ईशावास्योपनिषद्
यस्तु सर्वाणि भुताणि आत्मन्येवा अनुपश्यति।
सर्व भूतेषु च आत्मानम् ततो न विजुगुप्सते।। ६.
जो मनुष्य सभी जीवात्माओं को अपनी ही आत्मा में देखता है और सभी जीवात्माओं में अपनी आत्मा (सभी में परमात्मा)को देखता है, वह किसी से घृणा, द्वेष या नफरत नहीं करता।
प्रभाष परंपरा न्यास का यह आमंत्रण मेरी इज्जत बढ़ाने वाला है। मेरी लियाकत किस गज से मापी गई और किसने मापी, यह तो मेरे लिएरहस्य है, परंतु न्यास के पहले ही कार्यक्रम में स्व. डॉ. नामवर सिंह की बात से इशारा मिला कि प्रभाषजी के दो उद्देश्य में से एक ‘गांधी केप्रति उनकी निष्ठा’ का होना, मेरे आज यहां होने का कारण हो सकता है। वर्ना बकौल ग़ालिब, ‘मैक़दे की राह में मस्जिद भले वो थी, वर्नाहरेक पूछता हज़रत, यहां कहां?’ मैंने गांधीहाला चखी है और तब से ‘छूटती नहीं है ज़ालिम मुँह से लगी हुई’। अब नशा कितना है, यह तोगांधी ही बता सकता है, क्यों कि वो कब्र तो क्या तस्वीर से भी ही टोकता रहता है, सुनने योग्य कान चाहिए। विचार के इसी बहाव मेंव्याख्यान का शीर्षक बना। गुस्सा, बेबसी, तल्ख़ियाँ और दुराव बहुत हुए। अब तो कौमी संवादिता की मधुशाला का पुनर्निमाण ही हम सबकी नियति है। मनसा, वाचा, कर्मा अहिंसा में डूबे हुए प्रेमबल की हाला ही पीनी और पिलानी होगी। आज इसी मुद्दे पर कुछ बात रखनी है।
प्रभाषजी के बहुमुखी व्यक्तित्त्व, पेशेवर तेजस्विता, सामाजिक सरोकार और उनकी मुद्दों पर निर्भीक पैरोकारी के ‘कारे’ कागदों के बारे में इससभा में कुछ कहना हाथ कंगन को आरसी दिखाने सम होगा। इतना ही कहूंगा कि प्रभाष जी अपने विचार और लेखन में अकेले कहाँ थे?दुष्यंत के शेर हवाला दूं तो, ‘मुझमें रहते हैं करोडों लोग, चुप कैसे रहूँ, हर गज़ल अब सल्तनत के नाम बयान है’। अब सल्तनत चाहे किसी कीभी हो, प्रभाषजी तो वो ही करते जो वे करते रहे। बाबरी मस्जिद कांड़ के बाद इस देश की कौमी संवादिता की मधुशाला, जो बँटवारे के एकबाद इंट-दर-इंट फिर से बन रही थी, उसके अस्तित्व को ही खतरा पैदा हुआ। प्रभाषजी के भीतर के शंकर का तीसरा नेत्र खुला और ‘हिंदुहोने का धर्म’ प्रकाशित हुआ। प्रभाष जी के हिंदू होने के धर्म की भूमिका पर से ही मुझे लगा कि इस मुद्दे पर कुछ बात होनी चाहिए। गांधी नेकहा, “मैं सनातनी हिंदू हूँ”, और सारी ज़िन्दगी कौमी सद्भावना के हाला पीते रहे और पिलाते रहे। यह बात दीगर है कि इस हाला का नशासमाज पर इतना चढा कि कट्टर पंडित-मौलवी जमात की ख़फगीरी इस हद तक बढी कि एक ने हिंदुत्व पर मंडरा चुके कथाकथित खतरे कोदूर करने गांधीजी की हत्या कर दी।
कौमी की जगह सांप्रदायिक शब्द का इस्तेमाल कर सकता था, परंतु गांधीजी तो हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे। यह ज़बान वहसीखे भी तो दक्षिण आफ्रिका में तेलंगाना, बिहार, आंध्र, यू.पी., और गुजरातीओं के बीच रहकर ही। यह उनका शब्द है। गुजराती और हिंदीदोनों भाषाओं में उसने जब भी बोला और लिखा, कौम शब्द का ही प्रयोग किया। इखलास लफ़ज़ का भी प्रयोग हो सकता था, पर ख़ालिसउर्दू में तक़रीर करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। भाषण की भाषा आम हिंदुस्तानी समझे वैसी रहे तो यह प्रभाषजी को मेरी श्रद्धांजलीसमझूंगा।
जैसा सूझा है वैसा बोलूंगा। भवसागर के थपेडों में तैरते हुए पाई समझ और मजबूत हुई भावना के संयोजन से जो विवेक निकलता है उसी केसाथ श्री कृष्ण शरमं ममः करना है। मेरी समझ यह है कि वर्तमान में समाज कौमी बैर के संकट से गुज़र रहा है। सरकार, प्रशासन औरसमाज के एक हिस्से को हिंदु पुनरुत्थान और हिंदुत्व की पुनःस्थापना सहज लग रही है, और माहौल ये है कि जो हो रहा है वह सही है औरकभी से होना बाकी था। ऐसा करने के प्रयासों में कौमी मनमुटाव है ही नहीं, होना भी नहीं चाहिए, समस्या खडी की गई है, बाकी सब ठीकहै की आलबेल पुकारी जा रही है। यह मंत्र इस जनतंत्र में सोश्यल मीडिया पर जोरों से चलाया जा रहा हैं। पर हम जैसे भी आज के माहौलको अनदेखा कर दें तो शुतुर्मुर्ग वाली अवस्था होगी।

प्रभाष जोशी
आज हमारे समाज के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी है। सोशल मीडिया पर की कौमी नफरत की धारा तले सज्जन और संवेदनशील लोगभी उसकी असर में आ रहे हैं। झूठ, आधे सच और अफवाहों के ज़रिए समाज में अविश्वास और नफरत फैलाए जा रहे हैं। इसी वातावरण मेंमहात्मा गांधी को भी बेहिसाब कोसा जा रहा है, उनके चरित्र पर सवाल उठाए जा रहे हैं और उनके ऐतिहासिक योगदान को संदेह के घेरे मेंखड़ा किया जा रहा है। गोडसे यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानि… कहने वाले के अवतार स्वरूप चित्रित किए जा रहे हैं। पर यह तो अति है। गांधीजी से मतभेद हो सकते हैं, उनके विचारों पर बहस भी हो सकती है। ऐसे विश्व मानव का मूल्यांकन तथ्यों, तर्क और इतिहास के आधारपर होना चाहिए, न कि नफरत और गलत बयानी के आधार पर। गिरिराज किशोर का लिखा याद आता है। “गांधी को किसी देशभक्ति केतहत नहीं मारा गया था, उन्हें मारने का कारण मुसलमानों के प्रति घृणा थी। चूँकि गांधी मुसलमानों और हिंदुओं को समान नज़र से देखतेथे, इसलिए उन्हें मार डाला गया”। ऐसी घटनाएं दुनिया में एक अमिट छाप छोड जाती है।
ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रोंने,
लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।
