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ત્રણ રચના

Tran Rachana, દેવિકા ધ્રુવ|Poetry|23 December 2023

૧. 

દોસ્ત

તારી સાથે ચાલી નીકળવાની
ન તો કોઈ ઉતાવળ છે;
ન કોઈ અધીરાઈ.
ગમે ત્યારે આવજે ને?
ટાઢ, તાપ કે વરસાદ,
સાંજ, સવાર કે રાત,
ગમે ત્યારે, ગમે ત્યાં,
તું આવીશ ત્યારે તૈયાર રહીશ.
કશી આનાકાની નહિ કરું.
તું ચોક્કસ આવીશ,
એની તો ખાત્રી છે જ!
વિધાન પાળવામાં,
તારી તોલે કોઈ ન આવે.
કદાચ એટલે જ તો,
તારું માન છે, સ્વીકાર છે.
ફરી કહું છું,
ગમે તેવાં અધૂરાં કામો
પડતાં મૂકીને પણ આવીશ.
અરે, ઘોડે ચડીને આવવાની
તને છૂટ છે, જા !
પણ દોસ્ત,
એક વિનંતિ કરું ?
ભવ્યતાથી આવજે હોં !
મને અને સૌને ગમે
તે રીતે આવજે.
યાદગાર રીતે આવજે.
કોઈ નિશ્ચિત તો નહિ,
પણ થોડી આગાહી આપજે.
જેથી સજધજ થઈ,
તારી રાહ જોવાય.
આરતી ઉતારી, તારું
સન્માન થાય, જન્મની જેમ જ;
દોસ્ત, યમરાજ !

(૨)

વંટોળ

 છંદઃ શિખરિણીઃ સોનેટ

ફરે, ઘૂમે,ઊડે, સતત મનની ખીણ મહીં એ,
કદી સૂતી જાગે સળવળ થઈ ખૂબ ઝબકે.
વળી સ્પર્શે, ખેંચે, રજકણ વિચારોની ચમકે.
અને ઘેરે શબ્દે, નીરવ રજનીનાં વનવને.
ચડે વંટોળે એ ઘમરઘમ ઘૂમે વમળ શું,
ઊંચે નીચે થાતું, સઘળું વલવાતું હૃદયનું.

પછી ધીરે આવે સરવર પરે શાંત જલ થૈ
મઢી ચારેકોરે મખમલ સમી સેજ બિછવે.
ભળે એવું ધીમે જલકમલ જેવું સ્થિર કશું
કહું, પૂછું ત્યાં તો પરવશપણે ખેંચતું બધું.
મિટાવી ચિંતાઓ, કરકમલ લેખિની ધરીને,
જગાવી શક્તિ સૌ તનમન શ્વસે પ્રાણ દઈ દે.

કશું ના જાણું હું, કલમ કરતાલે રણકતું,
અહો, કેવી લીલા કવનકણથી એ શમવતું..

 (૩)  

અતિનાજુક

નાજુકમાં નાજુક,

અતિ નાજુક સંવેદના.

ગર્ભાય છે મનના ઉદરમાં!

ત્યાં જ એનો આકાર બંધાય છે.

સતત શ્વસે છે એ.

એના હવા, પાણી ને પ્રકાશ

પીડા, વેદના ને યાતના!

એક જોરદાર ધક્કો

ને પછી પ્રસવે છે,

એક બળૂકી કવિતા.

ઊછરે છે, મોટી થાય છે,

ને પછી ફેંકાય છે પ્રકાશનના બજારમાં!

એના અડ્ડાઓમાં અટવાય છે.

સોનાની એ સંવેદનાઓ

તરાશે છે ને તલાશે છે .. એક ખરા ઝવેરીને.

દિવસ ને રાત .. અહર્નિશ..

ને … ફરીથી એ જ સિલસિલો..

એ જ હવા .. પાણી .. પ્રકાશ…

પીડા, વેદના, યાતના..

ને એ જ કવિતા.

