Opinion Magazine
Number of visits: 10046114
  •  Home
  • Opinion
    • Opinion
    • Literature
    • Short Stories
    • Photo Stories
    • Cartoon
    • Interview
    • User Feedback
  • English Bazaar Patrika
    • Features
    • OPED
    • Sketches
  • Diaspora
    • Culture
    • Language
    • Literature
    • History
    • Features
    • Reviews
  • Gandhiana
  • Poetry
  • Profile
  • Samantar
    • Samantar Gujarat
    • History
  • Ami Ek Jajabar
    • Mukaam London
  • Sankaliyu
    • Digital Opinion
    • Digital Nireekshak
    • Digital Milap
    • Digital Vishwamanav
    • એક દીવાદાંડી
    • काव्यानंद
  • About us
    • Launch
    • Opinion Online Team
    • Contact Us

जेनजी सुनो ! 

कुमार प्रशांत|Opinion - Opinion|1 August 2026

कुमार प्रशांत

मैं, जो अब उम्र की 76वीं सीढ़ी पार करने जा रहा हूं, नहीं जानता हूं िक यह जेनजी क्या है ! अगर यह गणित का वैसा ही अर्थहीन खेल है जैसा इसे बतलाया जा रहा है, तो मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं है. कुंडली बांचनेवाले, रेखाओं से भविष्य बतलानेवाले, सितारों व ग्रहों का हिसाब लगा कर भूत-भविष्य तय करनेवाले खेल मुझे खेल से ज्यादा कभी कुछ लगे ही नहीं. इसलिए कौन, कौन से वर्ष-खंड में पैदा हुआ है, इससे उसका जेनरेशन तय करनेवाला खेल भी मुझे मतलब का नहीं लगता है.

मैं उम्र का फर्क समझता हूं. मैं ताज़ादम शरीर की कीमत जानता व मानता हूं. मैं जानता हूं अौर मानता हूं कि तुम, जो मुझसे 50-60 वर्ष बाद पैदा हुए हो, मुझसे ज्यादा दौड़ सकते हो, हवा में उड़ सकते हो, शिखर से छलांग मार सकते हो, बादलों में जा सकते हो, चांद-सितारे छू सकते हो. यह सब कभी मैंने भी किया है; आज भी ऐसा करने की हसरत रखता हूं. लेकिन कर नहीं सकता, क्योंकि हमारा हो कि तुम्हारा, यह शरीर है तो एक मशीन; और हर मशीन की तरह इसकी एक एक्सपायरी डेट भी है. कारखानों की मशीनों की एक्सपायरी डेट उस पर लिखी आती है. यहां मजा यह है कि हमारी एक्सपायरी डेट है तो ज़रूर ही लेकिन हममें से किसी को उसका पता नहीं है. इसलिए फिर हमारे हाथ में बच रहता है उमंग से भरा मन, संकल्प से भरा दिल और सपनों से भरी अांखें ! अगर जेनजी से तुम्हारा मतलब इन सबसे है तो मैं तुम सबके बराबर अौर तुम सबके साथ जेनजी हूं.

मैं उस महात्मा गांधी से प्रेरित हूं जिसने 80 साल की उम्र तक – यानी गोली से मारे जाने तक – अपने सपनों के हर हत्यारे से अथक लड़ाई की; और जब मारा गया तो भी उसने इस तरह मौत को गले लगाया कि सारी दुनिया ने सर झुका कर यही कहा कि जीना भी ऐसा ही हो, मरना भी ऐसा ही. अभी-अभी, तुम्हारे आसपास से ही एक आवाज उठी जो मैंने सुनी. वह कह रही थी : जेनजी यानी जेनरेशन गांधी ! यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारे साथ हूं; मुझे साथ ले लो !

