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सनातन धर्म का कोढ़ है जाति प्रथा

राम पुनियानी|Opinion - Opinion|8 September 2023

राम पुनियानी

हिन्दू धर्म का कोई पैगम्बर नहीं है और ना ही उसकी कोई एक किताब है. यहां तक कि ‘हिन्दू’ शब्द का इस्तेमाल हिन्दू धर्मग्रंथों में कहीं नहीं किया गया है. यही कारण है कि विभिन्न टीकाकारों और सुधारकों ने हिन्दू धर्म और उसके सिद्धांतों की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की है. यहां तक कि कुछ लोग इसे धर्म न बताते हुए जीवन पद्धति की संज्ञा देते हैं. सच यह है कि हिन्दू धर्म कई विविध और कुछ मामलों में विरोधाभासी सिद्धांतों का मिश्रण है, जिन्हें मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है – ब्राम्हणवादी (जिसका आधार हैं वेद, मनुस्मृति और जातिगत व लैंगिक पदक्रम) और श्रमण (नाथ, तंत्र, भक्ति, शैव व सिद्धांत परंपराएं).

सनातन धर्म से आशय है कोई ऐसा धर्म जो शाश्वत है अर्थात जो हमेशा से था. ‘धर्म’ शब्द को भी परिभाषित करना सहज नहीं है. इस शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं, जैसे धर्म द्वारा निर्धारित कर्तव्य या आध्यात्मिक व्यवस्था अथवा पवित्र आचार-विचार या फिर सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का संकलन. शशि थरूर अपनी पुस्तक ‘वाय आई एम ए हिन्दू’ में लिखते हैं कि “धर्म वह है जिसका हम पालन करते हैं”. इन जटिलताओं को परे रख कर हम इतना तो कह ही सकते हैं कि सनातन धर्म शब्द का प्रयोग हिन्दू धर्म, विशेषकर लैंगिक व जातिगत ऊंच-नीच पर आधारित उसके ब्राम्हणवादी संस्करण, के लिए किया जाता रहा है. यही कारण है कि अंबेडकर का मानना था कि हिन्दू धर्म दरअसल ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र है. हिन्दू धर्म हिन्दुत्व या हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति, जो मनुस्मृति और तदानुसार जातिगत ऊँच-नीच को मान्यता देती है, का मूलाधार है. एक तरह से आज सनातन धर्म को जातिगत ऊँच-नीच का पर्याय मान लिया गया है.

हमें उदयनिधि स्टालिन (स्टालिन जूनियर या एसजे) के सनातन धर्म के उन्मूलन के आव्हान को इस पृष्ठभूमि में समझना होगा. एसजे, पेरियार की परंपरा में रचे-बसे हैं. पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया था जो जातिगत समानता और पितृसत्तात्मकता के उन्मूलन पर केन्द्रित था. पेरियार ब्राम्हणवादी नियमों और प्रथाओं, जिनका समाज में जबरदस्त बोलबाला था, के कटु आलोचक थे. पेरियार के पहले अंबेडकर की मौजूदगी में उनके साथी सहस्त्रबुद्धे ने मनुस्मृति का दहन किया था. अंबेडकर का मानना था कि मनुस्मृति जातिगत असमानता को वैधता प्रदान करती है. ब्राम्हणवाद, जिसे सनातन धार्मिक मूल्यों का संकलन बताया जाता है, की प्रभुता से उद्वेलित हो अंबेडकर ने घोषणा की थी कि, ‘‘मैं एक हिन्दू के रूप में पैदा हुआ था. यह मेरे हाथ में नहीं था. परंतु मैं एक हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं”. एसजे ने कहा कि ‘‘सनातन धर्म वह सिद्धांत है जो लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बांटता है…” (द टाईम्स ऑफ इंडिया, 4 सितंबर 2023).

