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मिस मेयो : मिस्टर मेयो

कुमार प्रशांत|Opinion - Opinion|4 May 2024

कुमार प्रशांत

इतिहास भी कमाल के गोते लगाता है ! भला सोचिए, 2024 में वह 1927 की कहानी दोहरा रहा है. तब यानी 1927 में एक थीं कैथरीन मेयो और एक थे महात्मा गांधी. महात्मा गांधी कौन थे यह तो अधिकांशत: हम सब जानते ही हैं (मैं व्हाट्एप यूनिवर्सिटी के महान इतिहासकारों को भी इसमें शामिल कर रहा हूं !), लेकिन कैथरीन मेयो कौन थीं यह जानने की जरूरत अधिकांश पाठकों को पड़ेगी. तो बताता हूं कि वे एक अमरीकी, श्वेत चमड़ी की श्रेष्ठता के भाव से भरी, नकचढ़ी पत्रकारसरीखी कुछ थीं जिन्हें कुछ लोग तब उसी तरह इतिहासकार भी कहते थे जिस तरह अब कुछ लोग गृहमंत्री अमित शाह को दार्शनिक कहते हैं. 20 के दशक में मिस मायो भारत आई थीं. गांधीजी से भी मिली थीं, दूसरी हस्तियों से भी मिली थीं, रवींद्रनाथ ठाकुर से भी मिली थीं. गांधीजी के निर्देश में चल रहे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से असहमत, असंतुष्ट, नाराज मेयो मैडम ने एक किताब लिखी : ‘ मदर इंडिया !’ ना, ना, आप ऐसा मत मान बैठिएगा कि महबूब खान की प्रसिद्ध फिल्म ‘मदर इंडिया’ मेयो मैम की इस किताब से प्रेरित थी. मेयो मैम ‘मदर इंडिया’ में अपना अलग ही राग गाती हैं.

यह किताब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों, उसकी दिशा, उसकी उपलब्धियों आदि की धज्जियां उड़ाती हुई यह साबित करती है कि यह भारतीय समाज कुरीतियों-अन्याय-अत्याचार तथा शोषण की गंदी व्यवस्था पर टिका एक ऐसा गर्हित समाज है जिसे गुलाम बना कर अंग्रेजों ने ( कहें : श्वेत चमड़ी वालों ने ! ) कुछ सभ्य, कुछ मानवीय बनाया है. मेयो मैम की किताब तब कई लोगों को नागवार गुजरी थी लेकिन वह किताब जल्दी ही ‘गुजर भी जाती’ यदि गांधीजी ने उसे पढ़ा न होता. बहुत कहने पर गांधीजी ने न केवल ‘मदर इंडिया’ पढ़ी बल्कि चौतरफा आग्रह के कारण, ‘ बहुत व्यस्तता’ में से समय निकाल कर उस पर एक टिप्पणी भी लिखी जो 15 सितंबर 1927 को ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित हुई.  महात्मा गांधी ने अपनी टिप्पणी का शीर्षक दिया : ‘ ड्रेन इंस्पेक्टर रिपोर्ट’ : नाली सफाई के जमादार की रिपोर्ट ! गरज यह कि जिसका धंधा ही गंदगी को उकेर-उकेर कर देखना है, वह गंदगी के अलावा देखेगा भी तो क्या और वर्णन भी करेगा तो गंदगी की ही करेगा. महात्मा गांधी की अपनी शैली में यह खासी कड़ी टिप्पणी थी. गांधीजी ने लिखा कि यह “ बड़ी चालाकी से लिखी सशक्त किताब है… जो किसी हद तक सत्य का बखान, असत्य के प्रचार के लिए करती है.”

