आए भी तो सिर्फ मुसलमान ! क्यों ? सिर्फ इसलिए कि आपके कुकर्मों से मुंबई में तब सांप्रदायिक दंगा फूटा था जिसके पर्दे में मुसलमानों को निशाने पर लेना आसान हो गया था ?

सामान्य समझ यह कहती है कि एक ऐसा वृहद योजनाबद्ध अपराध  ‘सफल’ होने से पहले कितने ही अपराधी गिरोहों के हाथों से गुजरता है जिनका धर्म के आधार पर विभाजन करना एक सांप्रदायिक अपराध है. पैसों की हेराफेरी हुई होगी, हवाला हुआ होगा, कितने हाथों व रास्तों से छुपता-छुपाता बारूद पहुंचा होगा ! और भी न जाने क्या-क्या हुआ होगा ! कौन कह सकता है कि यह सारा मुसलमानों के जरिये ही हुआ होगा ?

अपराधियों, तस्करों, गैंगेस्टरों का एक ही धर्म होता है – पैसा बनाना; फिर एटीएस ने केवल मुसलमानों क्यों दबोचा ? क्योंकि उसे पता था कि उस वक्त की सरकार की राजनीति को यह सबसे अधिक सुहाएगा. “ किसी अपराध के मुख्य व्यक्ति को सजा दिलवाना आपराधिक गतिविधियों को दबाने, कानून व्यवस्था को बनाए रखने तथा नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी करने की दिशा में निहायत जरूरी काम है. लेकिन ऐसा झूठा आभास पैदा करना कि हमने मामला हल कर लिया है तथा अपराधी अदालत में पहुंचा दिए गए हैं, एक खतरनाक दावेदारी है. ऐसे क्षद्मपूर्ण ढंग से मामले को निबटाने से लोगों का व्यवस्था पर से विश्वास टूटता है और समाज को झूठा आश्वासन मिलता है जबकि असली अपराधी कहीं छुट्टे घूमते रहते हैं. हमारे सामने जो मामला आया है, वह ऐसा ही है.” जस्टिस अनिल किलोर तथा श्याम चांडक ने 671 पन्नों का फैसला इस तरह लिख कर सारे मुसलमान आरोपियों को रिहा कर दिया.

अब कठघरे में कौन है ? महाराष्ट्र की सरकार और महाराष्ट्र का एटीएस. महाराष्ट्र सरकार तुरंत सुप्रीम कोर्ट गई. वहां रोना यह रोया गया कि हम रिहा लोगों को फिर से जेल में डालने की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि यह निवेदन कर रहे हैं कि ऐसे फैसले का असर मकोका के दूसरे मामलों पर भी पड़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट इसकी सफाई में आदेश जारी करे. सुप्रीम कोर्ट ने कुल जमा यह निर्देश दिया कि मुंबई हाइकोर्ट के इस फैसले को मकोका के दूसरे मामलों में आधार नहीं बनाया जाए- “ बस, इससे अधिक कोई राहत हम आपको नहीं दे सकते.” मतलब मुंबई हाइकोर्ट का फैसला ज्यों-का-त्यों लागू है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ दिया कि इस मामले में जो लोग रिहा हो चुके हैं, अब उन्हें आप वापस जेल में भी नहीं डाल सकते.

सरकारों के पास शर्म भले न हो, जनता का अफरात पैसा तो है ही. वह वकीलों-अदालतों पर कुछ भी लुटा सकती है. लेकिन इस अनमोल सवाल का जवाब न महाराष्ट्र सरकार दे सकती है, न सुप्रीम कोर्ट कि वह कौन-सी अदालत होगी जहां ऐसी सरकार को व ऐसे प्रशासन को सजा मिलेगी जो बेकसूरों की जिंदगी से ऐसी बेरहमी से खेलती है ? हमारे संविधान में बहुत सारे संशोधन हुए, ऐसा एक जरूरी संशोधन कौन-सी सरकार ला सकती है और कौन-सी अदालत ऐसा करने का निर्देश सरकार को दे सकती है कि अपराध को रोकने के नाम पर आप अपराध नहीं कर सकते ? ऐसा प्रमाणित होने पर सरकार व प्रशासन को भी सज़ा मिलेगी! यह संसदीय लोकतंत्र को उन्नत करने वाला कदम होगा.