एसजे ने केवल वही दुहराया है जो पेरियार और अंबेडकर ने अलग शब्दों में कहा था. ‘सनातन धर्म’ शब्द के इस्तेमाल के चलते एसजे के वक्तव्य को किस तरह तोड़ा-मरोड़ा गया यह भाजपा के प्रवक्ता अमित मालवीय की ट्वीट से जाहिर है. मालवीय ने एक्स पर लिखा, ‘‘तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के पुत्र और डीएमके सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना मलेरिया और डेंगू से की है…. संक्षेप मे वे यह आव्हान कर रहे हैं कि भारत की 80 प्रतिशत आबादी, जो सनातन धर्म की अनुयायी है, का कत्लेआम कर दिया जाए.” यहां मालवीय न केवल एसजे के बयान को तोड़-मरोड़ रहे हैं वरन् वे इस बात की पुष्टि भी कर रहे हैं कि आज सनातन धर्म और हिन्दू धर्म एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं.

एसजे ने जाति के उन्मूलन की बात कही है ना कि लोगों के. जब अंबेडकर ‘‘जाति के विनाश” की बात कहते हैं तो वे यह नहीं कह रहे होते हैं कि हिन्दुओं का नरसंहार होना चाहिए. अंबेडकर का आशय और एसजे का आव्हान एक ही हैं. भाजपा के नेता जानबूझकर एसजे के बयान को तोड़-मरोड़ रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि एसजे का डीएमके, इंडिया गठबंधन का हिस्सा है. अमित शाह आमसभाओं में कह रहे हैं कि कांग्रेस ने कभी भारतीय संस्कृति का सम्मान नहीं किया और यह भी कि एसजे का आव्हान ‘हेट स्पीच’ है. सच यह है कि जाति व्यवस्था के विनाश की कामना करना या असमानता पर आधारित किसी भी व्यवस्था का विरोध करना ‘हेट स्पीच’ नहीं हो सकता. एसजे ने वही कहा जो अंबेडकर और पेरियार ने कहा था. यहां मुख्य मुद्दा यह है कि ब्राम्हणवादी हिन्दू धर्म ने सनातन धर्म का चोला ओढ़ लिया है.

सच यह भी है कि अलग-अलग दौर में एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ होते हैं. जब गांधीजी देश को एक करने और अछूत प्रथा का निवारण करने का प्रयास कर रहे थे तब उन्होंने स्वयं को सनातन धर्म और हिन्दू धर्म का अनुयायी बताया था. सन् 1932 के बाद कुछ सालों तक गांधीजी का जोर अछूत प्रथा के उन्मूलन और दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने पर था. अतीत में बौद्ध और जैन धर्मों को भी सनातन बताया जाता था. आज आरएसएस, जो ब्राम्हणवाद को राष्ट्रवाद से जोड़ता है, हिन्दू धर्म के लिए सनातन शब्द के प्रयोग को बढ़ावा दे रहा है. यही कारण है कि एसजे को सनातन धर्म शब्द का प्रयोग करना पड़ा. जहां तक ‘हेट स्पीच’ का सवाल है, एसजे ने केवल उन मूल्यों के उन्मूलन की बात कही है जो जातिगत ऊँच-नीच को औचित्यपूर्ण और वैध ठहराते हैं. इसे किसी भी तरह से हेट स्पीच नहीं कहा जा सकता.

भाजपा के नेता और प्रवक्ता उदयनिधि के वक्तव्य के बहाने कांग्रेस और इंडिया पर बिना किसी आधार के हमले कर रहे हैं. इस आरोप में कोई दम नहीं है कि कांग्रेस ने भारतीय संस्कृति का सम्मान नहीं किया. यह केवल सियासी फायदे के लिए तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का उदाहरण है. कांग्रेस तो उस जनांदोलन की धुरी थी जिसने देश के सभी निवासियों को भारतीय की सांझा पहचान के झंडे तले लाने का प्रयास किया. यह आंदोलन भारत के सांस्कृतिक मूल्यों का पूरा सम्मान करता था परंतु इसके साथ ही वह समाज में बदलाव और सुधार भी लाना चाहता था.

अमित शाह कहते हैं, ‘‘आप (विपक्ष) सत्ता हासिल करना चाहते हैं. पर किस कीमत पर? आप सनातन धर्म और इस देश की संस्कृति और इतिहास का असम्मान करते आ रहे हैं”. तथ्य यह है कि राष्ट्रीय आंदोलन ने भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को संरक्षित किया. जैसा कि नेहरू लिखते हैं, “भारत एक ऐसी स्लेट थी जिसके ऊपर एक के बाद एक कई परतों में नई-नई बातें लिखी गईं परंतु किसी नई परत ने न तो पिछली परत को पूरी तरह से छुपाया और न मिटाया.” दरअसल समस्या इंडिया गठबंधन की सदस्य पार्टियों की वजह से नहीं है. समस्या भाजपा एंड कंपनी की है जिनके लिए भारतीय संस्कृति का अर्थ है ब्राम्हणवाद.