अब न कैथरीन मेयो हैं, न गांधीजी हैं लेकिन गंदगी फैलाने का धंधा जोरों पर है. गंदगी को सहेजने तथा ‘ बड़ी चालाकी से सत्य का बखान इस तरह करना कि असत्य का प्रचार हो’ वाली संस्कृति जीवित भी है, जारी भी है. सो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कला में महारत हासिल कर ली है. वे अब इस कला के ‘उस्ताद जमादार’ बन गए हैं. हम देखें तो प्रधानमंत्री मोदी का कुल इतिहास 2014 से शुरू होता है और कुर्सी तक पहुंच कर चुक जाता है. वे सत्ता की जिन दो कुर्सियों पर बैठे हैं – मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री – यदि वे कुर्सियां हटा दी जाएं तो उनके पास कुछ भी बचता नहीं है. कुर्सी के बिना वे उसी तरह अर्थहीन हो जाते हैं जैसे नालियों के बिना सफाई जमादार!

मोदी चुनाव के सन्निपात में इधर जब-जब मुंह खोल रहे हैं, इतिहास का मुंह खुला रह जाता है. वैसे भी प्रधानमंत्री झूठ व सच में फर्क करने जैसी नैतिकता में कभी पड़ते नहीं हैं. सत्ता की कुर्सी पर बैठ कर किसी झूठ को जोर-जोर से सौ बार बोलो तो वह लोगों के बीच किसी हद तक सच की तरह स्थापित हो जाता है, इसे मान कर अहर्निश कार्यरत रहते हैं प्रधानमंत्री. उन्होंने कहा कि कांग्रेस का चुनाव घोषणापत्र उन्हें मुस्लिम लीग के घोषणापत्र जैसा लगता है. कोई प्रमाण ? कोई साम्यता ? नहीं, यह सब बताना प्रधानमंत्री का काम थोड़े ही है ! उन्हें पता है कि उनकी बात को ‘गोदी मीडिया’ देश भर में पहुंचा देगा और जहां-जहां उनका कहा ‘मुस्लिम’ शब्द पहुंचेगा, सांप्रदायिकता के अनुकूल वातावरण बन ही जाएगा. उन्हें इस वातावरण से मतलब है क्योंकि इससे वोट की फसल अच्छी बनती व कटती है.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस लोगों से घर छीन लेगी, भैंस छीन लेगी, धन छीन लेगी, मंगलसूत्र छीन लेगी और यह सारा मुसलमानों को दे देगी. कोई प्रमाण ? कोई संदर्भ ? नहीं, यह सब बताना प्रधानमंत्री का काम थोड़े ही है ! उन्होंने बस कह दिया, अब ‘ गोदी मीडिया’ अपना काम करेगा और वातावरण जहरीला बनता जाएगा. समाज जितना जहरीला बनता जाएगा, वोट की फसल उतनी जल्दी पकेगी. पकी फसल काटनेवाले योगियों की कमी थोड़े ही है प्रधानमंत्री के पास !