પ્રગટ : ’સાહિત્યિક સંરસન -૩’
e.mail : ddhruva1948@yahoo.com

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बेरोज़गारी और भगतसिंह

राम पुनियानी|Opinion - Opinion|23 December 2023

राम पुनियानी

गत 13 दिसंबर 2023 को दो युवक संसद भवन की सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देते हुए दर्शक दीर्घा से सदन के अंदर कूद गए, जहां उन्होंने पीले रंग की एक गैस हवा में छोड़ी. इससे सदन में हंगामा मच गया. पूरी योजना चार युवाओं द्वारा बनाई गई थी जो बेरोजगारी की ओर देश का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे. इन युवाओं में से एक आटो रिक्शा चालक और एक किसान था, एक सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था और एक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी था. इन सभी को कर्नाटक से निर्वाचित सांसद प्रताप सिम्हा द्वारा दर्शक दीर्घा के पास उपलब्ध करवाए गए थे. इनमें से दो, जो भवन के अंदर घुसे थे, ने अपने जूतों में गैस के कैन छुपाए हुए थे. सन् 2001 में इसी दिन (13 दिसंबर) संसद पर आतंकी हमला हुआ था और युवाओं के सदन में कूदने से पहले सांसदों ने उस हमले में शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि दी थी.

युवाओं के जिस समूह ने इस घटना की योजना बनाई थी, उसमें स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त 42 वर्ष की नीलम आजाद और 22 वर्ष के सागर शिंदे शामिल थे. जिस समय उनके दो साथी सदन के अंदर गैस छोड़ रहे थे उस समय ये लोग संसद भवन के प्रांगण में यही कर रहे थे. नीलम आजाद हरियाणा के जींद से हैं. उनके पास एमए एमएड और एमफिल की डिग्रियां हैं. इसके अतिरिक्त वे नेशनल एलीजिबिलिटी टेस्ट (नेट) भी उत्तीर्ण कर चुकी हैं. वे अब भी बेरोजगार हैं. युवाओं ने अंदर जो नारे लगाए उनमें शामिल थे ‘तानाशाही खत्म करो’, ‘संविधान की रक्षा करो’, ‘जय हिन्द’ और ‘वंदे मातरम’. उनका उद्धेश्य बेरोजगारी के गंभीर संकट की ओर देश का ध्यान खींचना भी था.

ये सभी लोग भगतसिंह फैन्स क्लब नामक एक सोशल मीडिया ग्रुप के सदस्य हैं. वे एक सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिए एक-दूसरे के संपर्क में आए थे. उनका प्रेरणास्त्रोत था भगतसिंह की ठीक इसी तरह की कार्यवाही. सन् 1929 में भगतसिंह और उनके मित्र बटुकेश्वर दत्त ने सेन्ट्रल असेम्बली की दर्शक दीर्घा से एक बम सदन में फेंका था. उन्होंने बम फेंकने के पहले यह सुनिश्चित किया कि उससे किसी को चोट न पहुंचे. दोनों क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश औैपनिवेशिक शासन के विरोध में पर्चे भी सदन में फेंके थे.

इन युवाओं, जिन्हें अवैध गतिविधियां निरोधक अधिनियम (यूएपीए) के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है, ने बढ़ती हुई बेरेजगारी के मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श के केन्द्र में लाने का अत्यंत प्रभावी प्रयास किया है. भगतसिंह और उनके कामरेडों ने बम फेंकने का निर्णय इसलिए लिया था क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि समाचारपत्रों में उनके विचारों को कोई स्थान नहीं मिलेगा. इस समय भी स्थिति ठीक यही है. मुख्यधारा का मीडिया, जिसे ‘गोदी मीडिया’ का अत्यंत उपयुक्त नाम दिया गया है, का आम लोगों के सरोकारों और परेशानियों के प्रति पूर्णतः उपेक्षापूर्ण रवैया है. बढ़ती मंहगाई, हंगर इडेक्स में भारत की गिरती स्थिति और बेरोजगारों की दिन-ब-दिन बड़ी होती फौज मीडिया को न तो नजर आ रही है और ना ही उसे इनसे कोई मतलब है.