महाराष्ट्र हाइकोर्ट के धमाके की गूंज अभी ठीक से गूंजी भी नहीं थी कि दूसरा धमाका दिल्ली से हुआ. इसमें सनसनी ज्यादा थी, सो मुद्दों को किनारे करने वाली, सनसनी का भूखा मीडिया इसके पीछे भागा. एक सत्वहीन उप-राष्ट्रपति ने जितना संभव था, उतने नाटकीय ढंग से इस्तीफा दे दिया. देश के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी उप-राष्ट्रपति ने कार्यकाल समाप्ति से पहले त्यागपत्र दिया हो. लेकिन क्या जगदीप धनखड़ कभी किसी गंभीर राजनीतिक विमर्श के पात्र रहे हैं ? वे खुद ही खुद को गंभीरता से लेते हों तो हों, बाकी उनका सारा राजनीतिक जीवन दूसरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने की दरिद्र कहानी भर है. दल बदलते हुए वे भारतीय जनता पार्टी तक पहुंचे और प्रधानमंत्री को लगा कि यह आदमी मेरी मजबूत कठपुतली बन सकता है, सो उन्होंने अपने दरबार में उन्हें शामिल कर लिया. वे ममता बनर्जी को नाथने के लिए राज्यपाल बनाकर बंगाल भेजे गए. राज्यपालों को सर्कस का बंदर बनाने की कहानी यहीं से शुरू होती है. अब तो बंदरों की थोक आमद हो रही है. ऐसे सारे सुपात्रों से प्रधानमंत्री की अपेक्षा यही रहती है कि वे दिखाएं कि वे कितने स्तरों पर, कितनी तरह से अपनी ‘कुपात्रता’ साबित कर सकते हैं.

धनखड़ इनमें सबसे अव्वल रहे, इसलिए वे दिल्ली लाए गए. राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं था, सो सरकार को ऐसे लठैत की जरूरत थी. वे राज्यपाल के रूप में जितना गिरे, उप-राष्ट्रपति व राज्य सभा के अध्यक्ष के रूप में उससे भी आगे गए. उन्होंने किसी भी मर्यादा का पालन नहीं किया : न संवैधानिक मर्यादा का, न राजनीतिक मर्यादा का, न दो राज्य प्रमुखों के व्यवहार की मर्यादा का, न मानवीय रिश्तों की मर्यादा का. प्रधानमंत्री की नजर में चढ़े-बने रहने की कवायद सभी राज्यपाल करते हैं- आरिफ़ मुहम्मद खान भी,  आर.एन.रवि भी, आचार्य देवव्रत भी, आनंद बोस आदि भी. न करें तो वहां टिकें कैसे ? हम यह भी देखते हैं कि राज्यपालों से मुख्यमंत्री की टकराहट तभी तक रहती है जब तक उस राज्य में गैर-भाजपा सरकार होती है. भाजपा की सरकार आई और सारी तकरार कपूर की तरह उड़ जाती है. दिल्ली इसका नायाब नमूना है. अब दिल्ली का उप-राज्यपाल कौन है, लोगों को पता भी नहीं चलता है. आम आदमी पार्टी के दौर में सिद्धांत ही बना था कि असली सत्ता उप-राज्यपाल के पास है जिसे खेलने के लिए एक सरकार दे दी गई है.

धनखड़ साहब ने राज्यसभा को प्राइमरी स्कूल की कक्षा में बदल कर ख़ुद को हेडमास्टर नियुक्त कर लिया. विपक्ष का कोई ही वरिष्ठ सदस्य ऐसा नहीं होगा जिसे उन्होंने अपमानित न किया हो. उनके हाव-भाव से-बॉडी लाइंग्वेज-से उन सबके लिए गहरी हिकारत झलकती थी जो सत्तापक्ष के नहीं थे. वे अपना अज्ञान व कुसंस्कार छिपाने के लिए भारतीय परंपरा, वैदिक शील, संवैधानिक गरिमा जैसे बड़े-बड़े शब्दों का इस्तेमाल करते तो थे लेकिन दिन-ब-दिन उनका खोखलापन जाहिर होता जाता था. हाल-फिलहाल में राज्यसभा के अध्यक्ष हामिद अंसारी थे जिनके दौर में राज्यसभा की शालीनता व विमर्श की हम आज भी याद करते हैं.