उन्होंने कह दिया कि ‘ पाकिस्तान युवराज को प्रधानमंत्री बनाने को बेकरार  है’, तो कह दिया. गोदी मीडिया के पंखों पर सवार हो कर बात सब दूर फैल गई. इसमें ‘पाकिस्तान’ और ‘युवराज’ दो ही शब्द हैं जिसका जहरीला असर प्रधानमंत्री को पैदा करना है. उन्हें लगता है कि देश आज भी इतना जाहिल है कि उनका मनचाहा हो जाएगा. सच क्या है ? सच इतना ही है कि पाकिस्तान के एक सांसद को मोदी से कहीं भला लगता है कि राहुल गांधी भारत के प्रधानमंत्री हों. किसी एक व्यक्ति को पूरे देश का प्रतिनिधि बता कर कुछ भी बयान दे देना, गांधी के शब्दों में ‘ड्रेन इंस्पेक्टर रिपोर्ट’ है.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संदर्भ दे कर प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस कहती है कि देश के धन पर पहला हक मुसलमानों का है. कोई प्रमाण ? कोई संदर्भ ? तुरंत ही गंदी नाली में उतरे प्रधानमंत्री के सिपाही और  खोज लाए एक वीडियो. वीडियो चलाया गया तो उसमें मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक उनका होना चाहिए जो कमजोर हैं, अल्पसंख्यक हैं. हमारे देश में मुसलमान भी अल्पसंख्यक की श्रेणी में आते हैं, तो उनका नाम भी लिया मनमोहन सिंह ने. यह कोई छुपी बात तो है नहीं कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में जिस कांग्रेस का जन्म हुआ वह अंतिम आदमी की बात करती थी तथा यह भी मानती थी कि वह अंतिम आदमी हमारे विकास की कसौटी भी है और कारण भी. धर्म के आधार पर इनमें फर्क करना कांग्रेस की नीति में नहीं है. व्यवहार में राजनीति बहुत कुछ ऐसा कराती है जैसा इन दिनों मोदी-कुनबा कर रहा है, तो जितनी छूट इन्हें है उतनी छूट मनमोहन सिंह को क्यों नहीं दी जानी चाहिए ? कांग्रेस और मनमोहन सिंह सांप्रदायिकता का फायदा उठाते होंगे भले लेकिन सांप्रदायिकता उनकी राजनीति का आधार कभी नहीं रही है. हिंदू महासभा से ले कर भारतीय जनता पार्टी तक अपने हर अवतार में नरेंद्र मोदियों ने सांप्रदायिकता को ही अपनी राजनीति का आधार बनाया है. इन दोनों में बहुत बड़ा गुणात्मक फर्क है.

मोदी के छुटभैय्यों में से एक राजनाथ सिंह जब नाली में उतरे तो यह गंदगी समेट लाए कि महात्मा गांधी कांग्रेस को समाप्त करना चाहते थे लेकिन नेहरू एंड कंपनी ने यह होने नहीं दिया. यही महाशय थे जिन्होंने नाली छान कर यह गंदगी समेटी थी कि सावरकर ने महात्मा गांधी के कहने से अंग्रेजों को माफीनामा लिखा था. वह झूठ आज तक उनका मुंह काला करता है, तो यह नया सत्य इन्हें कहां ला पटकेगा ! महात्मा गांधी की जिस दिन संघ-परिवार ने हत्या की, उससे पहले की रात गांधीजी ने अपनी जिंदगी का आखिरी दस्तावेज लिखा था. उसे पढ़ने व समझने की कसरत भले न करें राजनाथ सिंह लेकिन इतना तो जानें कि उस दस्तावेज में गांधीजी ने लिखा था कि आजादी मिलने के साथ ही कांग्रेस पार्टी का काम पूरा हो गया. अब इसे विसर्जित कर देना चाहिए. कांग्रेस पार्टी के जो लोग सत्ता की राजनीति में काम करना चाहते हैं उन्हें अपनी नई पार्टी बनानी चाहिए. लेकिन ईमानदारी से इतिहास का ककहरा भी जिसने पढ़ा होगा उसे इसी के साथ एक दूसरा दस्तावेज भी मिलेगा जिसमें आजादी के बाद गांधी जवाहरलाल से पूछते हैं कि तुम अब कांग्रेस की क्या भूमिका देखते हो; और जवाहरलाल कहते हैं कि उन्हें अब कांग्रेस की कोई खास भूमिका दिखाई नहीं देती है, तो गांधी कहते हैं कि नहीं, कांग्रेस कभी खत्म नहीं होगी, उसे कभी खत्म नहीं होना चाहिए क्योंकि वह जिन मूल्यों के लिए काम करती रही है, वे मूल्य अक्षुण्ण हैं. राजनीति के जोकरों के लिए यह बारीकी समझ पाना संभव नहीं है कि गांधीजी कांग्रेस संगठन व कांग्रेस मूल्य में फर्क करते हुए जवाहरलाल को सावधान करते हैं. इसलिए कांग्रेस जिन मूल्यों के लिए बनी व लड़ी थी, उन मूल्यों को खत्म करने में लगी संघी धारा को कोई नैतिक हक नहीं है कि वह महात्मा गांधी की उन बातों का संबंध आज से जोड़े. और इतिहास के पन्ने ही पलटने हों तो राजनाथ सिंहों को वे सारे पन्ने भी देखने चाहिए जिनमें गांधीजी ने हिंदू महासभा-राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ जैसे सांप्रदायिकता में तैरने वाले संगठनों के लिए कठोरतम वर्जनाएं की हैं.