मोदी ने 2014 के आम चुनाव के लिए प्रचार के दौरान वायदा किया था कि सत्ता में आने के बाद भाजपा की सरकार हर वर्ष रोजगार के दो करोड़ अवसर निर्मित करेगी. असल में हुआ इसके उलट. नोटबंदी के कारण लघु उद्योगों और गांवों और छोटे शहरों में करोड़ों लोगों ने अपनी नौकरियां और काम-धंधे खो दिए. यह सरकार बड़े कारपोरेट घरानों के पूर्ण नियंत्रण में है और रोजगार के अवसरों के सृजन के बारे में सोच भी नहीं रही है. उल्टे कुछ कुबेरपति (नारायण मूर्ति) लोगों से हफ्ते में 70 घंटे काम करने के लिए कह रहे हैं. असंगठित क्षेत्र में प्रति कार्यदिवस काम के घंटे पहले ही 8 से बढ़कर 12 हो चुके हैं.

‘द इकानामिक टाईम्स’ में प्रकाशित एक खबर कहती है कि “सेंटर फॉर मानिटरिंग इंडियन इकोनामी” के आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी की सकल दर, जो सितंबर में 7.09 प्रतिशत थी, पिछले माह बढ़कर 10.05 प्रतिशत हो गई. यह  मई 2012 के बाद से अब तक की उच्चतम दर है. इसी अवधि में ग्रामीण बेरोजगारी की दर 6.2 प्रतिशत से बढ़कर 10.82 प्रतिशत हो गई. शहरी बेरोजगारी में मामूली गिरावट आई और यह 8.44 प्रतिशत रही. इसी समाचारपत्र ने 1 नवंबर 2023 को प्रकाशित एक खबर में लिखा, “पिछले महीने इंफोसिस लिमिटेड व विप्रो लिमिटेड सहित कई ऐसी भारतीय कंपनियों, जो तकनीकी सेवाओं की आउटसोर्सिंग करती हैं, ने घोषणा की है कि वे नए स्नातकों को काम देने की अपनी योजनाओं को विराम दे रही हैं. इसका मतलब यह है कि कालेजों से निकलने वाले हजारों इंजीनियरिंग डिग्रीधारी बेरोजगार रहेंगे”. इस सबके बीच प्रजातांत्रिक विरोध के लिए स्थान और अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं. विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी यूनियनों के चुनाव नहीं होने दिए जा रहे हैं और ऐसे सेमिनारों का आयोजन भी बाधित किया जा रहा है जिनमें सरकार की आलोचना की आशंका हो.

संसद में जो हुआ वह स्पष्टतः कुंठित विद्यार्थियों और युवाओं द्वारा अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करने का प्रयास था. इसमें कोई संदेह नहीं कि जो तरीका इन युवाओं ने अपनाया वह सही नहीं था. मगर क्या इन युवाओं के खिलाफ यूएपीए जैसे कड़े और भयावह कानून के अंतर्गत मामला दर्ज करना उचित है? राहुल गांधी ने बढ़ती बेरोजगारी और मंहगाई  को इस घटना के लिए जिम्मेदार बताया है. मगर विपक्ष की मांग के बावजूद गृह मंत्री इस घटना पर संसद में वक्तव्य देने से बचते रहे हैं. जो स्पष्ट दिख रहा है उसे देखने और समझने की बजाए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कह रहे हैं कि यह संसद की सुरक्षा व्यवस्था को भेदने का गंभीर मामला है और इसके पीछे कौनसे तत्व हैं इसका पता लगाया जाना जरूरी है. यह सही है कि इस घटना ने संसद की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है. चार साधारण युवा ‘अभेद्य सुरक्षा’ को बहुत आसानी से भेदने में सफल रहे हैं. मगर इसे कोई गंभीर  षड़यंत्र बताकर मूल मुद्दे से ध्यान हटाने की बजाए सरकार को बेरोजगारी की समस्या के सुलझाव की दिशा में काम करना चाहिए.

यह साफ है कि ये युवा किसी आतंकी या अतिवादी समूह या संगठन से जु़ड़े हुए नहीं हैं. यह भी अच्छा है कि इनमें से कोई मुसलमान नहीं है. वर्ना इस घटना का इस्तेमाल भी इस्लामोफोबिया को और हवा देने के लिए किया जाता.