धनखड़ साहब कभी वकील भी रहे थे. उन्हें यह मुगालता हो गया कि इस नाते वे संविधान विशेषज्ञ भी हैं. यह कुछ ऐसा ही था कि वार्डब्याय समझने लगे कि वह डॉक्टर है. वे संविधान की मनमानी व्याख्या करने लगे, सुप्रीम कोर्ट को उसकी औकात बताने लगे. मोदी-राज में यह सबसे खतरनाक है. कठपुतलियां ही कठपुतली नचाने की कोशिश करने लगें, तो भला कोई कैसे सहे ! उन्हें लगता रहा कि इस तरह प्रधानमंत्री की नजर में बने रहने से अगली सीढ़ी चढ़ने को मिलेगी. बस, यहीं आ कर वे गच्चा खा गए.

प्रधानमंत्री को दूसरी सारी बकवासों से खास मतलब नहीं होता है. वे खुद ही इसमें निष्णात हैं. उन्हें हर वह आदमी नागवार गुजरता है जो अपनी हैसियत बनाने लगता है. पार्टी में सबकी हैसियत खत्म कर तो प्रधानमंत्री ने अपनी हैसियत बनाईं है. अब आप उसे ही चुनौती देने लगें, तो कैसे चले. सो धनखड़ साहब नप गए. वे इतनी हैसियत नहीं रखते हैं कि उनके जाने से कोई मक्खी भी भिनभिनाए. इसलिए सत्तापक्ष से कोई आवाज नहीं उठी. प्रधानमंत्री के ट्विट ने विदाई लेते धनखड़ साहब को न सिर्फ अपमानित किया बल्कि अपनी पार्टी को सावधान भी कर दिया कि कोई बात न करे . तब अपना तीर-कमान ले कर सामने आई कांग्रेस. उसने धनखड़ साहब के पक्ष में अबतक सबसे ज्यादा आवाज उठाई है. इन दिनों कांग्रेस की यही चारित्रिक विशेषता बन गई है कि वह बेनिशाने तीर चलाती है. वह धनखड़ साहब के लिए जो कह व कर रही है, वह सतही अवसरवादिता व अपरिपक्व राजनीतिक चालबाजी भर है. एक कमजोर, दिशाहीन राजनीतिक दल ही इस तरह अपना सिक्का जमाने की कोशिश करता है.

इस सरकार ने भारतीय लोकतंत्र को एक ऐसी खोखली व्यवस्था में बदल दिया है जिसमें व्यक्तित्वहीन कठपुतलियों का मेला लगा है. एक नहीं, कई धनखड़ हैं. एकाधिकारशाही के लिए ऐसा करना जरूरी होता है. एकाधिकारशाही में संविधान ऐसा मृत दस्तावेज होता है जिसे बाजवक्त प्रणाम किया जाता है और सारी संवैधानिक व्यवस्थाओं को प्राणहीन जी-हुजूरों का अस्तबल बना दिया जाता है. हम आज उसी के रू-ब-रू हैं.

(25.07.2025)
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આત્મજા

નરેન્દ્ર ત્રિવેદી|Opinion - Short Stories|25 July 2025

અરુણાબહેન આજે ખૂબ ચિંતામાં હતાં. પ્રેગ્નન્સીનો ડ્યું ટાઇમ થઈ ગયો હતો. ગમે ત્યારે હોસ્પિટલમાં દાખલ જવું પડે તેમ હતું. અરુણાબહેનની તબિયત ધાર્યા કરતાં સારી હતી, પણ ચિંતા બીજી વાતની હતી, કે શું થશે? બાળક, દીકરો હશે કે દીકરી. ઘરમાં બધાં દીકરા માટે ઉત્સાહિત હતાં. પરેશ પણ કાંઈ કહેતો નથી, પણ ઊંડે ઊંડે તેની ઈચ્છા પણ દીકરા માટેની હશે, તેમ તેના મોઢા પરથી લાગે છે. મમ્મીને કહેરાવ્યું છે. દૂરથી આવતાં વાર તો લાગે જ ને. અરુણાબહેન આમથી તેમ ઘરમાં ધીમાં પગલે આંટા મારતાં હતાં. આ પ્રથમ પ્રેગ્નન્સી હતી, એટલે શું થશે? અને કેમ થશે? એ જ દ્વિધામાં પડી ગયાં હતાં. અરુણાબહેનની ચિંતાનું બીજું પણ કારણ હતું. બીજાને ત્યાં દીકરીનો જન્મ થાય તો ઘરમાં બધા અણગમો પ્રદર્શિત કરતાં હતાં, જ્યારે આજે તો પોતાના માટેની જ વાત અને રાહ હતી.