सच और झूठ में क्या फर्क है ? बकौल कृष्णबिहारी ‘नूर’ :

सच बढ़े या घटे तो सच ना रहे / झूठ की कोई इंतहा ही नहीं. जैसे यह शेर भारतीय जनता पार्टी के लिए ही लिखा गया है.

(03.05.2024)   
मेरे ताजा लेखों के लिए मेरा ब्लॉग पढ़ें
https://kumarprashantg.blogspot.com

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अगर भाजपा का पिछले दस साल का शासन तो ट्रेलर था तो अब क्या होगा!

राम पुनियानी|Opinion - Opinion|4 May 2024

राम पुनियानी

जहाँ तक प्रोपेगेंडा का सवाल है, हमारे प्रधानमंत्री का मुकाबला कम ही नेता कर सकते हैं. एक ओर वे कांग्रेस की कई घोषणाओं को सांप्रदायिक बता रहे हैं तो दूसरी ओर यह दावा भी कर रहे हैं कि उनके 10 साल के शासनकाल की उपलब्धियां शानदार और चमकदार तो हैं हीं मगर वे मात्र ट्रेलर हैं. और यह भी कि 2024 में उनकी सरकार फिर से बनने के बाद वे और बड़े काम करेंगे. उनके समर्थक उनकी सरकार की उपलब्धियों का गुणगान कर रहे हैं. मगर सच यह है कि उनकी सरकार ने कोई कमाल नहीं किया है.

मोदी भक्त कहते हैं कि मोदी राज में इन्टरनेट के उपयोग और हवाई यात्राओं में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है, 42 करोड़ नए बैंक खाते खुले हैं, 11 करोड़ नए एलपीजी कनेक्शन दिए गए हैं, 22 करोड़ लोगों का बीमा किया गया है, राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में तेजी आई है और करदाता बढे हैं. इसके अलावा, भारत ने कई देशों को कोविड वैक्सीन का निर्यात किया है जिससे दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ा है और 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध करवाया गया है.

ये सारे आंकड़े न तो यह साबित करते हैं कि आम जनता के हालात बेहतर हुए हैं, ना यह कि भारत पहले से बेहतर प्रजातंत्र है और ना ही यह कि यहां के लोगों को लोकतान्त्रिक अधिकार और स्वतंत्रताएं हासिल हैं. कई ऐसे कदम उठाए गए हैं जिनसे जनकल्याण बाधित हुआ है और लोगों के अधिकार सीमित हुए हैं.

सन 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से कैबिनेट शासन प्रणाली कमज़ोर हुई है और सारी शक्तियां उनके हाथ में केन्द्रित हो गयी हैं. अधिकांश मामलों में सारे निर्णय वे ही लेते हैं. इसके दो उदाहरण हैं नोटबंदी और कोरोना महामारी से निपटने के लिए उठाए गए कदम. नोटबंदी केवल माननीय मोदीजी निर्णय था और हमें बताया गया था कि इससे कालाधन अर्थव्यवस्था से बाहर हो जायेगा. लेकिन हुआ क्या? जनता को बेइंतिहा परेशानियाँ झेलनी पडीं. करीब 100 लोगों ने पुराने नोट बदलने के लिए बैंकों के बाहर लम्बी लाईनों में खड़े-खड़े अपनी जान गंवाई. और अंततः बंद किये गए नोटों में से 98 प्रतिशत बैंकों में आपस आ गए.

