
कुमार प्रशांत
26 अप्रैल 2026 को जब रघु राय ने अपने कैमरे का शटर दबाया होगा, तब उन्हें इल्म हुआ होगा कि उनका कैमरा बंद हो गया है. अब वह न कभी खुलेगा, न कभी बोलेगा !
उनका कैमरा बोलता था. रघु राय के कैमरे में व दूसरों के कैमरे में यही फर्क था. दूसरों का कैमरा बोलता नहीं था, देखता था; रघु राय का कैमरा गूंगा होने को तैयार नहीं था. वह बोलता था. महान कनाडियन कैमराकार यूसुफ कार्श का कैमरा नहीं बोलता था, उनके पोट्रेट बोलते थे. उनके पोट्रेट के पात्रों की आंतरिक विशेषताओं को उनका कैमरा जैसे छू लेता था. वह कहता कुछ नहीं था, हमारे सामने उस व्यक्ति को खड़ा कर देता था.
मैंने ऐसा ही कुछ पहली बार पटना की उस मित्र-मंडली में कहा था जिसमें रघु राय भी मौजूद थे. चेहरे पर सदा खिली रहने वाली आत्मीय मुस्कान के साथ वे मुझे सुन रहे थे : रघु राय के फोटोग्राफ्स बोलते हैं इसलिए हमें उनके पास ठहरना पड़ता है ताकि उन्हें सुन सकें; रघु राय के फोटोग्राफ्स दौड़ते हैं इसलिए हमें उनके साथ तेज दौड़ लगानी पड़ती है ताकि कहीं पीछे न छूट जाएं ! मुझे कई बार लगा है कि उनके फोटोग्राफ्स की एक श्रृंखला देखते-देखते सांस फूलने लगती है.

रघु राय
मैं आज कहना चाहता हूं कि रघु राय हमारे दौर के सबसे तेज रफ्तार कैमराकार थे जो गति, शब्द व चित्र, तीनों का अप्रतिम संतुलन साध पाते थे. मैं यह आज इसलिए कहना चाहता हूं, क्योंकि रघु राय अब नहीं हैं. अब वह आंख नहीं है जो कैमरे से जुड़ कर वह संसार उजागर कर जाती थी जिसे देखते हुए भी हम देख नहीं पाते थे. उनकी आंखों में कैमरा लगा था और उस कैमरे में महाभारतवाले संजय की आंख लगी थी. कई लोग कहते रहे, उनकी विदाई-लेखों में भी लिखा जा रहा है कि वे आलादर्जे के न्यूज-फोटोग्राफर थे. रघु राय के परिचय में जब ऐसा कहा जाता है तब मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई जवाहरलाल नेहरू के परिचय में कहे कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री थे. यह परिचय सच है लेकिन जवाहरलालजी का इससे बौना परिचय दूसरा हो नहीं सकता है. वे बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ भारत के प्रधानमंत्री भी थे. रघु राय बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ न्यूज-फोटोग्राफर भी थे.
हम बहुत कम समय तक एक-दूसरे को जानते रहे. फिर एकदम अलग हो गए. फिर इधर के दिनों में, जब मैं दिल्ली आया तो फिर कुछ मिलना हुआ. इसलिए निजता का मेरा कोई दावा नहीं है. लेकिन 1974 से जो शुरू हुई, वह सौहार्दपूर्ण पहचान बनी रही. मैंने उनसे भी कहा था और आज भी उसे दोहराता हूं कि रघु राय के कैमरे को 1974-77 के दौर में वह संस्कार मिला जिसने उन्हें फोटोग्राफर से कहीं आगे खड़ा कर दिया. अपना कैमरा ले कर जब रघु राय जयप्रकाश नारायण व उनके आंदोलन के क़रीब पहुंचे तब उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि उनका कैमरा यहां से अपना चरित्र बदलने वाला है. मुझे पता नहीं है कि रघु राय 1974 से पहले जयप्रकाश से परिचित थे य़ा नहीं. कभी पूछा नहीं, कभी `ऐसी बात निकली नहीं. लेकिन सिताबदियारा की वह रात मुझे खूब याद है जब दिन भर की तूफानी सभाओं व सार्वजनिक जयकारों-हाहाकारों से निकल कर हम देर शाम जयप्रकाश के पैतृक गांव सिताबदियारा पहुंचे थे.
अपना वह गांव और अपना वह खपड़ैल मकान जयप्रकाश को बहुत प्यारा था. उसकी उष्मा में वे विभोर हो कर रहते थे – चाहे जितना रह सकें ! उस शाम बेहद थके होने के बाद भी वे वैसे ही मगन-मन थे. वहां जगह भी कम थी, सुविधाएं तो और भी कम; और उसमें औचक आ पहुंचे 10-15 शहरी मेहमान ! सबकी व्यवस्था थी. सबको उनकी जगह पहुंचा कर, खाना आदि करवा कर थोड़ी राहत मिली. जयप्रकाश भी थकान आदि से निबट कर थोड़े स्थिर हुए तो सब मेहमानों की व्यवस्था आदि की जानकारी ली. बिस्तर, मच्छरदानी, पीने का पानी, बाथरूम सब पूछा : ‘इनमें से कुछ होंगे जिन्हें सोने से पहले चाय-कॉपी की जरूरत होती होगी. वह सब पूछा न ?’ पूछा तो था लेकिन बहुत आग्रह से नहीं, इसलिए जवाब में थोड़ा संशय था…रात भी ज्यादा हो रही है, सोने वाले सो भी गए होंगे… व्यवस्थापकों का जवाब पूरा भी नहीं हुआ था कि जयप्रकाश बिस्तर से नीचे उतरे और बोले : ‘ चले, जरा देख लूं !’