અરુણાબહેનની ચિંતા સાચી પડી. ડ્યું ટાઇમનો દુઃખાવો શરૂ થઈ ગયો હતો. સરકારી હોસ્પિટલમાં દાખલ થવું પડશે. પ્રાઇવેટ હોસ્પિટલનો તો ખર્ચ પોસાય એમ નહોતો. વળી, પ્રાઇવેટ હોસ્પિટલમાં તો મોટા ભાગે સિઝેરિયન કરી નાખે છે, એવી ધારણા પણ મનમાં હતી. એટલે એ ડર પણ મનમાં હતો. અંતે સરકારી હોસ્પિટલમાં અરુણાબહેનને દાખલ થવું પડ્યું. જનરલ રૂમ હતો અને રૂમમાં આઠ જેટલા બેડ હતા. મોટા ભાગની પ્રથમ પ્રેગ્નન્સીવાળી બહેનો હતી. પણ જેમને બીજો કે ત્રીજો અનુભવ હતો તે લોકો થોડા સ્વસ્થ હતાં. હા, જેને અત્યાર સુધી દીકરીઓ જ અવતરી હતી એ બહેનો ચિંતામાં હતી.

આઠ બેડ હતા એટલે સગાં, સંબંધીઓ, સાસુ અને દીકરીઓની માતાથી રૂમ ભરચક થઈ ગયો હતો. બધાં પોતાના અનુભવો અને પડેલી તકલીફોની વાત કરતાં હતાં. કોઈએ કહ્યું, મને તો પહેલે ખોળે દીકરો આવે એ જ ગમે. જો જો ને મારી વહુ દીકરાને જ જન્મ આપશે. અરુણાબહેને જોયું તો તેનાં સાસુ પણ ચર્ચામાં સામેલ હતાં અને કહેતાં હતાં કે પહેલે ખોળે દીકરો આવે એ તો સહુને ગમે. મેં અરુણાને ડોક્ટરને બતાવી સોનોગ્રાફી પણ કરાવી. ડૉક્ટરને પૂછ્યું તો જવાબ ન આપ્યો, એટલું જ કહ્યું તબિયત સારી છે. ચિંતાનું કોઈ કારણ નથી. કોઈકે કહ્યું ડોક્ટરને ખબર પડી ગઈ હોય, તો પણ કહે નહીં. સરકારનો આદેશ છે એટલે ડોક્ટર પણ શું કરે. અને અત્યારનો માહોલ પણ આવો છે કે બધાંને દીકરા જ જોઈએ છે. કોઈ એ નથી સમજતું કે દીકરી વગર કોઈનો પણ વંશ વેલો કઈ રીતે આગળ વધશે. આવી બધી ચર્ચાઓ રૂમમાં થતી હતી જે ચિંતા સાથે અરુણાબહેન સાંભળી રહ્યાં હતાં.

સમય પસાર થતો હતો. અરુણાબહેનને તો પોતાના માટે સમય સ્થંભી ગયો હોય એમ લાગતું. દાખલ થયેલ દર્દીઓમાંથી ત્રણ બહેનો છૂટી થઈ ગઈ. વાતાવરણ ખુશી અને ના ખુશીથી ભરેલું હતું. દીકરાવાળા ખુશિયા મનાવી રહ્યાં હતાં ને દીકરીવાળા તમાચો મારીને ગાલ રાતો રાખી રહ્યાં હતાં. રૂમનું વાતાવરણ ખુશીવાળું હતું કે ગંભીર હતું એ અરુણાબહેનને સમજાયું નહીં.

અરુણાબહેને જોયું તો તેનાં સાસુ જ્યાં દીકરાનો જન્મ થયો હતો ત્યાં ખુશ મિજાજથી વાતો કરી રહ્યાં હતાં. આ દૃશ્ય જોઈને અરુણાબહેનની દિલની ધડકણ વધી ગઈ હતી. નર્સે આવીને અરુણાબહેનનું બી.પી. માપ્યું તો વધારે આવ્યું. તેણે કહ્યું, અરુણાબહેન, તમે જરા પણ ચિંતા ન કરતાં. ભલે લોકો આ હોસ્પિટલને સરકારી દવાખાનું કહે છે પણ અહીંયા પ્રાઇવેટ હોસ્પિટલથી પણ સારી ટ્રીટમેન્ટ આપવામાં આવે છે.