कोरोना महामारी एक बड़ी विपदा थी जिसे मोदी ने और बड़ा बना दिया. उन्होंने कुछ घंटों के नोटिस पर पूरे देश में कड़ा लॉकडाउन लगा दिया. हम सबने ने उन लोगों की त्रासदी देखी है जिन्हें पैदल शहरों से अपने गाँवों जाना पड़ा. गंगा में तैरती हुई लाशों और उसके तटों पर बिखरे हुए शवों से साफ़ यह हो गया था कि लोगों ने क्या भोगा है.

संवैधानिक संस्थाओं और सरकारी एजेंसीयों की स्वयत्तता पूरी तरह समाप्त कर दी गई है. वे सरकार, बल्कि श्री मोदी, के इशारों पर नाच रही हैं. चाहे वह ईडी हो या सीबीआई, चाहे वह आयकर विभाग हो या चुनाव आयोग – कोई भी निष्पक्षता से काम नहीं कर रहा है. यहाँ तक कि न्यायपालिका भी सरकार के पक्ष के झुकी हुई लग रही है.

जहाँ तक प्रजातंत्र का सवाल है, वी. डेम नामक एक स्वायत्त और स्वतंत्र संस्थान, जो पूरी दुनिया में प्रजातंत्र की स्थिति का आंकलन करता है, ने 2024 में भारत को “सबसे निकृष्टतम तानाशाहियों” में से एक बताया है. सन 2018 में इसी संस्थान ने भारत को “निर्वाचित तानाशाही”  बताया था. संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, “भारत की आबादी दुनिया के कुल आबादी का करीब 18 प्रतिशत है मगर भारतीय, दुनिया की आधी ऐसी आबादी हैं जो निरंकुश शासन व्यवस्था के अंतर्गत रह रहे हैं.”

जहाँ तक प्रेस की स्वतंत्रता का सवाल है, हर व्यक्ति यह देख सकता है कि देश का मीडिया उन धन्नासेठों के नियंत्रण में है जो मोदी सरकार के नज़दीक है. “रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स” की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में 180 देशों में भारत 161वें नंबर पर है. केवल एक साल में वह 150 से 161वें स्थान पर पहुँच गया है. भारत में अपने बात खुलकर कहने और सरकार की आलोचना करने को देशद्रोह बताया जाता है और हमारे अनेक समर्पित और प्रतिबद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता सालों से जेलों में हैं और उन पर क्या आरोप हैं, यह भी तय नहीं हुआ है.

“यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम” के अनुसार, “पिछले एक साल में भारत की केन्द्रीय, प्रांतीय और स्थानीय सरकारों ने ऐसी नीतियाँ अपनाई हैं जो विभिन्न धर्मों के बीच भेदभाव करती हैं और ऐसे कानून बनाए हैं जो धर्मपरिवर्तन, अंतर्धार्मिक रिश्तों, हिजाब पहनने और गौवध को प्रतिबंधित करने हैं और जिनका मुसलमानों, ईसाईयों, सिक्खों, दलितों और आदिवासियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.”

ह्यूमन राइट्स वाच भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की स्थिति का वर्णन करते हुए कहता है, “भारत में सरकार ने ऐसी नीतियां और कानून बनाये हैं जो मुसलमानों के साथ सुनियोजित ढंग से भेदभाव करते हैं और सरकार के आलोचकों को कलंकित करते हैं. हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार के पूर्वाग्रहों ने पुलिस और अदालतों जैसी स्वतंत्र संस्थाओं में भी घुसपैठ कर ली है. इसके चलते (हिन्दू) राष्ट्रवादी समूह बिना किसी डर के धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित और प्रताड़ित कर रहे हैं और उन पर हमले कर रहे हैं.”