मैं जंतर-मंतर पर लगातार था अौर तुम लोगों को खुलते-खिलते, रचते-मिटाते, नाचते-गाते, अपने सपनों को साझा करते देख रहा था. मैं तुम्हारी गति भी देख रहा था, तुम्हारी कल्पनाशीलता भी. मैं अनशन की तुम्हारी दृढ़ता भी देख रहा था, तुम्हारा संयम भी. मैं इन सबको जोड़ कर कहूं तो कहूंगा कि मैं नया भारत देख रहा था. इस भारत में कुछ फिसलन भी थी, लड़खड़ाहट भी; कुछ बेढ़बपना भी था, कुछ अनगढ़ता भी ! मैं भी तो इन सबके साथ ही जीता-बढ़ता आया हूं. यह हमारे साथ चलनेवाली परछाईं है और मुझे अपनी परछाई कभी भी बोझ नहीं लगती है. तुम सब मुझे मेरे जैसे ही लगते हो. हम सबको समझना इतना ही है कि जो अनावश्यक है, असंस्कृत है, कुरूप है, हमें ऊपर उठाता नहीं, नीचे खींचता है, उन सबसे मुक्ति पानी है. जैसे सांप केंचुल छोड़ता है न, वैसे ही इन सबको हमें छोड़ते चलना है. यह आसान नहीं है लेकिन इसके बिना कल्याण भी नहीं है. इसलिए बोलने-लिखने-गाने-नारे लगाने तथा संवाद करने में हर फिसलन से हमें बचना है.

अब हम जंतर-मंतर से बाहर आते हैं. वहां तुम सबने क्या-क्या किया, वह गाथा इतिहास दर्ज कर चुका है. वह उसे दोहराता भी रहेगा. हम क्यों दोहराएं ! वह भारतीय लोकतंत्र का स्वर्णिम अध्याय है. तुम्हारी बोली से किसी सत्ता का अहंकार टूट गया है. वह औचक देख रही है कि यह आंधी आई कहां से; और वह किसी शिकारी कुत्ते-सी सूंघ रही है कि यह किधर जा रही है. जब सत्ता-प्राप्ति अंतिम सत्य बन जाती है तब अहंकार बारूद  का काम करता है; और बारूद है तो वह फटेगा ही ! धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक आदमी का इस्तीफा नहीं है, सत्ता के अहंकार के टूटने की गूंज है. वह टूटा यह अच्छा हुआ. लेकिन तुम याद रखना कि चोट खाया सांप ज्यादा ख़तरनाक होता है. राष्ट्र जब भीड़ में बदल दिया जाता है तब वह हत्यारा हो उठता है जिसे राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है. देशप्रेम व राष्ट्रवाद दो सर्वथा भिन्न भाव ही नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे के विरोधी भाव भी हैं.

इसलिए सुनो जेनजी, अब तुम्हें तोड़ने के सारे संभव तीर चलाए जाएंगे, सारे हथकंडे अपनाए जाएंगे. तुम्हारे साथी खरीदे-बेंचे जाएंगे; तुम्हारे सामने जेनजी की एक नई जमात खड़ी कर दी जाएगी. तुम आसानी से देश भर में न घूम पाओगे, न जी पाओगे.  राजनीतिक दलों का जंगल तुम्हारे सामने खुला है ताकि तुम उनमें से किसी में अंटक-भटक जाओ. हर जगह तुम्हारे सामने एक जंतर-मंतर होगा जो सवाल करेगा व जवाब भी पूछेगा. इसलिए निजी जीवन में साफ व संयमित रहो. एक-दूसरे से जितना संभव हो, संवाद बनाओ. लगातार-लगातार देश भर के अपने युवकों के बीच जाओ. अपने बीच की खाइयां पाटो. याद रखो कि प्रतिवाद में सारा कुछ नकारात्मक चल भी जाता है; परिवर्तन का आंदोलन नकारात्मक भी, सकारात्मक भी, रचनात्मक भी और दूरगामी भी- ऐसे सारे तत्वों का एक पुंज होता है. हमें वह पुंज तैयार करना है. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ; धर्मेद्र प्रधानों के इस्तीफे होते भी रहेंगे लेिकन तंत्र पर लोक की -जेनजी की !- पकड़ कैसे बने व बनी रहे, इसका जवाब हमें खोजना है, सिद्ध करना है. अगर हम यह कर सके तो दुनिया भर का लोकतंत्र हमारा ऋणी रहेगा.