जाति प्रथा के उन्मूलन में पहले ही बहुत देर हो चुकी है. अंबेडकर, पेरियार और गांधीजी ने भी इस दिशा में सघन प्रयास किए और उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली परंतु यह प्रक्रिया अधबीच रूक गई और पिछले तीन दशकों से तो हम पीछे की तरफ जा रहे हैं. शब्दावली को लेकर बेसिर-पैर के विवाद खड़े करने की बजाए हमें जाति के विनाश के लिए काम करना चाहिए. सनातन शब्द पहले बौद्ध और जैन धर्मों के लिए इस्तेमाल होता था. बाद में वह मनुस्मृति का हिस्सा बना और आज वह ब्राम्हणवादी हिन्दू धर्म का प्रतीक बन गया है. जरूरत इस बात की है कि हम बाल की खाल निकालने की बजाए और इस मुद्दे को राजनैतिक बहसबाजी का विषय बनाने की बजाए ऐेसे सुधारों की ओर बढ़ें जिनसे हम भारत के संविधान के मूल्यों के अनुरूप समानता पर आधारित समाज का निर्माण कर सकें.

वैसे भी एसजे का बयान इंडिया गठबंधन का आधिकारिक वक्तव्य नहीं है. भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बनाएगी या नहीं यह तो आने वाला समय ही बताएगा परंतु हम सबको यह याद रखना चाहिए कि भाजपा ने कर्नाटक चुनाव में बजरंगबली को एक बड़ा मुद्दा बनाया था और उसके बावजूद मुंह की खाई थी.

06/09/2023
(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया; लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)
https://www.navjivanindia.com/opinion/talk-of-caste-eradication-is-not-a-call-for-genocide-of-hindus-udhayanidhi-has-only-repeated-ambedkars-point 

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‘ભારત’ : પ્રશ્ન એની સાથેના વિચારધારાકીય બોજનો છે

પ્રકાશ ન. શાહ|Opinion - Opinion|8 September 2023

સત્તાવાર જાહેર ઉપયોગ સામે વાંધો ન જ હોય

બંધારણે ઇન્ડિયા ધેટ ઇઝ ભારત એવો ફોડ પહેલા દિવસથી પાડેલો છે. સિંધુ પરથી હિંદુ અને ઇન્ડસ પરથી ઇન્ડિયા એ બેઉ પ્રયોગો આવ્યા એટલે એનાં મૂળિયાં, વિદેશી ભેટ છતાં નિતાન્ત સ્વીદેશી છે.

પ્રકાશ ન. શાહ

ઇન્ડિયાને સ્થાને ભારતના આગ્રહે જગવેલ વિવાદે સંમિશ્ર પ્રતિભાવો જગવ્યા છે, અને આ વિવાદની જોડાજોડ સાળંગપુર ઘટના સાથે ધર્મ, સનાતન ધર્મ જેવી સંજ્ઞાઓ નવસમજ સહ તપાસના દાયરામાં આવી છે. અધૂરામાં પૂરું, દક્ષિણ દેશમાંથી સ્તાલિને પેરિયાર પરંપરામાં ચીપિયો પછાડ્યો છે કે ધર્મ, ધર્મ શું કરો છો. અમે વર્ણવ્યવસ્થાની ગુલામી પરંપરામાં નથી માનતા.

સામાન્યપણે ભારત એ નામના સત્તાવાર જાહેર ઉપયોગ સામે વાંધો ન જ હોય. બંધારણે ઇન્ડિયા ઘેટ ઇઝ ભારત એવો ફોડ પહેલા દિવસથી પાડેલો છે. સિંધુ પરથી હિંદુ અને ઇન્ડસ પરથી ઇન્ડિયા એ બેઉ પ્રયોગો આપ્યા એટલે એનાં મૂળિયાં, વિદેશી ભેટ છતાં, નિતાન્ત સ્વદેશી છે.