અરુણાબહેને મનમાં કહ્યું મને હોસ્પિટલની નહીં, પણ આવનાર બાળક વિશે ચિંતા છે. નર્સ તો દવા આપીને ચાલી ગઈ.

રૂમમાં ખુશી, નાખુશી અને ગંભીર વાતાવરણનો માહોલ બનતો રહ્યો. આખો દિવસ આમ જ પસાર થયો. અરુણાબહેનને થયું હું દુઃખાવાની ખોટી ભ્રમણાથી તો દાખલ નથી થઈ ગઈને? અહીંયા સમય પસાર કરવો અઘરો પડે એમ છે. ઘરની વાત જુદી હતી. ત્યાં તો જે હોય એ બધાં ઘરના જ હોવાનાં.

અરુણાબહેને પોતાના મમ્મીને આવતાં જોયાં. મનમાં થોડી ટાઢક થઈ કે મમ્મી આવી ગઈ છે એ બધું સંભાળી લેશે. અરુણાબહેનના બંને ભાઈને ત્યાં એક એક દીકરી જ છે. મમ્મીએ બધું સંભાળી લીધું હતું એમ કહીને કે બધાંયને દીકરાની આશા હોય પણ મારે તો લક્ષ્મીનો અવતાર એવી દીકરી જ જોઈતી હતી. દીકરીઓ તો તુલસીનો ક્યારો છે. દીકરીઓ પણ તેનું નસીબ લઈને જ આવતી હોય છે.

અરુણા, બેટા, કેમ છે?

અરુણાબહેને કહ્યું, “સારું છે મમ્મી. મને ચિંતા બહુ થાય છે.”

“તું ચિંતા કરમાં, બધાં જ સારા વાના થશે.”

“ચાલો વૅવાણ, જરા આપણે બહાર આંટો મારી આવીએ.”

અરુણાબહેનને મનમાં જે ભીતિ હતી એ જ થયું. દીકરીનો જન્મ થયો. અરુણાબહેને બધાં ય સામે જોયું પણ કોઈએ કોઈ પ્રતિભાવ ન આપ્યો. અરે! મમ્મીએ પણ બે શબ્દો આશ્વાસનના ન કહ્યાં. બધાં જ વાતો કરે, પણ મનમાં ઈચ્છા તો દીકરાની જ રાખે. હોસ્પિટલમાંથી ડિસ્ચાર્જ થઈ અરુણાબહેન રિક્ષામાં બેઠાં. મનની ધડકણ તો વધેલી જ હતી કે અત્યારે ભલે કોઈ કંઈ નથી કહેતું પણ ઘરે તો દીકરી આવી છે એ નારાજગી અવશ્ય પ્રગટ કરશે. હશે! જેવી ભગવાનની ઈચ્છા.

અરુણાબહેન ઘરમાં દાખલ થયાને …. ઘરમાં ચારેકોરથી અવાજ ગુંજી ઊઠ્યો ….

“વેલ કમ આત્મજા”……” વેલ કમ આત્મજા……”

અવાજ સાંભળી અરુણાબહેન ભાવવિભોર થઈ ગયાં. તેણે સાસુ અને મમ્મી સામે જોયું.

સાસુએ કહ્યું, “હા, બેટા, અમારા માટે તો દીકરો હોય કે દીકરી બંનેનું સરખું જ મહત્ત્વ છે. અમને તારી ચિંતા હતી. તું સ્વસ્થ ઘરે આવી ગઈ અને તે પણ લક્ષ્મી રૂપ આત્મજાને લઈને. બેટા, હું ને તારી મમ્મી દૂરથી તારું ધ્યાન રાખતાં હતાં. પાસે રહીને તને ઢીલી પાડવા નહોતાં માંગતાં.”

અરુણાબહેને આત્મજાને જોઈને કહ્યું ….. તે આવીને અમારા ઘરને ખુશીઓમાં તરબોળ કરી દીધું. મારુ માન વધારી દીધું. અરુણાબહેનની આંખમાં હર્ષનાં આંસુ હતાં.

ભાવનગર
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