सत्तासीन समूह का का दावा है कि इस खेल में वो कहीं नहीं है, वे तो चाहते हैं और कोशिश में है कि सभी साथ जियें, सबका विशवासचाहते हैं, सब का विकास चाहते हैं। गांधीजी की चिन्हित जगहों का नवोद्धार उदारता से हो रहा है। पर कोई सच कहने वाल सडक परनिकल पडता है तो दो कदम भी नहीं चलने देते, तुरंत उसे कम्युनिस्ट या वामपंथी बताकर डर-धमका देते हैं। मैं वामपंथियों का पक्षधर नहींहूँ, परंतु, सच बात कहने सुनने की निर्भयता और सहिष्णुता तो गांधी में विश्वास रखने वालों से अपेक्षित है। हिंदु संस्कृति का दावा करनेवाले हम कबीर को क्यों भूल जाते है,
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।
आज भीतियुक्त प्रीति का वातावरण है, प्रीतियुक्त भीति का नहीं। कई एक ऊंची शख्सियतों को मैं जानता हूँ, जो अपनी दबी ज़बान सेकहते-सुनते भी दायें बायें का जायजा ले लेते हैं। आज के हालात बयां करूं तो बकौल एक शायर,
खौफ का बादल बामे-हुनर तक छा गया,
अब की बारिश में ये सैलाब घर तक आ गया।
ज़हर फैला था कभी बूढी जडों के आसपास,
अब तो ये नीलापन बरगो-समर तक आ गया।
यह ऊंट किस करवट बैठेगा, कहा नहीं जा सकता। गुजरात की बात से शुरू करता हूँ। गुजरात की बात किसी पूर्वाग्रह को लेकर नहीं कररहा। जन्म के बाद से मेरा बचपन, किशोरावस्था, जवानी, और पूरी ज़िदगी गुजरात ही में गुज़री है। और प्रदेशों के बारे में कोई गहरीजानकारी नहीं रखता।
एक विमर्श यह कहता है कि गुजरात हिंदू कट्टरता की प्रयोगशाला रहा है। गुजरात का मॉडल ही देश भर में निर्यात हुआ है। इस बात में मुझे बहुत तथ्य नहीं लगता चूंकि, जो माहौल बना है वह कमोबेश देश के अधिकतर प्रदेशों में आगे-पीछे बना है। अकादमिक चर्चा अलग, गुजरातऐसा तो नहीं था। माता-पिता के दिये संस्कारों और घर के वातावरण में मां का की अहम् भूमिका ने अपनी जडों से कुछ हद तक जोड़ रखाहै। गुजरात की बात करूंगा तो यह व्यक्तव्य कुछ आत्मकथात्मक हो जायगा, पर अपने से कैसे छुटकारा पाउं? सार्वजनिक अभिव्यक्ति मेंनिजी अनुभूति तो रहेगी ही, आखिर आदमी के आदमी से रिश्तों की और व्यवहार की बात है। बकौल साहिर लुधियान्वी
दुनिया ने तज़ुरबात-ओ-हवादिस की शक्ल में,
जो कुछ दिया है, वो ही लौटा रहा हूँ मैं।
गुजरात ऐसा तो नहीं था
जब से मैंने होश संभाला, तब से पाया है कि समाज में समरसता है। एक मैसूर आयंगार के परिवार का धर्मभीरू युवा सिविल इंजिनीयर काडिप्लोमा लेकर देश के लिए कुछ योगदान देने अपना राज्य छोड़ सैंकडो मील दूर कांडला बंदरगाह पर नौकरी करने आ गया। वह अकेलानहीं था। उस जैसे कई थे। कराची बंदरगाह पाकिस्तान चला गया और पश्चिमी तट पर मुम्बई से पहले एक और बडे बंदरगाह की जरूरतमहसूस हुई और कांडला का निर्माण शुरू हुआ। 1964 तक सरकारी महकमा ही रहा, बाद में स्वायत्त ट्रस्ट बना, कांडला पोर्ट ट्रस्ट। चेअरमॅनतो सरकार ही नियुक्त करता रही है। बहरहाल, माहौल की बात कर लूँ। सरकारी कॉलोनियां दो थी। एक पोर्ट की और एक रेल्वे की, औरमानो पूरा हिंदुस्तान ही देख लो! लगता था कि सरकार भी इस बात की कायल थी कि नया हिंदुस्तान तो सभी मिलकर बनायेंगे। जांनिसारअख़तर का वो गीत, ‘आवाज दो हम एक हैं’ की पंक्तियां – उठ्ठो दखन की ओर से, गंग-ओ-जमन की ओर से, पंजाब के दिल से उठो, सतलुजके साहिल से उठो, बंगाल से गुजरात से, कश्मीर के बाग़ात से, नेफ़ा से राजस्थान से, कुल ख़ाक-ए-हिन्दोस्तान से, आवाज दो हम एक हैं, कीगूंज देशभर में थी। एक स्पष्टता और कर दूं, गुजराती और मद्रासी इतनी साफ हिंदी नहीं बोल सकते। इसका श्रेय मेरी माताजी को है, जो उसयुवा इंजनिीयर से ब्याह कर कांडला पहुंची थी । 1945 या ‘46 में राष्ट्रभाषा प्रचार समीति की परीक्षा में पास होने पर धन्यकुमार जैनअनुदित शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय की ‘षोडषी और निष्कृति’ ईनाम में मिली थी। अपने परिवेश, घर और माहौल से दूर तमिल-कन्नड़ बच्चों कीपढ़ाई किस माध्यम में हो, यह अहम सवाल उठा। माताजी ने फैसला लिया कि उनके बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ेंगे! अंग्रेज़ी माध्यम कोविचारपूर्वक छोडा। हम बच्चे उस माहौल में बडे हुए जहां न संस्कृत-प्रचूर हिंदी के दावेदार पंडित थे न ही अरबी-फारसी भरी उर्दु की हीहामी भरने वाले उलेमा। हिंदी ने हम बच्चों को हिंदुस्तानी बना दिया। गांधीवाली राष्ट्रीयता का नशा चढने लगा। हम भाव विभोर होकरप्रसाद की कविता का पाठ करते थे,
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयं प्रभा, समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती है।
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं, बढे चलो, बढे चलो।
और रेडियो में बजते आनंद बक्षी का गीत भी साथ गुनगुनाते थे,
हिमाला की बुलन्दी से सुनो आवाज़ है आई,
कहो माँओं से दें बेटे, कहो बहनों से दें भाई,
वतन पे जो फ़िदा होगा, अमर वो नौजवाँ होगा,
रहेगी जब तलक दुनिया, ये अफ़साना बयाँ होगा।
हमारे शिक्षकों का योगदान भी कम नहीं था। अधिकांश सिंधी थे। कांडला बंदरगाह आज के कच्छ जिले में पड़ता है। कांडला बंदरगाह केविकास का एक कारण और भी था। देश का बंटवारा हुआ और सिंध से हिंदु सिंधी बडी संख्या में कच्छ में आये और उनके पुनरवास औररोजगार के मसले भी हल करने थे। आज़ादी के सेनानी और सिंधीओं के नेता भाईप्रताप दयालदास नानवाणी ने एक नई बस्ती की योजनाबनाई, नेहरू उनके करीबी मित्र थे, और कच्छ के महाराव ने उदारता से 15,000 ज़मीन कांडला के आसपास दी। अक्तूबर 1947 में सरदारगंजनगर बना। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल के सम्मान में यह नाम रखा गया। बाद में 1949 के मध्य में गांधीजी के सम्मान में इसकानाम गांधीधाम हो गया।