ઋષભદેવના પુત્ર ભરત ચક્રવર્તીની જૈન પરંપરામાં અને ઇતિહાસક્રમે તે પછી દુષ્યંતપુત્ર ભરતની પરંપરામાં ભારત એ પ્રયોગ રૂઢ થયો, અને સ્વાભાવિક જ તે સ્વીકાર્ય પણ છે. બીજું ‘જનતા દલના ભર્તૃહરિ મહેતાએ 2015માં લોકસભામાં તો કાઁગ્રેસના શાંતારામ નાઇકે 2011માં રાજ્યસભામાં આ એકમાત્ર નામના આગ્રહસર ખાનગી વિધેયક પણ રજૂ કર્યા હતા. 2011 અને 2015માં ભા.જ.પ. સંસદીય પક્ષે ગૃહમાં શું ભૂમિકા લીધી હતી. એનો ખાયલ નથી પણ ભારત માટેનો એનો આગ્રહ સ્વાભાવિક જ લાંબા સમયથી રહ્યો છે.

વિપક્ષની તત્કાળ પ્રતિક્રિય અલબત્ત એ જ છે કે અમે ‘ઇન્ડિયા’ રૂપે ગઠિત થયા અને લોકોમાં ઊંચકાયા કે તરત આ ‘ભારત’ જાપ શરૂ થયો છે. ડિબેટમાં સ્કોરિંગ પોઈન્ટ તરીકે આવા મુદ્દાઓ પરસ્પર કામ આપતાં હોય છે, પણ નીતરી ચર્ચામાં એમની ભૂમિકા એવી મહત્ત્વની નયે હોય.

મુદ્દે ભારત કહેતાં જે ખયાલ છે એની સાથે સંઘ પરિવાર પ્રકારનાં જોડાણોથી અમુક ઇતિહાસબોજ માલૂમ પડે છે. બંધારણ સભામાં ચાલતી ચર્ચાની જોડાજોડ સંઘના ‘ઓર્ગેનાઇઝર’ વગેરે પત્રોમાં જે સમાંતર ટીકાટિપ્પણ ચાલતાં હતાં. એમાં જેમ ‘ઇન્ડિયા ધેટ ઇઝ ભારત’ જેવા પ્રયોગ નિશાન પર હતા તેમ પ્રસંગે મનુસ્મૃતિની પરંપરાથી ખસીને નવા બંધારણ પર જવા અંગે ટીકાભાવ પણ પ્રગટ થતો. (જેમને આ આઝાદી અધૂરી અગર જુઠ્ઠી લાગતી હતી એવા ડાબેરી અંતિમવાદીઓ પણ હતા. બીજા પણ હતા. પણ આ ક્ષણે આપણે સ્વાભાવિક જ એમાં જતા નથી.)

સરકાર એના સત્તાવાર કામકાજમાં યથાશક્ય અગ્રતાપૂર્વક ભારત એ નામનો ઉપયોગ કરે એમાં કોઈ બંધારણીય સુધારાની જરૂર નથી, સિવાય કે ‘ઇન્ડિયા’ને સદંતર તિલાંજલિ આપવાનો ખયાલ હોય. મુદ્દે, મુશ્કેલી અને વિવાદમુદ્દા ત્યાંથી શરૂ થઈ શકે જ્યાં ‘ભારત’ નામ એક વિચારધારાકીય સ્થાપના તરીકે આગળ કરાય. વ્યાપક સ્વીકૃતિવાળા એક સ્વાભાવિક નામ તરીકે સરકારી રાહે એના ઉપયોગમાં મુશ્કેલી ન હોવી જોઈએ.

છેલ્લા ત્રણેક દાયકામાં રાષ્ટ્ર-રાજ્યની પરંપરાગત ચર્ચામાં સભ્યતા(સિવિલાઇઝેશન)નું પરિમાણ દાખલ થયું છે. જેમ સેંગોલ પ્રકરણ વખતે તેમ આ ચર્ચામાં પણ સંઘ પરિવાર એ પરિમાણ આગળ કરી રહેલ છે. 19મી સદીમાં વિકસેલ રાષ્ટ્રનો ખયાલ અને 20મી સદી ઉતરતે વિકસેલ સભ્યતા અભિગમ પરસ્પર પૂરક કરતાં વધુ તો સામસામા છે. સાવરકર-ગોળવલકરના રાષ્ટ્રવાદમાં ન તો ‘ધર્મના નિતાન્ત શુદ્ધ સ્વરૂપને અવકાશ છે, ન તો હમણે હમણે વિકસેલ સભ્યતા-અભિગમને. થોડોક રસ્તો ઉપર દીનદયાલે ખોલ્યો હતો, પણ હવે તો શલ્યાની અહલ્યા થાય ત્યારે.