इन युवाओं ने यह बता दिया है कि भगतसिंह को केवल शाब्दिक श्रद्धांजलि देने से काम नहीं चलने वाला है. हमें उनके दिखाए रास्ते पर चलना होगा. भगतसिंह जनांदोलनों के हामी थे. अपने जीवन की शुरूआत में वे हिंसा के समर्थक थे परंतु बाद में उन्होंने हिंसा का रास्ता त्याग दिया था. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि केवल आम लोगों की गोलबंदी के बल पर ही हम आजादी हासिल कर सकते हैं. उन्होंने सेन्ट्रल असेंबली में किसी को मारने के लिए नहीं बल्कि ‘बेहरों को सुनाने के लिए’ बम फेंका था. यह अत्यंत गर्व और प्रसन्नता की बात है कि मुसीबतों के भंवर में फंसे हमारे युवा भगतसिंह को अपने मार्गदर्शक के रूप में देख रहे हैं.

पूरे घटनाक्रम को उसके सही संदर्भ में समझा और देखा जाना चाहिए. गोदी मीडिया की तर्ज पर इसके पीछे कोई खतरनाक षड़यंत्र ढूंढ़ने का प्रयास नहीं होना चाहिए. युवाओं का उद्धेश्य एकदम साफ है और यह भी साफ है कि वे किसी भी किस्म की आतंकी विचारधारा से प्रेरित नहीं हैं और उनके एकमात्र प्रेरक और मार्गदर्शक हमारे स्वाधीनता संग्राम के महानतम क्रांतिकारी भगतसिंह हैं.

यह तो कोई नहीं कह सकता कि अपनी बात रखने के लिए इन युवाओं ने जो तरीका अपनाया वह ठीक था. मगर उन्हें खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने या उनके पीछे किसी बड़ी शक्ति को ढूंढ़ने की कोशिश करने की बजाए उनके दर्द, उनके सरोकार और उनके संदेश को समझने की कोशिश होनी चाहिए. यही हमारे देश के प्रजातांत्रिक होने का सुबूत है.

20/12/2023
(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीशहरदेनिया; लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)
https://www.navjivanindia.com/opinion/breach-in-the-security-of-parliament-commotion-unemployment-and-history-of-bhagat-singh-article-by-ram-puniyani

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क्या आप इस संसद को पहचानते हैं

कुमार प्रशांत|Opinion - Opinion|23 December 2023

कुमार प्रशांत

कांग्रेसमुक्त भारत बनाने की बदहवास होड़ को यही रास्ता पकड़ना था. देश भी तेजी से कांग्रेसमुक्त हो रहा है; संसद भी विपक्ष मुक्त हो गई है. संविधान में ऐसी मुक्ति की कोई कल्पना नहीं है. वहां तो संसदीय लोकतंत्र का आधार ही पक्ष-विपक्ष दोनों है. विपक्ष अपने कारणों से चुनाव न जीत सके तो वह जाने लेकिन जो और जितने जीत कर संसद में पहुंचे हैं, उन्हें पूरे अधिकार व सम्मान के साथ संसद में रखना सत्तापक्ष का लोकतांत्रिक दायित्व है. लोकसभा का अध्यक्ष इसी काम के लिए रखा जाता है कि वह संसदीय प्रणाली व सांसदों की गरिमा का रक्षक बन कर रहेगा. लेकिन हम यह नया भारत देख रहे हैं. इसमें भारत कहां है यह भी खोजना पड़ता है, इस नये भारत की संसद में विपक्ष कहां है, यह भी खोजना पड़ता है. एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में हम अपने अस्तित्व की ऐसी शानदार जगह पर आ पहुंचे हैं जहां से वह हर कुछ खोजना पड़ रहा है जिसकी दावेदारी तो बहुत हो रही है लेकिन दिखाई कुछ भी नहीं देता है.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि विपक्ष ने संसद चलने में इतनी बाधा पैदा की कि उन्हें दंडित करना पड़ा. 60 के दशक से पहले अध्यक्ष की अपील व झिड़की काफी होती थी  कि संसद के कामकाज में बाधा डालने वाला रास्ते पर आ जाता था. 60 के दशक में विपक्ष ने भी अपने अधिकारों की मांग शुरू की. उसका स्वर तीखा होता गया. 70 के दशक में कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के मनमाने के सामने गूंगे रह कर विपक्ष को संसद से बाहर कर दिया था. लेकिन वह आपातकाल का संदर्भ था.

जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी, तब उसने संसद को अंटकाने को हथियार की तरह बरतना शुरू किया. संसद की ऐसी-तैसी करते हुए भाजपा के अरुण जेटली व सुषमा स्वराज्य ने ऐसे बर्ताव को विपक्ष का जायज हथियार बताया था. उस वक्त के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने संसद को बंधक रखने जैसी प्रवृत्ति पर गहरा असंतोष व्यक्त किया था. लेकिन जब आप फिसलन पर पांव धरते हैं तब गिरावट आपके काबू में नहीं रहती है.

2014 के बाद से संसद का सामान्य शील भी खत्म हो गया और इस बार इसे विपक्ष ने नहीं, सत्तापक्ष ने खत्म किया. सबसे पहले तो प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि हमारा विपक्ष देशद्रोही, राष्ट्रीय एकता का दुश्मन, भ्रष्टाचारी तथा विभाजनकारी ताकतों का सफरमैना है. विपक्ष के लिए जवाहरलाल से मनमोहन सिंह तक, किसी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं कहा था. अपार बहुमत से सरकार बनाए प्रधानमंत्री को विपक्ष को ऐसा कहने की जरूरत क्यों पड़ी ? इसलिए कि वे भयग्रस्त मानसिकता से घिरे थे; घिरे हैं. उन्हें पता है कि यह जो सत्ता हाथ आई है, उसके पीछे आत्मबल नहीं, तिकड़में हैं. तिकड़म का चरित्र ही यह है कि वह कब छल कर जाए, आपको पता भी नहीं चले. इसलिए रणनीति यह बनती है कि हर विपक्ष व हर असहमति को इतना गिरा दो, पतित कर दो कि उसके उठने की संभावना ही न बचे. विपक्ष, संवैधानिक संस्थाओं, स्वतंत्र जनमत, मीडिया, राज्य सरकारों आदि का ऐसा श्रीहीन अस्तित्व पहले कभी नहीं था. विपक्ष, जिसने 60-65 सालों तक देश चलाया है, अगर देशद्रोही, भारत का दुश्मन, विभाजनकारी ताकतों का सफरमैना तथा भ्रष्टाचारियों का सरदार होता, तो क्या आपको वैसा देश मिलता जैसा मिला ? आप चुनाव जीत सके, प्रधानमंत्री बन सके, यही इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष पर लगाए आपके आरोप बेबुनियाद हैं. विपक्ष दूध का धुला है, ऐसा कोई नहीं कहेगा लेकिन आपका दूध शुद्ध है, ऐसा भी तो कोई नहीं कहता है.

आप यह जरूर कह सकते हैं कि आजादी के बाद से अब तक विपक्ष ने जैसी सरकार चलाई, जैसा समाज बनाया उससे भिन्न व बेहतर सरकार व समाज हम बनाएंगे. आपको यह कहने का अधिकार भी है व उसका आधार भी है, क्योंकि आपने सारे देश में एकदम भिन्न एक विमर्श खड़ा कर अपने लिए चुनावी सफलता अर्जित की है. लेकिन देश आजाद ही 2014 में हुआ, ऐसा विमर्श बनाना व सत्ता की शक्ति से उसे व्यापक प्रचार दिलाना दूसरा कुछ भी हो, स्वस्थ्य लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डालने से कम नहीं है. अब यह राजनीतिक शैली दूसरे भी सीख चुके हैं. वे भी इतनी ही कटुता से स्तरहीन विमर्श को बढ़ावा दे रहे हैं. लोकतंत्र में सार्वजनिक विमर्श का सुर व स्तर सत्तापक्ष निर्धारित करता है, विपक्ष उसका अनुशरण करता है. संसद जिस स्तर तक गिरती है, देश का सार्वजनिक विमर्श भी उतना ही गिरता है.