कच्छ मुस्लिम बहुल जिला है। है। ध्यान रहे कि, विस्तृत हिंदुस्तान के सिंध और मुल्तान पर मोहम्मद-बिन-कासिम ने इ.स. 712 में ही हमलाकर कब्जा किया था। सिंध और मुलतान से आगे नहीं बढ़ पाया। मुस्लिम शासक आर्यावर्त में 13वीं शताब्दी में ही स्थायी हुए। कच्छ में1951 में 20-21 प्रतिशत मुसलमान थे, और आज भी कमोबेश वही अनुपात है। कच्छ की बोली-भाषा कच्छी है। जाति, धर्म जो हो सो,बोलचाल कच्छी ही है। कच्छ का रण और समुद्री किनारों पर व्यवसाय – व्यापार करने वाले अधिकतर मुसलमान हैं। सीमा पर रोटी-बेटीका व्यवहार तो छुप-छुपाकर आज भी चलता है, परंतु कांडला बंदरगाह में रोजी के लिए जो आबादी आई, उसमें मुसलमान निहायत ही कमथे। कारण बड़े पैमाने पर मुसलमानों में शिक्षा का अभाव। गांधीधाम संकुल में आज भी मुसलमानों की संख्या 5 प्रतिशत से अधिक नहीं है।बाकी शहरों में 20 से 30 प्रतिशत है। पर मुद्दा यह नहीं है।
सिंधी शिक्षकों के योगदान की बात कर रहा था। मुझे याद नहीं पडता कि किसी भी सिंध से आकर बसे शिक्षक ने अपनी किसी भी विषय कीक्लास में मुसलमानों की बदबोई की हो, या उन्हें कोसा हो, या उनके प्रति कोई वैरभाव जताया हो। ‘बीत गई सो बात गई’ वाली समझ हीहमें संस्कार में मिली। बाज़ार में आम लोगों की बातचीत में भी यह मुद्दा चर्चा में आता हो, याद नहीं पडता। सिंध की और सिंधियों कीअपनी खास पहचान थी। वहाँ के हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के जीवन में दोनों धर्मों की छाप देखी और महसूस की जाती थी। पंजाब औरसिंध प्रदेश (राजस्थान रण के बीच में होने से कुछ अलग पड़ गया) सदियों से मिश्र संस्कृति के हो गए थे। आज का पता नही है, गांधीधामको छोडे 50 साल हो रहे हैं, आना-जाना है, पर मिलना-जुलना, उठना-बैठना नहीं होता। जो याद है, वह कुछ बातें हैं। अचानक ठोकर लगनेपर हमारे मुँह से ओय राम, या ओ मां निकल जाता है, सिंधीओं के मुँह से अल्लां ही सुनने को मिलता था। कोसते समय सभी के मुंह से ‘लखलानत’ ही भेजी जाती थी। सिंधी में उर्दू शब्दों का इफरात से प्रयोग होता है। सिंधी भाषा अरबी-फारसी और संस्कृत के मिश्रण से ही बनीहै। ग़ुजराती में भी अरबी-फारसी के शब्द बहुत हैं। बचपन और किशोरावस्था तक, यह बात समझ में नहीं आयी थी, पर जब कौमी फसाददेखे, पढे और सुने, तब ये ख्याल आया कि कच्छ और सौराष्ट्र में हम इस संकीर्णता में क्यों नहीं फंसे। मरहूम पद्मश्री दादा दुःखायल मैत्रीमंडल न्यास के सदर थे, जो हमारी शाला चलाती थी। वे भूदान में हिस्सा लिये थे, जय जगत कहते थे, और हमें डफली बजाकर ‘जय जगत,जय जगत’ गीत गवाते थे। 50 प्रतिशत के करीब शिक्षक नियमित खादी पहनते थे। कुल मिलाकर यह कह सकता हूँ कि तब सिंध औरकच्छ-सौराष्ट्र की संस्कृति हिंदु-मुस्लिम की मिलीजुली संस्कृति थी। आर्यावर्त में जिसे गंगा–जमुनी तहज़ीब कहते हैं, वैसी कच्छी-सिंधी कीतहज़ीब थी।
शाखा नहीं लगती थी, ऐसा नहीं था कि हिंदुत्ववादी लोग थे ही नहीं। हमारी छोटी सी पोर्ट कॉलोनी में भी शाखा लगती थी, मैं गया भी,प्रभावित भी था, मातृभूमि को सदा वत्सले कहने का रोमांच भी होता था। पर पता नहीं क्यों पिताजी ने उसमें जाने से मुझे रोक दिया था।आम नागरिक थे वे, कोई राजनीति के जीव नहीं थे। पर कुल मिलाकर घरे-बाहिरे यही माहौल था। ये तब समाज-जीवन की मधुशाला थी।सद्भाव की हाला ही छनती थी।
बचपन से आज तक याद नहीं पड़ता कि कच्छ में कोई कौमी फसाद हुआ हो। हाँ, भूकंप के झटके जरूर लगे, एक 1956 में और एक 2001 में, जो आधिकांश लोगों की स्मृति होंगे। विभाजन के समय भी कच्छ में लूट और दंगे नहीं हुए, कहीं छुट्पुट घटनाएं हुई थी ऐसा कहते हैं,परंतु कुछ मुसलमान परिवार हिंदुस्तान से पाकिस्तान गये, और बडी संख्या में हिंदु सिंधी परिवार देश भर में आये। पर पंजाब के जैसे ‘ट्रेन टुपाकिस्तान’ नहीं हुआ और न हीं ‘गरम हवाएं’ चलीं। 1969 के गुजरात के भीषण दंगों के समय भी कच्छ की प्रजा शांत ही रही। 2002 मेंभी कच्छ में दंगे नहीं हुए, घटनाएं हुईं। हाँ, आज शहरी माहौल असरग्रस्त है। मेरे बचपन के बहुत सारे साथी अब हिंदुत्व के प्रभाव में हैं। वॉट्सेप ग्रुप में निंदा, गुस्सा, आवेश, और हिंदु संस्कृति की घनी स्तुति दिखाई पड़ती है। पूरे मुस्लिम कौम को आततायी और हिंदूओं कोशिकार बताया जाता है। हाँ, भारत को विश्वगुरु बताते वे सभी रील और पोस्ट भी बड़ी संख्या में लाईक और फॉरवर्ड किए जा रहे हैं।
गुजरात की बदलती राजनीति और हिंदुत्व का आविर्भाव
यह कहना और मान लेना कि आज ही कलियुग है, पहले तो सब सही ही था,भी सही नहीं होगा। यह देश सदियों से जातिवाद में डूबा हुआथा। वर्ण व्यवस्था ने जाति व्यवस्थास्था को जगह दे दी थी। और १२वीं सदी से मुसलमानों की हुकूमत भी फैलती गई। धर्मांतरण भी जोरों सेहुआ है। हिंदुओं में धर्म की कट्टरता जातिवाद में प्रकट होती है। ऊंची-नीची जाति और मुसलमान तबकों में भी कट्टरता थी ही। वर्ना कबीर कोयह क्यों कहना पडता,
काकर पाथर जोड कर मस्जिद दियो चिनाय,
ता चढी मुल्ला बांग दे क्या बहरो हुओ खुदाय।
और आगे कहा
पाहन पूजे हरि मिलें तो मैं पूजूं पहार,
याते या चाकी भली पीसी खाये संसार।
सदियों की इस जद्दोजहद में हिंदुस्तान जिया है, और किसी बाबत अपने को विश्वगुरू या उस्ताद कहना हों तो इतना तो कहा जा सकता हैकि हिंदुस्तान में मिली-जुली संस्कृति या गंगा-जमुनी तहज़ीब, जहाँ कट्टरता और जुनून को बार-बार पीछे हटना पडा है, और तेग-तलवारपर श्रद्धाभाव, प्रेम, श्रद्धा और इबादत हावी रहे हैं। इस सद्भाव और भाईचारे की हाल ही आम आदमी समाज की मधुशाला में पीता आयाहै। इस मदिरा को ढालने वाली साक़ी की भूमिका सूफी, संत और कवियों ने बखूबी निभाई। कबीर, संत रैदा, गुरु नानक, मलिक मोहम्मदजायसी, संत दादू दयाल, रहीम, मूलकदास, कबीर पुत्र कमाल और धर्मदास यह कुछ रोशन सितारे हैं, जिन्हें हिंदुस्तानी समाज जानता है।