ભારત નામનો વાંધો નથી. એને આવકાર જ હોય. માત્ર આપણે એકવીસમી સદીમાં એક સર્વસમાવેશી મુલક તરીકે શ્વસવા વસવા વિકસવા માગીએ છીએ એ પાયાની સમજ, કહો કો પૂર્વશરત છે, ‘ઇન્ડિયા’ પાસે વૈકલ્પિક દર્શન નથી, કેવળ અંકગણિત છે, કોઈ રાસાયણિક ઘટનાવિવેક નથી એવી ટીકા થાય છે એ તે કોઈક તબક્કે સાચી તો કોઈક તબક્કે ખોટી હોઈ શકે છે. પણ સામે પક્ષે, બંધારણના મેળમાં જે વિરોધ સૂરો અલગ અલગ છેડેથી સત્તાપક્ષની શાસકીય નીતિરીતિ સંબંધ ઉઠે છે એમાં વૈકલ્પિક વિચાર-સામગ્રી પડેલી છે જે હવા બંધાતાં સામે આવી પણ શકે છે.

e.mail : prakash.nireekshak@gmail.com
પ્રગટ : ‘પરિપ્રેક્ષ્ય’, “દિવ્ય ભાસ્કર”; 07 સપ્ટેમ્બર 2023

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સરકારી ગાય !

રમેશ સવાણી|Opinion - Short Stories|7 September 2023

[એ વખતે મારી ઉંમર 21 વર્ષની હતી. મેં એક લઘુકથા લખી, ‘નિરીક્ષક’ને મોકલી. 26 જુલાઈ,1981 ના અંકમાં પ્રગટ થઈ હતી. પોલીસ સર્વિસમાં જોડાયો તેના 9 વર્ષ પહેલા. ‘સાપ્તાહિક હિન્દુસ્તાન’માં 3 એપ્રિલ, 1983ના રોજ હિન્દીમાં અને ‘ચાંદની’, હાસ્યાંકમાં 1 એપ્રિલ, 1984 માં પ્રસિદ્ધ થઈ હતી. ચાલો માણીએ.]

અદાલતે સરકારને દોષિત ઠરાવી. ઘટના આમ બનેલી :

એક સરકારી ફાર્મ હતું. તેમાં એક દૂઝણી ગાય હતી. ગાય માટે ઘાસચારો ખૂટી ગયો.

ઉપરી અધિકારીઓને અનેક પત્રો લખ્યા છતાંય જવાબ ન મળ્યો, ત્યારે ફાર્મ સંચાલકે સંબંધિત પ્રધાનને લખ્યું : “ધાસચારા માટે અમુક રકમ મંજૂર કરશો. વરસાદના અભાવે ઘાસચારો ખૂટી ગયો છે…”

પ્રધાનનો જવાબ આવ્યો : “ઘાસચારા માટે આ અગાઉ મોટી રકમ ફાળવી હતી. હવે કંઈ થઈ શકે તેમ નથી. ગાય જેટલું દૂધ આપે છે તે બધું ગાયને પાઈ દેવું અને એ રીતે થોડા દિવસ ચલાવો.”

થોડા દિવસ પછી સંચાલકે ફરીવાર પ્રધાનને પત્ર લખ્યો : “ગાય મરવા પડી છે, ઘાસચારાની સગવડતા તાત્કાલિક કરવા વિનંતી.”

પ્રધાને લખ્યું : “ગાય મરવા પડી છે, મરી તો નથી ગઈને? ખુશ હશો, ખુશ છું.”

છેવટે, સંચાલકે ગાયને ફાર્મમાંથી તગેડી મૂકી અને પ્રધાનને લખી નાંખ્યું કે ગાય મરી ગઈ છે.