संसद के दोनों सदनों में अध्यक्ष का पहला व अंतिम दायित्व एक ही है : सदस्यों का विश्वास हासिल करना तथा सदस्यों का संवैधानिक संरक्षण करना है. प्रत्यक्ष या परोक्ष पक्षपात आपकी नैतिक पकड़ कमजोर करता जाता है. 2014 से यह लगातार जारी है. यह सच छिप नहीं सकता है कि विपक्ष संख्याबल में कमजोर है जिसे आप बराबरी का अधिकार व अवसर न दे कर लगातार कमजोर करते जा रहे हैं. आपके ऐसे रवैये से विपक्ष का जो हो सो हो, सदन लगातार खोखला होता जा रहा है. वहां व्यक्तिपूजा, नारेबाजी, जुमलेबाजी तथा तथ्यहीनता का गुबार गहराता जा रहा है. ऐसी संसद न तो सदन के भीतर और न बाहर लोकतंत्र को मजबूत व समृद्ध कर सकती है. संविधान इस बारे में गूंगा नहीं है भले हम उसकी तरफ से मुंह फेर कर, निरक्षर व सूरदास बन गए हैं. संविधान के सामने सर झुकाना व संविधान का गला काटना इतिहास में कई बार हुआ है.

18 दिसंबर 2023 एक ऐतिहासिक दिन बन गया है. इस दिन से एक सिलसिला शुरू हुआ है जो अब तक कोई 150 सांसदों को दोनों सदन से बाहर निकाल चुका है. ये सारे निलंबन अनुशासन के नाम पर किए गए हैं. अचानक इतने सारे अनुशासनहीन सांसद कहां से आ गए ?   पहले से सब ऐसे ही थे तो अब तक सदन चल कैसे रहा था ? पहले से नहीं थे तो इन्हें अनुशासनहीन बनाने की स्थिति किसने पैदा की ? हर निलंबित सदस्य दोनों अध्यक्षों की क्षमता पर भी और उनकी मंशा पर भी सवाल खड़े करता है. संसदीय लोकतंत्र के प्रति आपकी प्रतिबद्धता कैसी है, यह कैसे आंकेंगे हम ? आपके व्यवहार से ही न !  विपक्ष के इतने सारे सदस्यों को निलंबित कर देने के बाद संसद में लगातार संवेदनशील बिल पेश भी किए जाते रहे, पारित भी किए जाते रहे, तो यह मंजर ही घोषणा करता है कि संसदीय लोकतंत्र का कोई शील आपको छू तक नहीं गया है.

150 के करीब विपक्षी सांसदों को निलंबित करने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं था, सत्तापक्ष का ऐसा तर्क मान भी लें हम तो संसदीय लोकतंत्र की भावना के अनुरूप यह तो किया ही जा सकता था कि इतने निलंबन के बाद संसद की बैठक स्थगित कर दी जाती और विपक्ष के साथ नये सिरे से विमर्श किया जाता कि अब संसद का काम कैसे चलेगा ? संसदीय लोकतंत्र का एकमात्र संप्रभु मतदाता है, जिसने वह संविधान रचा है जिससे आप अस्तित्व में आए हैं. उसने जैसे आपको चुनकर संसद में भेजा है वैसे ही उसने विपक्ष को भी चुन कर संसद में भेजा है. दोनों की हैसियत व अधिकार बराबर हैं और दोनों के संरक्षण की संवैधानिक जिम्मेवारी अध्यक्षों की है. इसलिए अध्यक्षों को यह भूमिका लेनी चाहिए थी कि भले किसी भी कारणवश इनका निलंबन हुआ हो, इनको चुनने वाले मतदाता का अपमान हम नहीं कर सकते, सो संसद स्थगित की जाती है और हम सर जोड़ कर बैठते हैं कि इस उलझन का क्या रास्ता निकाला जाए. ऐसा होता तो अब्दुल हमीद अदम की तरह दोनों अध्यक्ष इस परिस्थिति को एक सुंदर मोड़ दे सकते थे कि “शायद मुझे निकाल के पछता रहे हों आप, महफिल में इस खयाल से फिर आ गया हूं मैं”. इसकी जगह ऐसा रवैया अपना गया कि जैसे बिल्ली के भाग से छींका टूटा. क्या अब संसद में कौन रहेगा, इसका फैसला मतदाता नहीं, संसद का बहुमत करेगा ? यह संविधान की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन है. यह तो नई ही स्थापना हो गई कि विपक्षविहीन संसद वैध भी है और हर तरह का निर्णय करने की अधिकारी भी है. फिर संसद की कैसी तस्वीर बनती है और संविधान का क्या मतलब रह जाता है ? इसका जवाब इस संसद के पास तो नहीं है.

(22.12.2023) 
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