देश की आर्थिक स्थिति खस्ता है और बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है. मोदी ने वायदा किया था कि उनकी सरकार हर साल दो करोड़ रोज़गार देगी. मगर देश में बेरोज़गारी की दर अपने उच्चतम स्तर 8.3 प्रतिशत पर है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनोमी के अनुसार, “भारत में बेरोज़गारी की दर जनवरी 2024 में 6.8 प्रतिशत थी, जो फरवरी 2024 में बढ़ कर आठ प्रतिशत हो गई.” मार्च 2024 में यह कुछ कम हुई मगर अब भी यह पिछले 40 सालों में सबसे ज्यादा है.

हंगर इंडेक्स समाज में पोषण की स्थिति का पता लगाने का उत्तम माध्यम है. हंगर इंडेक्स में भारत 121 देशों में 107वें स्थान पर है. इस मामले में भारत पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे अपने पड़ोसी देशों से भी पीछे है.

ऑक्सफेम इंडिया की रिपोर्ट (सरवाईवल ऑफ़ द रिचेस्ट) हमें बताती है कि “देश के मात्र 5 प्रतिशत नागरिक, देश की 60 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं और नीचे के पचास प्रतिशत नागरिक, कुल संपत्ति में से केवल 3 प्रतिशत के स्वामी हैं.”

पिछले दस सालों में दलितों की स्थिति में गिरावट आई है. जानेमाने अध्येता सुखदेव थोराट के अनुसार, “शहरी इलाकों में दलितों का उपयोग अकुशल श्रमिकों के रूप में किया जा रहा है. भारत के केवल पांच प्रतिशत दलित आरक्षण की व्यवस्था से लाभान्वित हुए हैं…हालाँकि भारत सरकार के निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों से भी दलितों को भी लाभ पहुँचता है मगर सरकार इन योजनाओं के कार्यान्वयन पर कड़ी नज़र नहीं रखती और कई योजनाएं का क्रियान्वयन होता ही नहीं है…”

शिक्षा और वैज्ञानिक शोध को मजाक बना दिया गया है. तार्किक सोच पर आस्था हावी है. जिस देश का प्रधानमंत्री यह दावा करे कि प्राचीन भारत में ऐसे प्लास्टिक सर्जन थे जो मनुष्य के सर पर हाथी का सिर फिट कर सकते थे और यह कि बादलों के कारण भारत के लड़ाकू विमानों को रडार नहीं पकड़ सकीं, उस देश में शिक्षा और विज्ञान की स्थिति की कल्पना की जा सकती है.

अगर, जैसा कि मोदीजी कहते हैं, पिछले दस साल तो केवल ट्रेलर थे तो अगर वे सत्ता में वापस आते हैं तो भारत सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान के साथ कड़े मुकाबले में होगा.

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)  

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એક નિરંતર ઉત્સવ

અનુવાદ : નંદિતા મુનિ|Opinion - Opinion, Poetry|3 May 2024

જે Aparna Anekvarnaનાં મને બહુ ગમતાં કાવ્યો પૈકી એકનો અનુવાદ પ્રસ્તુત કરું છું.

એક નિરંતર ઉત્સવ

ધીમે ધીમે બજાવાતા રબાબ જેવો

જેને કોઇ વિચારલુપ્તતામાં વગાડી રહ્યું હોય, 

બસ પોતાના માટે જ :

જાણે કોઇને સંભળાવવાથી એ મલિન થઇ જશે

કોઇ સાક્ષી હશે તો જાણે એનું જાદુ છિનવાઇ જશે

જાણે કે વર્ષોથી કોઇ કંઇ બોલ્યું જ ના હોય –

મોં ખોલે તો પણ અવાજ નીકળે નહીં

કંઠનું કંપન, આરોહ-અવરોહ, બધું નકામું.

કલાદીર્ઘા ભૂંસાઇ જાય મનમાંથી,

વિવેચકોની સ્મૃતિ માત્ર ઊડી જાય –

એ જ સાથી બને જે  ભીતર આવે તો જૂતાં ઉતારીને.