એક દિવસ ગાય બાજુના ખેતરમાં ઘૂસી ગઈ અને ખેતરને તારાજ કરી નાંખ્યું. ખેતરના માલિકે ફરિયાદ કરી.

અદાલતે ફરિયાદીને પૂછ્યું : “સરકારી ગાય તો મરી ચૂકી છે. તમારો ઘાસચારો જે ગાય ચરી ગઈ એ સરકારી ગાય હતી-એમ કહેવાનું કોઈ કારણ તમારી પાસે છે?”

“હા, સાહેબ. એ ગાય ખૂબ ઝડપથી ખાતી હતી; અકરાંતિયાની જેમ જ. ઝડપથી અને મોટા પ્રમાણમાં ખાઈ શકે એ સરકારી જ હોય !”

સૌજન્ય : રમેશભાઈ સવાણીની ફેઇસબૂક દીવાલેથી સાદર

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Opinion

  • સ્ટ્રેટ ઑફ હોર્મુઝઃ “બહોત કઠિન હૈ ડગર પનઘટ કી …” ભારતની ઊર્જા સુરક્ષા પર સાંકડા માર્ગનો સકંજો
  • ચલ મન મુંબઈ નગરી—334
  • મારે મોગલ ને ફુલાય પિંજારા 
  • અસત્યના પ્રયોગો  
  • દલિત આંદોલનની દિશા કેવળ અનામત-એટ્રોસિટીમાં ઇતિ નથી

Diaspora

  • યુ.કે.માં ડ્રાઇવિંગની પરીક્ષા
  • અમીના પહાડ (1918 – 1973) 
  • છ વર્ષનો લંડન નિવાસ
  • દીપક બારડોલીકરની પુણ્યતિથિએ એમની આત્મકથા(ઉત્તરાર્ધ)ની ચંદ્રકાન્ત બક્ષીએ લખેલી પ્રસ્તાવના.
  • ગાંધીને જાણવા, સમજવાની વાટ

Gandhiana

  • માનવતાવાદી ત્રિપુટીને સ્મરણાંજલિ 
  • ગાંધી ‘મોહન’માંથી ‘મહાત્મા’ બન્યા, અને આપણે?
  • ગાંધીહત્યાના પડઘા: ગોડસેથી ગોળવલકર સુધી …
  • ગાંધીની હત્યા કોણે કરી, નાથુરામ ગોડસેએ કે ……? 
  • ગાંધીસાહિત્યનું ઘરેણું ‘જીવનનું પરોઢ’ હવે અંગ્રેજીમાં …

Poetry

  • કવિ
  • ગઝલ
  • ગઝલ
  • કોઈ અપાવે જો એ બાળપણ પાછું …
  • પન્નાને, વેલન્ટાઈન ડે, ફેબ્રુઆરી 14, 2026 ~ સોનેટ ~ નટવર ગાંધી

Samantar Gujarat

  • ઇન્ટર્નશિપ બાબતે ગુજરાતની યુનિવર્સિટીઓ જરા પણ ગંભીર નથી…
  • હર્ષ સંઘવી, કાયદાનો અમલ કરાવીને સંસ્કારી નેતા બનો : થરાદના નાગરિકો
  • ખાખરેચી સત્યાગ્રહ : 1-8
  • મુસ્લિમો કે આદિવાસીઓના અલગ ચોકા બંધ કરો : સૌને માટે એક જ UCC જરૂરી
  • ભદ્રકાળી માતા કી જય!

English Bazaar Patrika

  • My mother cries on the phone’: TV’s war spectacle leaves Indians in Israel calming frightened families
  • “Why is this happening to me now?” 
  • Letters by Manubhai Pancholi (‘Darshak’)
  • Vimala Thakar : My memories of her grace and glory
  • Economic Condition of Religious Minorities: Quota or Affirmative Action

Profile

  • તપસ્વી સારસ્વત ધીરુભાઈ ઠાકર
  • સરસ્વતીના શ્વેતપદ્મની એક પાંખડી: રામભાઈ બક્ષી 
  • વંચિતોની વાચા : પત્રકાર ઇન્દુકુમાર જાની
  • અમારાં કાલિન્દીતાઈ
  • સ્વતંત્ર ભારતના સેનાની કોકિલાબહેન વ્યાસ

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