इधर देश के सद्भाव की मधुशाला की साक़ी बदल गई है। साक़ी की जगह अब एक नहीं कई विषकन्याओं ने ले ली है। वे जो हाला ढाल रहीहैं, उसमें सद्भाव की हाला नहीं, बल्कि कट्टर कौमवाद का ज़हर घुला है। क्या हिंदुत्व वाले और क्या जुनुनी फिरकापरस्त, सब मिलकर आम आदमी के दिलो-दिमाग में ज़हर घोल रहे हैं। नशा तो अब भी है, पर मोहब्बत का नहीं, नफरत का है। यह कैसे हुआ? अंग्रेज़ों के आने सेपहले भी कौमी तनाव कमोबेश हर जगह थे। छुटपुट घटनायें होती रहती थी। संगीत में शोर नहीं था। साज़ और आवाज कई थे, साथ में हीबजते थे, पर संवादी सुर लगते थे। बेसुरे को मना लिया जाता था। इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि कौमी तनाव और फसाद1857 के गदर के बाद बढ़े। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति इसके लिए जवाबदार है और संगठित कौमी राजनीति के रूप मेंप्रकट हुई ऐसा बहुमती विद्वान मानते हैं। ब्रिटिश हुकुमत के दौरान गुजरात में कौमी हिंसा सीधे ब्रिटिश इलाके अहमदाबाद, सूरत, खेड़ा,पंचमहल और भरूच- धर्म आधारित अलग निर्वाचन, जनगणना द्वारा धार्मिक पहचान का वर्गीकरण, शहरीकरण, आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथाहिंदू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों के उदय ने सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाया। इसके विपरीत, बड़ौदा, भावनगर, जूनागढ़, कच्छऔर अन्य रियासतों में सख़्त प्रशासन, सीमित राजनीतिक गतिविधियों और स्थानीय सामाजिक समन्वय के कारण बड़े दंगे अपेक्षाकृत बहुतकम हुए।
गौर तलब है कि आज़ादी और विभाजन के समय गुजरात में पंजाब और बंगाल जैसी व्यापक कौमी हिंसा नहीं हुई, यद्यपि कुछ स्थानों परतनाव और छिटपुट घटनाएँ हुईं। 1969 के अहमदाबाद दंगे गुजरात के लिए एक निर्णायक मोड़ (वॉटरशेड) सिद्ध हुए, जिनमें सैकड़ों लोगमारे गए और हजारों विस्थापित हुए। याद रहे कि गांधी के ज़माने के लोग तब थे। जयप्रकाश नारायण और नारायण देसाई के नेतृत्व मेंशांति सेना और सर्वोदय के वरिष्ठ स्व्यंसेवक अहमदाबाद के गलियों में घूम कर मुहल्ल्ला समीति बना कर शांति स्थापित कर रहे थे। सरहदीगांधी खान अब्दुल गफ्फार खान गांधी शताब्दी के लिए आए, और अहमदाबाद की मुलाकात की, माकूल असर हुआ। स्थिति काबू में तोआई। पर दरारें पड गई। एक नया शब्द फलक पर उभरा, घेटोज़-बाडा। अहमदाबाद बाडों में बंट गया। 1985 के आरक्षण-विरोधी आंदोलनने भी बाद में सांप्रदायिक रूप धारण कर लिया। 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन में गुजरात के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।और 6 दिसंबर 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ, जो हिंस्तान में हिंदु-मुसलमनों के बीच खाई गहराने में निर्णायक मोड (वॉटरशेड) रहाहै। इसके बाद अहमदाबाद, सूरत और अन्य शहरों में दंगे हुए तथा दोनों समुदायों के बीच अविश्वास और सामाजिक अलगाव बढ़ा। सन्2002 में अति निंदनीय गोधरा कांड के बाद गुजरात ने अपने इतिहास की सबसे भीषण कौमी हिंसा देखी। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसारएक हजार से अधिक लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश मुसलमान थे, और एक लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए। इसी हिंसा के दौरानप्रसिद्ध उर्दू कवि और सूफी संत वली गुजराती की मजार भी ध्वस्त कर दी गई, जो सांस्कृतिक क्षति का प्रतीक बन गई। साबरमती आश्रम ट्रस्ट के तत्कालीन मंत्री जिस गांव के थे, उसी गांव के एक बाशिंदे संघ परिवार में ऊंचे पायदान पर थे। उन्होंने मंत्रीजी से कहा था, ‘हमनेदशकों तक मेहनत की है तब जाकर हिंदू सर उठा सका है। यह स्थिति आने वाले दशकों तक ऐसी ही रहेगी’। आश्रम के मंत्री हाल ही में गुज़र गये इसलिए इस बात की तस्दीक मुश्किल है। इतना ज़रूर है कि लोगों ने यह बात उन्हीं के मुँह से सुनी थी। बडी मार्मिक बात कह दीउन्होंने। और 2002 के दंगे तो इस दरार को गहरी खाई में ही बदल दिए। उसके बाद ज़ख्मों को मरहम लगाने की बजाय नमक छिडकनाशुरू हुआ जो अभी भी बेरोकटोक चल रहा है। याद रहे कि गुजरात में मुस्लिम आतंकी समूहों के हमलों की घटना तेज हुई।
गोधरा कांड और उसके बाद हुई हिंसा ने गुजरात देश के भी सामाजिक तानेबाने को तोडा, और इस हद तक कि, अब पैबंद लगाना भीमुश्किल मालूम होता है। गुजराती में कहूँ तो ‘आभ फाट्युंहोय त्यां थीगडुं न देवाय’ यानी, आसमान फट पड़ा हो तो पैबंद नहीं लगाते। मैंदक्षिण गुजरात के आदिवासी बहुल धरमपुर कसबे में रहता हूँ। गुजरात के आदिवासी इलाकों में कौमी हिंसा थी ही नहीं। परंतु, 1990 केबाद इन क्षेत्रों में कौमी जज़्बात बढे और ध्रुवीकरण शुरू हुआ और 2002 में पंचमहल, दाहोद तथा अन्य आदिवासी जिलों में पहली बार बड़ेपैमाने पर हिंसा देखी गई। आज मैं अपने आसपास के लोगों, और आदिवासी समुदायों की नज़र और जुबान पर नफरत महसूस करता हूँ।
क़ौमी नफरत की आग देश के कई भागो में
2002 के गुजरात के कौमी दंगे हिंदुस्तान के बँटवारे के बाद एक और निर्णायक मोड हैं। आम आदमी बंटवारे के ज़ख्म को भूलने लगा था। परगुजरात के दंगों ने एक बार फिर कई ज़ख्मों को हरा कर किया है। कौमी नफरत की आग गुजरात सहित अलग-अलग राज्यों में फैलती चलीगई है। नफरत भरे भाषणों, सोशल मीडिया प्रचार, धार्मिक ध्रुवीकरण, दंगे और चुनावी बयानबाजी जैसे अनेक रूपों तीव्रता से प्रकट हुईऔर हो रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कौमी बैर और नफरत अपेक्षाकृतअधिक दिखाई देता है। इन राज्यों में अलग-अलग समय पर दंगे, धार्मिक विवाद और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने सामाजिक संबंधों कोप्रभावित किया है। सामान्य तौर पर राजनीतिक हित, आर्थिक असुरक्षा, और अफवाहें कौमी नफरत की आग को हवा देते हैं परंतु 2002 केबाद संगठित नफरत ने माहौल बिगाडने में अहम भूमिका अदा की है। और यह कोशिश आज भी जारी है। सोशल मीडिया इसका सबसे तेजवाहक है। राजनीतिक हित और संगठित नफरत पर आसीन वैमनस्य रूपी चक्रवर्ती सम्राट का अश्वमेघ का घोडा पूरे आर्यावर्त में घूम रहा है। हर मस्जिद के नीचे मंदिर दिखाई देने लगे हैं और मस्जिद वाला उसे मस्जिद ही करार देने पर तुला हुआ है। घॄणा का यह बुलडोज़र संवादिता और इखलास की मधुशाला को कुचलता हुआ चल रहा है।
