તાળાબંધી
સાથે થઇ હુકમની ઘોષણા
“મોં પર બાંધ બુકાની”
“અજાણ્યા લોકોથી દૂર રહે”
“હાથ ધો”
ત્યારે કોઈએ
કહ્યું નહોતું તને
આંખે પડદા પાડવાનું
સરવા રાખ કાન
બની જા નિરીક્ષક
એક દિવસ
દરવાજો ખુલશે
બુકાની ખરી પડશે
અને
શબ્દો હશે ઉત્સુક
વહેવા ફરી એક વાર
ત્યારે
તું શું બોલીશ?
સૌજન્ય : “નિરીક્ષક”, 16 જૂન 2020; પૃ. 16
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हमारे चारो तरफ आग लगी है. सीमाएं सुलग रही हैं – चीन से मिलने वाली भी और नेपाल से मिलने वाली भी ! पाकिस्तान से मिलने वाली सीमा की चर्चा क्या करें; उसकी तो कोई सीमा ही नहीं है. बांग्लादेश, लंका और बर्मा से लगने वाली सीमाएं खामोश हैं तो इसलिए नहीं कि उन्हें कुछ कहना नहीं है बल्कि इसलिए कि वे कहने का मौका देख रही हैं. कोरोना ने सीमाओं की सीमा भी तो बता दी है न ! ताजा लपट लद्दाख की गलवान घाटी में दहकी है जिसमें सीधी मुठभेड़ में अब तक की सूचना के मुताबिक 20 भारतीय और 43 चीनी फौजी मारे गये हैं. 1962 के बाद भारत-चीन के बीच यह सबसे बड़ी मुठभेड़ है. सरकार इसे छिपाती हुए पकड़ी गई है. चीन को अपने पाले में लाने की उसकी तमाम तमाम कोशिशों के बावजूद आज चीन सबसे हमलावर मुद्रा में है. डोकलाम से शुरू हुआ हमला आज गलवान की घाटी तक पहुंचा है और यही चीनी बुखार है जो नेपाल को भी चढ़ा है. कहा तो जा रहा था कि चीनी-भारतीय फौजी अधिकारियों के बीच वार्ता चल रही है जबकि सच यह है कि हम कहे जा रहे थे और वे सुन रहे थे. युद्ध की भाषा में इसे वक्त को अपने पक्ष में करना कहते हैं. चीन ने वही किया है.