क्यूबा के अमर क्रांतिकारी चे ग्वुवेएरा, जिनकी तस्वीर तुम्हारे टी-शर्टों पर मैं देखता रहा हूं, वे जब भारत आए और गांधी को थोड़ा जाना-समझा तो राजघाट जा कर लिखा कि क्रांति का एक तरीका यह भी है, यह तो हम जानते ही नहीं थे ! इतिहास तुम्हें  ऐसा कहने का अवसर नहीं देगा, क्योंकि तुम चे के बहुत-बहुत बाद पैदा हुए हो. तुम्हारे पास जानकारियों की अत्यंत कुशल व व्यापक तकनीक है. इसलिए हमें विचार-संपन्न होना होगा. दूसरी विपन्नताएं चल भी जाएंगी, विचारों व विकल्पों की विपन्नता नहीं चलेगी.

जब तुम जंतर-मंतर से निकल कर अपने घरों में पहुंचोगे तो पाओगे कि अपना घर भी धर्मेंद्र प्रधानों से भरा है. हमें घर-घर में उनका मुकाबला करना है. वहां जेनजी है ही नहीं. गांधी ने धुर 1948 में कहा था न कि मुझे अब जो लड़ाई लड़नी है वह साम्राज्यवाद से लड़ी लड़ाई से भी ज्यादा दुर्धर्ष होगी, क्योंकि यह अपनों से है. तुम्हें भी अपने हर घर में, हर कमरे में यह लड़ाई लड़नी होगी. इसके बिना सफलता होगी नहीं, टिकेगी नहीं. इसलिए घर में फैली व फैलाई जा रही हर संकीर्णता से मुखर होकर- अपनों के सामने सत्याग्रह करो  !

घर से बाहर आओगे तो समझ सकोगे कि पिछले कोई पंद्रह सालों में इस सरकार ने योजनापूर्वक भारतीय राष्ट्र की तमाम सांस्कृतिक-शैक्षणिक-सामाजिक-बौद्धिक व्यवस्थाओं में उसी सांप्रदायिक संगठन के लोगों को ठूंस-ठूंस कर भर दिया है जो नैतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से देश के सबसे विपन्न लोगों का हिंसक जमावड़ा है. इनसे कदम-कदम पर, हर स्तर पर लड़ना होगा. हमें सीखना होगा कि गांधी ने इन्हें कैसे भारतीय समाज के चित्त से करीब-करीब बाहर ही कर दिया था. इसी बौखलाहट में इन्होंने उनकी हत्या की थी. इसलिए इनसे अंतिम लड़ाई हम पर उधार है.

नीट व दूसरी परीक्षाओं का पेपर लीक किसी चूक की वजह से नहीं हुआ है. जब सारा देश एक धंधे में बदल दिया जाता है तब हर कुछ बिकता है- परीक्षाएं भी, पेपर भी, राम मंदिर व दूसरे तमाम धर्मों के प्रतीक-स्थलों का चढ़ावा भी, नौकरियां भी, रोज़गार भी, न्याय भी, सपने भी ! सोचो न, जब सरकार ही बिकाऊ विधायकों व सांसदों से बनाने का नया फ़ैशन चलाया गया है, तब क्या है जो बाज़ार में नहीं है, बिकाऊ नहीं है ?

तो लड़ाई यहां है जेनजी ! लड़ोगे न ? जो नहीं लड़ेगा वह गणित से भले जेनजी कहलाए, होगा वह कायर ! तो जेनका और जेनजी में से चुनना है तुम्हें ! 