मज़हबी जुनून मुसलमानों में भी कम नहीं है। मज़हबी जुनून के दो उद्भव स्थल हैं। एक कुरान के अर्थघटन से, जहाँ खुदा एक ही है और किसीऔर की कोई पहचान नहीं है। इसलिए लोगों को खुदा के बंदे बनाना सवाब माना जाता है। दूसरा स्रोत सियासी सोच है, जो पाकिस्तान औरइस्लामी मुल्कों में जड़ जमाए है। ध्यान रहे कि गिने-चुने धर्म ही ऐसे रहे जिनमें धर्मगुरु और शासक एक ही व्यक्ति होते हैं। इस्लाम में आरंभमें यह प्रथा थी। खलीफा धर्मगुरु भी थे और हुक्मरान या बादशाह भी थे। इस परंपरा में कालांतर में जब बादशाहत धर्मगुरुओं से अलग हुई,तब भी अवाम पर मज़हब की पकड़ वैसी ही बनी रही। मौलवीओं के फतवे बादशाह को भी मजबूर करते थे। यह फर्क समझना इसलिएलाजिमी है कि मूल इस्लाम धर्म में ऐसी कोई कट्टरता की बाद नहीं है, और तलवार के ज़ोर पर इस्लाम कुबुल करवाना सवाब नहीं है।बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से दुनिया के कुछ क्षेत्रों में इस्लामी कट्टरवाद के बढ़ने के पीछे कई कारण रहे हैं—तानाशाही शासन, विदेशीदखल और खलल, लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय संघर्ष, आर्थिक असमानता, पहचान की राजनीति तथा कुछ धार्मिक और डिजिटलमाध्यमों से कट्टरपंथी विचारों का प्रसार। अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट, बोको हराम तथा तहरीक-ए-तालिबान, जैश-ए-मोहम्मद और लशक्र-ए- तैयबा, जैसे पाकिस्तान संगठनों ने आतंकवादी हिंसा को बढ़ावा दिया है, जिसके सबसे अधिक शिकार खुद मुसलमान और अन्यबेगुनाह नागरिक बने हैं। इन कट्टरवादी फिरकों ने हिंदुस्तान में भी अपने डैने फैला कर आम मुसलमान की नई पीढी में बेइंतहा ज़हर भरने का काम किया है और यह आज भी जारी है। ज़हर हर ओर से घोला जा रहा है और इसका शिकार नई पीढी है जो सद्भाव की हाला नहीं, नफरत की ज्वाला में धधक रहे हैं।
जो दुनिया में होता है उसका प्रभाव देश में होना स्वाभाविक है। भारत पर इस्लामी उग्रवाद का प्रभाव मुख्यतः सीमा-पार प्रायोजितआतंकवाद, विशेषकर जम्मू-कश्मीर में, तथा 2008 के मुंबई जैसे बड़े आतंकी हमलों के रूप में देखा गया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया केमाध्यम से कट्टरपंथी विचारों के प्रसार की चुनौती भी बढ़ी है, हालांकि वैश्विक जिहादी संगठनों से जुड़ने वाले भारतीयों की संख्या कई अन्यइस्लामी मुल्कों की बनिस्पत कम रही है। इस प्रकार के उग्रवाद ने कौमी अविश्वास और सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया है, जबकिहिंदुस्तान के ज़्यादातर मुसलमान लोकतांत्रिक मूल्यों और अमन प्रेमी और साथे जीने के कायल हैं। हाँ, एक बात समझ लेनी होगी कि, हिंदुधर्म में परमात्मा कई स्वरूपों में स्वीकृत है और आस्तिक और अनास्तिक सभी का समावेश हिंदु धर्म क्रता है। इतनी उदारता इस्लाम और ख्रीस्ती धर्म में नहीं है। दरअसल हिंदू धर्म को छोड़कर किसी और धर्म में इतनी उदारता नहीं है। इस स्थिति को समझना और इसमें सद्भावकी भावना को पैदा करना हथेली में सरसों उगाना है। फिर भी यह प्रयास करते रहना होगा। इन चुनौतियों के जवाब में हिंदुस्तान नेआतंकवाद-रोधी कानूनों, सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया तंत्र और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया है। माना तो यह भी गया है कि, सुरक्षाउपाय संविधान, नागरिक अधिकारों और इंसाफ के सिद्धांतों के अनुरूप हों तथा किसी पूरे समुदाय को संदेह की दृष्टि से न देखा जाए।
अपने समय में गांधीने हिंदुस्तानी समाज में रहे पारंपरिक संवादिता को समझा और उसी धुन के स्वरों को तेज कर नई जान फूंकी। हिंदस्वराज में गांधी ने लिखा, “‘मियाँ और महादेव की नहीं बनती’, इस कहावत को भी ऐसा ही समझिए। कुछ कहावतें हमेशा के लिए रह जाती हैं और नुक्सान करती ही रही हैं”। इससे पहले यह भी लिखते हैं, “एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते, अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि, वे एक राष्ट्र होने के लायक नहीं हैं। अगर हिंदु मानें कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होनाचाहिए, तो एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदु,मुसलमान, पारसी, ईसाई इस देश को अपना मान कर बस चुके हैं वे एक देशी हैं, एक मुल्की हैं, वे देशी भाई हैं और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थके लिए भी एक होकर रहना पडेगा। दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है। हिंदुस्तान में तो ऐसा था हीनहीं”।