मेहमानों में संकोच भरी खलबली हुई. इतनी रात गए, थके जयप्रकाश एक-एक के बिस्तरे तक पहुंचे, बड़ी आत्मीयता से जो पूछना-बताना था, वह सब किया- यहां सुविधाएं कम हैं, परेशानी होगी आपको, सुबह कितने बजे उठते हैं, नहाने का गर्म पानी यहां मिल जाएगा, चाय कितने बजे लेंगे, चाय के साथ क्या लेंगे… मैं देख रहा था कि रघु राय सिकुड़ते जा रहे थे. जिसके पीछे कैमरा ले कर वे सुबह से भाग रहे थे, वह अब उनके कैमरे की जद से बाहर, उनके सामने खड़ा था, और उन्हें अपने कैमरे में बंद कर रहा था.
“आपने रोका क्यों नहीं… दिन भर मैंने इस बूढ़े आदमी को जवानों को मात देने वाली एनर्जी से काम करते देखा है… अब हमारी बेहूदा-सी जरूरतों की चिंता में…”रघु राय को सूझ नहीं रहा था कि वे कैसे, क्या कहें… शब्द बता नहीं पा रहे थे कि वे कैसा महसूस कर रहे थे… फिर हम देर रात तक सिताबदियारा के कच्चे रास्तों पर हल्के कदमों व दबी आवाज में बात करते घूमते रहे … वे एक इवेंट कवर करने आए थे, और यहां मिला उन्हें एक ऐसा व्यक्ति जो इतिहास समेटता हुआ, इतिहास बदल रहा था… आप देखिए न, न यह कैमरा मेरा बनाया है, न मेरे कैमरे के सामने जो घट रहा है वह मेरा रचा है… सब मुझे बना-बनाया मिला है. मैं कर तो इतना ही रहा हूं न कि शटर दबा रहा हूं… रघु राय कुछ और कहते कि मैंने टोका : शटर तो मैं भी दबा सकता हूं लेकिन उसमें से रघु राय का फोटो बनेगा नहीं, क्योंकि कहां, कब व कैसे शटर दबाना है यह न मशीन को मालूम है, न मशीन के सामने घटती घटनाओं को… यह तो रघु राय को ही पता है… कला व कलाकार के बीच का यह रिश्ता ही अंतिम सत्य है… ऐसी कितनी ही बातें उस रात हुईं… जयप्रकाश कर क्या रहे हैं, लोकतंत्र के विकास में इस आंदोलन का रोल क्या है, दमन के सामने बहादुरी से खड़े इन नौजवानों की प्रेरणा क्या है जैसी कितनी ही बातें हम कर गए… रघु राय तब अपने फोटो का नया एंगल खोज रहे थे. जिसे हम न्यूज-फोटोग्राफी कह कर निकल जाते हैं और जो न्यूज़ के साथ ही दम तोड़ जाती है, रघु राय उसके पार जाते थे क्योंकि वे क्षण को नहीं, वक्त को दर्ज करने वाले कैमराकार थे.
बिहार आंदोलन में गति व उमंग का विस्फोट हुआ था. रघु राय उसे पकड़ सके थे, क्योंकि वे उसे समझ सके थे. उनका कैमरा साक्षी-भाव नहीं रखता था, वह भागीदार बन सका था. बिहार आंदोलन के उनके फोटो का संकलन ‘बिहार शोज़ द वे’ आप देखें तो समझ सकेंगे कि वे लिखे शब्दों व विवरणों को व्यर्थ-सा बना देते हैं, क्योंकि वे सारे फोटोग्राफ्स बोलते भी हैं, भागते भी हैं. लेकिन आपको एकदम अलग रघु राय मिलते हैं जब आप मदर टेरेसा के पास उन्हें देखते हैं. उनका कैमरा वहां ध्यान करता मिलता है : नि:शब्द प्रार्थना ! रूपाकार नहीं, करुणा ही आकार ले लेती है. संगीतकारों की उनकी श्रृंखला मुझे इसलिए बहुत प्रिय है कि कैमरे को उस तरह गाते कभी सुना नहीं था. इंदिरा गांधी का उनका अलबम एकदम अलग भाषा में बोलता है – सत्ता की धमक-चमक व आतंक का रस वहां हर ओर बिखरा मिलता है.
वह सारा कुछ जो काल की हथेली पर उन्होंने बिखरा रखा था, अब सिमट चुका है. उसमें कुछ नया जोड़ने वाली आंख नहीं रही. कैमरा भी है, विषय भी हैं लेकिन रघु राय नहीं हैं.
वह वादा भी अब कभी पूरा नहीं होगा जो जयपुर में गांधी-वाटिका बनाते समय उन्होंने मुझसे किया था : कुमार, आपकी गांधी-वाटिका के लिए मैंने कुछ अलग सोच रखा है… मैं वह आपको दूंगा…
वह वाटिका भी अब श्रीहीन हो चुकी है …
(28.04.2026)
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