(31.07.2026) 
मेरे ताजा लेखों के लिए मेरा ब्लॉग पढ़ें
https://kumarprashantg.blogspot.com

Loading

1 August 2026 Vipool Kalyani
← ડ્રોપ, બ્રેક કે ગૅપ યરનો અર્થ સમય બગાડવો એવો નથી 
વાદળ →

Search by

Opinion

  • ‘મેં શબ્દને ખોલીને જોયું, મળ્યું મૌન’
  • વાદળ
  • ડ્રોપ, બ્રેક કે ગૅપ યરનો અર્થ સમય બગાડવો એવો નથી 
  • ઝેન-જી
  • ઓળખવું

Diaspora

  • યુ.કે.માં ડ્રાઇવિંગની પરીક્ષા
  • અમીના પહાડ (1918 – 1973) 
  • છ વર્ષનો લંડન નિવાસ
  • દીપક બારડોલીકરની પુણ્યતિથિએ એમની આત્મકથા(ઉત્તરાર્ધ)ની ચંદ્રકાન્ત બક્ષીએ લખેલી પ્રસ્તાવના.
  • ગાંધીને જાણવા, સમજવાની વાટ

Gandhiana

  • શું આ જ કળિયુગની પરિભાષા હશે ? 
  • આંતરિક શક્તિ : હિંમત, અંતરાત્માનો અવાજ અને અહિંસક પ્રતિકાર 
  • માનવતાવાદી ત્રિપુટીને સ્મરણાંજલિ 
  • ગાંધી ‘મોહન’માંથી ‘મહાત્મા’ બન્યા, અને આપણે?
  • ગાંધીહત્યાના પડઘા: ગોડસેથી ગોળવલકર સુધી …

Poetry

  • માર્યા જશે
  • ચાર સાંપ્રત હિન્દી કાવ્યો
  • ગઝલ
  • લૂંટ શકે તો લૂંટ
  • દરિયો

Samantar Gujarat

  • ઇન્ટર્નશિપ બાબતે ગુજરાતની યુનિવર્સિટીઓ જરા પણ ગંભીર નથી…
  • હર્ષ સંઘવી, કાયદાનો અમલ કરાવીને સંસ્કારી નેતા બનો : થરાદના નાગરિકો
  • ખાખરેચી સત્યાગ્રહ : 1-8
  • મુસ્લિમો કે આદિવાસીઓના અલગ ચોકા બંધ કરો : સૌને માટે એક જ UCC જરૂરી
  • ભદ્રકાળી માતા કી જય!

English Bazaar Patrika

  • State-Sponsored Communal Profiling : The Gujarat Government Must Be Held Accountable
  • My mother cries on the phone’: TV’s war spectacle leaves Indians in Israel calming frightened families
  • “Why is this happening to me now?” 
  • Letters by Manubhai Pancholi (‘Darshak’)
  • Vimala Thakar : My memories of her grace and glory

Profile

  • તપસ્વી સારસ્વત ધીરુભાઈ ઠાકર
  • સરસ્વતીના શ્વેતપદ્મની એક પાંખડી: રામભાઈ બક્ષી 
  • વંચિતોની વાચા : પત્રકાર ઇન્દુકુમાર જાની
  • અમારાં કાલિન્દીતાઈ
  • સ્વતંત્ર ભારતના સેનાની કોકિલાબહેન વ્યાસ

Archives

“Imitation is the sincerest form of flattery that mediocrity can pay to greatness.” – Oscar Wilde

Opinion Team would be indeed flattered and happy to know that you intend to use our content including images, audio and video assets.

Please feel free to use them, but kindly give credit to the Opinion Site or the original author as mentioned on the site.

  • Disclaimer
  • Contact Us
Copyright © Opinion Magazine. All Rights Reserved