सवाल यह उठता है कि वर्तमान माहौल के कारण क्या हैं और कौन जिम्मेदार है। सीधी भाषा में समझें तो मामला यह है कि आज जो लोगकांग्रेस पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” का आरोप लगाते हैं, वे कहते हैं कि शाह बानो मामला, हज सब्सिडी और मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे मुद्दों परकांग्रेस ने कुछ धार्मिक नेताओं के दबाव में फैसले लिए, जिससे यह संदेश गया कि सरकार मुसलमानों को विशेष रियायत दे रही है। यह भीमाना जाता है कि कांग्रेस पहले ही से हिंदू-मुसलमान के मुद्दे पर कमजोर रही है। अंग्रेज़ों की फूट की नीति और अंग्रेज जायें तो मुसलमान हीहुक्मरान बन सकते हैं, की मुसलमानों के एक वर्ग की सोच ने देश को बंटवारे के मुहाने लाकर खडा कर दिया। कहना न होगा कि बंटवारे केमुद्दे पर कॉंग्रेस कमजोर पड़ी और लोकमानस में दोनों ओर की उग्रवादी ताकतों ने ज़हर घोल दिया।बदले की भावना ने ज़ोर पकड़ा औरहावी हो गया। पर जुनून के कम होने पर संवादिता की ओर दोनों ओर की आम जनता बढ़ी। पर कट्टरता को आसरा और मदद देने परआमादा पाकिस्तान की हुकुमत ने इसे हिंदुस्तान के साथ कायमी दुश्मनी बना ली है। अब हिंदुस्तान का नज़रिया भी वैसा ही हो गया है।
इससे हिंदू समाज के एक हिस्से में नाराज़गी पैदा हुई और हिंदुत्व की सियासत को बल मिला। दूसरी तरफ अनेक इतिहासकार कहते हैं किमुसलमान शिक्षा, नौकरी और आर्थिक स्थिति में पीछे ही रहे, इसलिए उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिला है। उनके अनुसार, सरकार कीकोशिश अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों को बनाए रखने की थी। सच शायद इन दोनों के बीच है। कांग्रेस की कुछ नीतियोंने “तुष्टिकरण” की धारणा को जरूर जन्म दिया और कौमी नफरत को हवा दी, लेकिन भारत में कौमी जज़्बा सिर्फ उसी से पैदा नहीं हुआ।इसके पीछे अंग्रेजों की फूट डालो राजनीति, वोट-बैंक की राजनीति, धार्मिक ध्रुवीकरण, सामाजिक असुरक्षा और सभी दलों द्वारासमय-समय पर धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल जैसे कई कारण रहे हैं। इसलिए न तो सारी जिम्मेदारी केवल कांग्रेस पर डाली जा सकती है,और न यह कहा जा सकता है कि उसके फैसलों का कोई असर नहीं पड़ा।
विद्वान चाहे जिस नतीजे पर आयें या फिर बहस जारी ही रहे, पर आम आदमी, फिर चाहे वो मुसलमान हो या हिंदु, को जो घुट्टी पिलायीगई और समय-समय दुबारा-तिबारा पिलाई जा रही है, उसे वह पी चुका है। कुल मिलाकर आज बडी तादात में आम हिंदु-मुसलमान के प्रतिदुर्भाव रखने लगे हैं। आम मुसलमान के दिल में क्या है? आज यह जानना थोड़ा मुश्किल है। मेरे एक करीबी मित्र, जो दिन रात आमश्रद्धावान मुसलमानों से मेल-मुलाकात रखते हैं, से पूछा, तो उनका जवाब था ’आम मुसलमान चित्त हो गया है। उसने अपने आप को दोयमदर्जे का मान लिया है। जब तक सियासी हालात और सरगना नहीं बदलेंगे, इसमें कोई बदलाव आने की गुंजाइश उसे नहीं दिख रही है। मेरीसमझ से अगर सरगना बदल भी जायें तो बदलाव सत्ता के छोर से नहीं आने पायेगा। शासक नेतृत्व किसी भी पक्ष का हो, अमन कायम करनेकी बात करता है, और इसमें सबका साथ चाहता है। पर उनकी सियासी चालें देखें तो लगता हैं कि,
‘उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,
चाकू की पसलियों से गुजारिश तो देखिए|
दुनियाभर के इतिहासकार और विद्वतजनों के विचारों में कौमी हिंसा के प्रमुख कारण आर्थिक प्रतिस्पर्धा, धार्मिक पहचान पर आधारितराजनीतिक लामबंदी, प्रशासनिक विफलताएँ, बदले की ऐतिहासिक स्मृतियाँ और सामाजिक अलगाव रहे हैं। परंतु, गुज़रे सवा सौ सालों मेंगुजरात और देश की एक परंपरा गांधीजी की भी है, जो कौमी संवादिता, पारस्परिक सम्मान और साझा नागरिकता पर आधारित है।इसलिए हिंद्स्तान का इतिहास केवल दंगों का इतिहास नहीं, बल्कि शांति, सह-अस्तित्व और मेल-मिलाप के सतत प्रयासों का इतिहास भीहै। इसलिए यह मान लेना गलत होगा कि हिंदुस्तान के अधिकतर लोग सांप्रदायिक ही रहे हैं, क्योंकि हर जगह बड़ी संख्या में लोग शांति,सह-अस्तित्व और सद्भाव के पक्षधर हैं। उसी छोर से फिर से संवादिता की मधुशाला का निर्माण करना है।
कौमी संवादिता की मधुशाला
कौमी संवादिता की मधुशाला नये सिरे से फिर बनानी होगी। जो थी उस पर एक नज़र तो डालनी होगी, क्यों कि उस मधुशाला के हाली तोअब भी बहुमती में है, सिर्फ पंडित और मुल्लों का डर दूर करना है। क्यों कि इखलास की इस मधुशाला में
मुसलमान और हिंदु है दो, एक मगर उनका प्याला,
एक मगर उनकी मदिरालय, एक मगर उनकी हाला;
दोनों रहते एक न जब तक, मस्जिद-मंदिर में जाते,
बैर बढाते मस्जिद – मंदिर, मेल कराती मधुशाला!
मानसिक हिम्मत और खरी-खरी सुनाने का जज़्बा नये सिरे से पैदा करना है। रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक़उल्लाँ खाँ, गणेश शंकरविद्यार्थी, वसंत-रजब और ऐसे ही कई मिसालों को हिंदुस्तान के कैनवास पर फिर से उकेरना है। हाल ही में दिल्ली के 2020 के दंगों मेंप्रेमकुमार बघेल और हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल के शहादत का खून अभी सुखा नही है। और इन सब के सिरमौर गांधी को फिर वापस लानाहै इस भावना से कि, शायद उन्हें निकाल कर पछता रहें हैं हम। हिंदुस्तान का इतिहास सदियों से इस बात का गवाह है कि हम पहले से हीएकरूप नहीं, विविध रूप हैं। दिनकर के ‘संस्कृति के चार अध्याय’ का हवाला दूं तो,
‘वैज्ञानिक बताते हैं कि हम सभी हिन्दुस्तानीओं के खून में काकेशियन, मंगोल और इथोपिअन इन तीनों मुख्य प्रकार के मानव जाति के केगुण हैं। नीग्रो, औस्ट्रिक, द्रविड, आर्य, युनानी, यूचि, शक, आभीर, हूण, मंगोल, तुर्क इन सभी वर्ग के लोग अलग-अलग समय पर भारत वर्षमें दाखिल हुए और यहीं के होकर रह गये जिसे हम हिंदू संस्कृति कहते हैं। एक जाति का परिणाम नहीं है, इन सभी जातियों का मिश्रण है।इस देश की संस्कृति का स्वरूप सामासिक है। विविधता इसलिए आई है कि यह बहुत अलग-अलग असरों से बना है। भाषायें मुख्य व गौण – तामिल, कन्नड, तेलगु, मळयाळम ये द्रविड भाषायें है जिन्में संस्कृत भली भांति मिश्रित हो चुकी है और उसी तरह बंगला, मराठी, गुजराती,उडिया,पंजाबी, असमी, गुरुखाली और कश्मीरी आर्य भाषायें है और संस्कृत परंपरा से ही आती है। ये तो हुई मुख्य भाषायें जिन्हें देश केसंविधान में स्वतंत्र भाषाओं का दर्जा मिला है। पर इसके अलावा और कई भाषाएँ और सैकड़ों बोलियाँ हैं।