એક કણ જેટલું બહાર પણ મંજૂર નહીં …

બસ રંગો ઉતરે નવા નવા,

એક પુલ બંધાય આત્માથી પીંછી સુધી.

એટલું જ બોલવાનું – 

આવશ્યકને પણ ગાળી નાખ્યા પછી જેટલું બચતું હોય.

ચાલો મન,

ધીરે ધીરે ગાયતોંડે બની જઇએ.

(ચિત્ર : વી.એસ. ગાયતોંડે)

સૌજન્ય : નંદિતાબહેન મુનિની ફેઇસબૂક દીવાલેથી સાદર

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Opinion

  • ચલ મન મુંબઈ નગરી—334
  • મારે મોગલ ને ફુલાય પિંજારા 
  • અસત્યના પ્રયોગો  
  • દલિત આંદોલનની દિશા કેવળ અનામત-એટ્રોસિટીમાં ઇતિ નથી
  • અમેરિકી શ્યામવર્ણી લોકો પર વંશીય ભેદને લીધે સ્વિમિંગની મનાઈ!

Diaspora

  • યુ.કે.માં ડ્રાઇવિંગની પરીક્ષા
  • અમીના પહાડ (1918 – 1973) 
  • છ વર્ષનો લંડન નિવાસ
  • દીપક બારડોલીકરની પુણ્યતિથિએ એમની આત્મકથા(ઉત્તરાર્ધ)ની ચંદ્રકાન્ત બક્ષીએ લખેલી પ્રસ્તાવના.
  • ગાંધીને જાણવા, સમજવાની વાટ

Gandhiana

  • માનવતાવાદી ત્રિપુટીને સ્મરણાંજલિ 
  • ગાંધી ‘મોહન’માંથી ‘મહાત્મા’ બન્યા, અને આપણે?
  • ગાંધીહત્યાના પડઘા: ગોડસેથી ગોળવલકર સુધી …
  • ગાંધીની હત્યા કોણે કરી, નાથુરામ ગોડસેએ કે ……? 
  • ગાંધીસાહિત્યનું ઘરેણું ‘જીવનનું પરોઢ’ હવે અંગ્રેજીમાં …

Poetry

  • કવિ
  • ગઝલ
  • ગઝલ
  • કોઈ અપાવે જો એ બાળપણ પાછું …
  • પન્નાને, વેલન્ટાઈન ડે, ફેબ્રુઆરી 14, 2026 ~ સોનેટ ~ નટવર ગાંધી

Samantar Gujarat

  • ઇન્ટર્નશિપ બાબતે ગુજરાતની યુનિવર્સિટીઓ જરા પણ ગંભીર નથી…
  • હર્ષ સંઘવી, કાયદાનો અમલ કરાવીને સંસ્કારી નેતા બનો : થરાદના નાગરિકો
  • ખાખરેચી સત્યાગ્રહ : 1-8
  • મુસ્લિમો કે આદિવાસીઓના અલગ ચોકા બંધ કરો : સૌને માટે એક જ UCC જરૂરી
  • ભદ્રકાળી માતા કી જય!

English Bazaar Patrika

  • My mother cries on the phone’: TV’s war spectacle leaves Indians in Israel calming frightened families
  • “Why is this happening to me now?” 
  • Letters by Manubhai Pancholi (‘Darshak’)
  • Vimala Thakar : My memories of her grace and glory
  • Economic Condition of Religious Minorities: Quota or Affirmative Action

Profile

  • તપસ્વી સારસ્વત ધીરુભાઈ ઠાકર
  • સરસ્વતીના શ્વેતપદ્મની એક પાંખડી: રામભાઈ બક્ષી 
  • વંચિતોની વાચા : પત્રકાર ઇન્દુકુમાર જાની
  • અમારાં કાલિન્દીતાઈ
  • સ્વતંત્ર ભારતના સેનાની કોકિલાબહેન વ્યાસ

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