इन हकीकतों के हवाले से कोई आर्यावर्त की शुद्धिकरण और ‘घर वापसी’ की बात कैसे कर सकता है? अगर करता है तो ‘अयं निजः परो वेतिगणना लघु चेतसाम्’ होगी। गांधीजी तो ‘उदार चरितानां वसुधैव कुटुंबकम् वाले बंदे थे। गांधीजी के लिए कौमी इखलास केवल एकराजनीतिक ज़रूरत नहीं थी, बल्कि भारत के नैतिक जीवन की नींव का पत्थर थी। उनका नज़रिया सत्य, अहिंसा और सर्वधर्म समभाव केसिद्धांतों पर टिका था। उनका विश्वास था कि कोई भी धर्म सत्य पर एकाधिकार नहीं रखता और सभी धर्म मनुष्य को नैतिक एवंआध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने वाले अलग-अलग रास्ते हैं। ऐसा इसलिए है कि धर्म इंसान ने बनाया है और वह हमेशा ही अपूर्ण है, तो कोई भी धर्म पूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए धर्म के नाम पर हिंसा, घृणा या भेदभाव धर्म की मूल भावना के विरुद्ध है। गांधीजी ने धर्म केआधार पर राष्ट्र की अवधारणा को नकारते हुए कहा था कि भारत उन सभी लोगों का समान देश है जो इसकी साझी सभ्यता, इतिहास औरभविष्य में विश्वास रखते हैं। उनके लिए राष्ट्रीय एकता का आधार धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि साझा जीवन, पारस्परिक सम्मान और समाननागरिकता थी। दिनकर की किताब ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रस्तावना में नेहरू की आवाज भी कुछ ऐसी है।
भारत के इतिहास में हम दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंद्वी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है जो बाहरी उपकरणों कोपचाकर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है, और दूसरी वह जो विभाजन को प्रोत्साहित करती है, जो एक बात कोदूसरी से अलग करने की प्रवृत्ति को बढाती है। इसी समस्या का एक भिन्न प्रसंग में, हम आज भी उसका मुकाबला कर रहे हैं। आज भीकितनी ही बलिष्ठ शक्तियां है जो केवल राजनैतिक ही नही, सांस्कृतिक एकता के लिये भी प्रयास कर रहीं हैं। लेकिन ऐसी ताकतें भी है जोजीवन में विच्छेद डालती है, जो मनुष्य मनुष्य के बीच भेदभाव को बढावा देती हैं।
उससे आधी सदी पहले ऐसा ही कुछ स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था।
धार्मिक एकता के समान आधार के विषय में बहुत कुछ कहा जा चुका है। इस समय मैं अपनी कोई स्वतंत्र व्याख्या प्रस्तुत करने का साहसनहीं करूँगा। परंतु यदि यहाँ उपस्थित कोई व्यक्ति यह आशा करता है कि धार्मिक एकता किसी एक धर्म की विजय और अन्य सभी धर्मों केविनाश से स्थापित होगी, तो मैं उससे केवल इतना कहूँगा—”भाई, तुम्हारी यह आशा कभी पूरी नहीं हो सकती।”
स्वामी विवेकानंद, गांधीजे और नेहरू का में लिखा आज भी प्रस्तुत है। एकता के लिए संघर्ष करने वाली ताकतें आज खो गई मालूम होती हैं।गांधीजी ने हिंदू–मुस्लिम एकता तथा सभी धार्मिक समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग को भारत की आजादी और स्थाई शांति के लिएज़रूरी माना। उनका मानना था कि केवल राजनीतिक समझौते या नेताओं के बीच हुए समझौते कौमी सद्भाव स्थापित नहीं कर सकते;इसके लिए समाज में आपसी विश्वास, मित्रता और सद्भाव का विकास आवश्यक है। खिलाफत आंदोलन से लेकर 1920 के दशक केसांप्रदायिक दंगों और विभाजन की त्रासदी तक, गांधीजी ने निरंतर संवाद, आत्मसंयम, उपवास, सेवा और नैतिक साहस के ज़रिए समुदायोंके बीच विश्वास पुनः स्थापित करने की निरंतर कोशिश की। उनके रचनात्मक कार्यक्रम में कौमी एकता का अर्थ विभिन्न धर्मों के अनुयायियोंके बीच अटूट दिली दोस्ती थी।
कौमी संवादिता को मजबूत बनाने के लिए गांधीजी ने विभिन्न धर्मों के बीच बातचीत, एक-दूसरे की धार्मिक परंपराओं के अध्ययन, गरीबोंकी संयुक्त सेवा, संयमित एवं सम्मानजनक सार्वजनिक भाषा तथा समाज को जोड़ने वाले नैतिक नेतृत्व पर विशेष बल दिया। आज जबहिंदुस्तान मज़हबी लामबंदी, सोशल मीडिया के ज़रिए फैलने वाली अफवाहें , पहचान-आधारित राजनीति और सामाजिक विभाजन जैसीचुनौतियों का सामना कर रहा है, तब गांधीजी का यह दृष्टिकोण और भी प्रासंगिक हो उठता है। उनका विचार हमें यह याद कराता है किलोकतांत्रिक समाज की स्थिरता और राष्ट्रीय एकता केवल कानूनों से नहीं, बल्कि एक दूसरे की इज़्जत, सहानुभूति, अहिंसा और भाईचारे कीजीती जागती संस्कृति से ही तय हो सकती है।
1917 के यंग इंडिया के एक लेख में गांधीजी ने हिंदुस्तान ले बारे में लिखा, “वह उन संस्कृतियों का पोषक है, जो इस देश में टिक गयी हैं,जिन्होंने हिंदुस्तानी जीवन पर असर किया है और जो खुद भी इस सरज़मी के माहौल में घुल गया हैं। जैसा कि कुदरती है वह एका देशीतरीके या कहें तासीर के मुताबिक होगा, माने, उसमें हर संस्कृति को अपनी उचित जगह मिलेगी। वह अमरीकी ढंग का नहीं होगा, जिसमेंकोई एक प्रमुख संस्कृति बाकी सबको पचा डालती है और जिसका उद्देश्य मेल करना और करवाना नहीं, बल्कि बनावटी और जबरदस्तीलादी जानेवाली एकता निर्माण करना है”।
गांधी नादान नहीं थे। इस्लाम और ख्रिस्ती ध्रम की समझ गहरी रखते थे और ये भी जानते थे कि इन धर्मों के ठेकेदार भी अपने अपने धर्म काप्रचार प्रसार झूठ और अनीति से भी करते हैं। 1916 ही में मद्रास में ख्रिस्ती मिशनरीओं को संभोधित करते हुए इस मतलब का कहा था किआप पिछडे और गरीब तबकों में शिक्षा और आरोग्य का काम इतनी शिद्दत से कर रहें हैं कि इससे अच्छी मानव सेवा और अपने धर्म कीसेवा क्या हो सकती है? फिर आपको धर्मांतरण करने की ज़रूरत क्या है?
महात्मा गांधी के लिए कौमी सद्भाव केवल दंगों की गैरहाजरी नहीं था। वह अलग-अलग समुदायों के बीच विश्वास, मैत्री, साझी नागरिकताऔर नैतिक उत्तरदायित्व की स्थापना का कार्यक्रम था। उन्होंने स्वतंत्र भारत का स्वप्न ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा जिसमें प्रत्येक व्यक्ति, चाहेउसका धर्म कोई भी हो, समान सम्मान और सुरक्षा का अनुभव करे। आज भी भारत के लोकतांत्रिक और बहुलतावादी चरित्र की रक्षा केलिए गांधीजी का यह पैगाम बहुत ज़रूरी है। “मज़हब इंसानों को जोड़ने के लिए है, तोड़ने के लिए नहीं।” और राज्य की जवाबदारी है किवह धर्म, जाति या समुदाय से ऊपर उठकर हर नागरिक को समान अधिकार, समान इज्जत और निष्पक्ष इंसाफ की गारंटी दे तथा हिंसा,घृणा और भेदभाव के विरुद्ध कानून का समान रूप से पालन तय करे। साथ ही, शिक्षा, संस्कृति और संवाद के संस्थागत मंचों के माध्यम सेसाझा नागरिकता, साझी विरासत और सभी समुदायों के बीच विश्वास, सहयोग और कौमी सद्भाव को निरंतर मजबूत करे। राज्य को किसीभी समुदाय को शक की नज़र से नहीं देखना चाहिए और नागरिकता या धर्म के सवालों को डर, भेदभाव या राजनीतिक ध्रुवीकरण कासाधन नहीं बनाना चाहिए। नागरिकता से जुड़ी किसी भी प्रक्रिया में सभी नागरिकों के अधिकारों, गरिमा और इंसाफ की रक्षा तय होनीचाहिए, ताकि किसी भी तबके में असुरक्षा या अविश्वास न फैले। साथ ही, राज्य को असहमति का सम्मान करते हुए संयमित और समावेशीभाषा का प्रयोग करना चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक संवाद और कौमी सद्भाव मजबूत हो।
प्रभाष जोशी उसी गांधी परंपरा के थे। बाबरी मस्जिद ढह गई और उनकी अंदर की आग भभक उठी।”हिन्दू होने का अर्थ यदि मनुष्य होने कीक्षमता को विस्तृत करना है, तो कौमी संवादिता उसका स्वाभाविक परिणाम है। अपने धर्म से प्रेम और दूसरे के धर्म का सम्मान—यहीभारतीयता की असली पहचान है।” यह निष्कर्ष प्रभाष जोशी के गांधीवादी, बहुलतावादी और संवादपरक सोच का सार पेश करता है, बिनाउनके विचारों को किसी संकीर्ण राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सीमित किए।
हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला में मधुशाला वह जगह है जहाँ जाति, फिरके, ऊँच-नीच और संकीर्ण पहचानें पीछे छूट जाती हैं। वहाँ इंसानपहले इंसान है। यदि इस रूपक को आज के भारत में उतारें तो “कौमी संवादिता की मधुशाला” वह सार्वजनिक जीवन है जहाँ हिन्दू,मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और अन्य सभी समुदाय अपने-अपने सच और अक़ीदत के साथ आते हैं, पर संवाद एक साझाइंसानी ज़मीन पर करते हैं। यहीं “मधुशाला” का रूपक सार्थक हो उठता है। मधुशाला में कोई अपनी पहचान खोता नहीं, बल्कि अपनीपहचान के साथ दूसरे की पहचान का सम्मान करना सीखता है। संवाद का अर्थ एकरूपता नहीं, बल्कि भिन्नताओं के साथ जीने की कला है।हिंदुस्तान की तहज़ीब इसी कलाकारी का नाम है।
गांधी ने कहा था कि वे चाहते हैं कि उनके घर की खिड़कियाँ सब दिशाओं से आने वाली हवाओं के लिए खुली रहें, पर वे किसी हवा से अपनेपाँव उखड़ने नहीं देंगे। यदि धर्म मनुष्य को अहंकारी, हिंसक या नफरती बना दे तो वह धर्म नहीं, उसकी विकृति है। इसलिए “कौमीसंवादिता की मधुशाला” केवल एक काव्यात्मक शीर्षक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का नैतिक स्वप्न है। यहाँ धर्म प्रतिस्पर्धा का नहीं,करुणा का विषय है; पहचान टकराव का नहीं, परिचय का माध्यम है; और राष्ट्र किसी एक समुदाय का नहीं, उन सबका है जो इस भूमि कीसाझी नियति और सबै भूमि गोपाल की में विश्वास रखते हैं। बच्चन की कालजयी कविता में में मधुशाला, ‘प्याला’, और ‘हाला’ प्रतीक हैं उससाझा मानवीय संस्कृति के, जिसमें धर्म, जाति और संप्रदाय की दीवारें अर्थहीन हो जाती हैं। जिस प्रकार मधुशाला में सभी भेद मिटाकर एकसाथ बैठने का आमंत्रण है, उसी प्रकार गांधीजी का ‘सर्वधर्म समभाव’ भी मनुष्यों के बीच प्रेम, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान कीस्थापना का आह्वान करता है।
आज हम क्या करें?
कौमी संवादिता एक-दूसरे के दुख-सुख में हिस्सेदार बनने, सम्मानपूर्वक असहमति रखने और साझा सार्वजनिक जीवन बनाने की कला है।गांधीजी का “सर्वधर्म समभाव” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” आज भी भारत को आगे बढ़ाने का सबसे विश्वसनीय मार्ग दिखाते हैं। सबसे पहलेमाहौल बनाना है। कुछ पुरानी हाला और कुछ नई मिलानी होगी। मेलजोल बढ़ाना होगा। फिरका परस्त, कट्टर लोग और संस्थाओं कोखरी-खरी सुनानी होगी। जो गलत है उसे जाहिर में बिना किसी हिचकिचाहट के हर धर्म के ठेकेदारों से कहने की जुर्रत, हिंमत और ताकतपैदा करनी होगी। वोट बॅंक की राजनीति के खिलाफ पार्टीओं के सामने मोर्चा लगाना होगा। लोक जागृति और लोकतालीम से बेहतर कोईउपाय नहीं है। हर जिले और हर गांव में कौमी संवादिता के सुर लगाने होंगे। हम कहानी-किस्से जहाँ हैं, वहाँ से ही साझा करने लगे। हम सब सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल सीखना और सिखाना शुरू करें। नफरत के पैगाम को रोक दें। पूरा भी न पढ़ें। डिलीट, डिलीट औरडिलीट, नफरत के हर पैगाम का यही हश्र करें।
आज जब समाज में सांप्रदायिक कटुता और परस्पर अविश्वास बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। फिर कहता हूँ, क्या हिंदु क्या मुसलमान, और क्याईसाई, सभी इसमें हिस्सेदार हैं। तब गांधीजी की सद्भावना और बच्चन जी की मधुशाला का यह संदेश और अधिक प्रासंगिक हो उठता है किभारत की शक्ति विभाजन में नहीं, बल्कि विविधताओं को साथ लेकर चलने में है। सच्ची राष्ट्रभक्ति वही है जो धर्म और जाति के भेद भूलकरमनुष्यता के इस विशाल मधुशाला में सबको साथ बैठने का अवसर दे। यह मधुशाला व्यक्ति के बाहर-भीतर दोनों है। गांधी खुद और दुनियादोनों को अहमियत देता है, पर कहता है बदलाव अपने से शुरू करो, चूंकि जैसे हम हैं, वैसा ही जहाँ बनाएंगे।
जितनी दिल की गहराई हो, उतना गहरा है प्याला; जितनी दिल की मादकता हो, उतनी मादक है हाला;
जितनी उर की भावुकता हो, उतना सुंदर साक़ी है; जितना ही जो रसिक, उसे है, उतनी रसमय मधुशाला।
हिंदु धर्म की यह प्रार्थना समस्त का भला चाहती है।
सर्वे भवंतु सुंखिनः
सर्वे संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु,
मा कश्चिद दुखः भग्भवेत।
ओइम शांति, शांति, शांतिः।
धन्यवाद।
[1] प्रभाष जोशी न्यास के तत्वाधान में १२ जुलाई २०२६ को दिया गया वक्तव्य।
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