
कुमार प्रशांत
एक ही रात में – 7 अप्रैल 2026 – हजारों साल पुरानी व समृद्ध ईरानी सभ्यता के अस्तित्व को धरती से मिटा देने की मनोरोगी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद क्या हुआ ? अखबारी दुनिया के लोग कहेंगे कि उसके बाद 15 दिनों का युद्धविराम हुआ.
मैं कहूंगा कि नहीं, यह तो हुआ ही; और वह भी हुआ जो संभवत: मानवीय सभ्यता के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. ट्रंप की कयामत की रात की घोषणा के बाद न ईरान के सत्ताधारियों ने, न ईरान की बलिदानी जनता ने किसी के आगे गुहार लगाई, न हाथ फैलाया, न माफी मांगी. स्त्री-पुरुष-बच्चियां-बच्चे कोई कहीं रोता-कलपता भी नहीं दिखा. पिछले 40 दिनों से वे, खंडहर होते जा रहे अपने देश को सीने से लगाए, आसमान से बरसते विनाश का सामना कर रहे थे, आक्रमणकारी ट्रंप, गैरतहीन, धूर्त नेतन्याहू और इनके सफरमैना खाड़ी देशों को लगातार हथियारों से जवाब भी दे रहे थे, हालांकि वे जानते थे कि वे अब ज्यादा दिनों तक जवाब देने की हालत में नहीं हैं…
लेकिन 40 दिनों बाद आज, 7 अप्रैल को लड़ाई बदल गई थी. वे ही सब युद्ध की नई कुंडली लिखने सड़कों पर निकल आए थे, जो युद्ध जारी रख सकने की हालत में नहीं बचे थे. ईरान के जिन आण्विक संयंत्रों को, पुलों-राजमार्गों, नागरिक सुविधा के दूसरे तंत्रों, पूजा-स्थलों और सांस्कृतिक केंद्रों को बमों से ध्वस्त कर देने की घोषणा ट्रंप ने की थी, हमने देखा कि अपने-अपने ध्वस्त घरों से निकल-निकल कर ईरानी नागरिक इस सभी स्थलों को घेर कर खड़े होते गए… कोई शोर नहीं, कोई नारेबाजी नहीं; सब एकदम शांत थे. लेकिन हर जगह लोग-ही-लोग थे… कोई कह तो नहीं रहा था लेकिन जैसे कहीं से, कोई आसमानी घोषणा कर रहा था : हम यहां खुले में खड़े हैं, चलाएं ट्रंप उनके पास जो भी है. ईरान के मशहूर संगीतकार अली घामसारी ने एक संयंत्र के सामने वाली सड़क पर दरी बिछाई और अपना वाद्य बजाने लगे. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने शांत पर दृढ़ आवाज में बताया: मरने की तैय़ारी रखनेवालों की सूची में अब तक 1.40 करोड़ ईरानी नागरिकों ने अपना नाम दर्ज करवाया है और उसमें पहला नाम मेरा है.
यह ईरान के लिए कयामत की रात थी जिसे उसने कमाल की रात में बदल दिया था.
किसी ने देखा या नहीं देखा पता नहीं लेकिन इन बलिदानी ईरानियों की किसी कतार में महात्मा गांधी भी खड़े थे ! दुनिया के जिस भी कोने में लोग वीरता से बलिदान देने निकलते हैं, यह ‘अधनंगा फकीर’ वहां अपनी हाजिरी लगाता ही है. जयप्रकाश ने कभी हंगरी में, कभी तिब्बत में, कभी बांग्लादेश में तो कभी चेकोस्लोवाकिया में इस गांधी को पहचाना था और उसके साथ खड़े हुए थे.
गांधी ने कहा था : विवश कायरता से कहीं भला होता है निडर बलिदान ! गांधी की अहिंसा का उपहास करने वाले किताबी बुद्धिजीवी व हिंदुत्व की अहंकारी भाषा में अपनी कायरता छिपाते रहने वाले कहां पहचान सकेंगे कि गांधी ने जिस चरम साहस की बात कही थी, ईरानी जनता में वह साहस 7 अप्रैल 2026 को मूर्तिमान हुआ था.
यही अमरीका था और उसके ही परमाणु बम थे कि जिनसे हिरोशिमा-नागासाकी का अकल्पनीय विनाश हो चुका था. तब किसी ने पूछा था गांधी से : आप परमाणु बम का अहिंसा से कैसे मुकाबला करेंगे ? पूछने वाले ने सोचा था कि गांधी निरुत्तर रह जाएंगे लेकिन गांधी ने जवाब टाला नहीं, वे हिचके भी नहीं. कहा : विनाश का मुकाबला अकंप वीरता से ही किया जा सकता है. उन्होंने बात साफ की : जब बम ले कर आसमान में विमान आएगा तब मैं किसी खाई-खंदक में छुपूंगा नहीं, बल्कि खुले मैदान में निकल आऊंगा और अपलक उस विमान को देखता रहूंगा जो संपूर्ण विनाश ले कर आया है. मैं जानता हूं कि उस विमान का पायलट उस ऊंचाई से मुझे देख नहीं सकेगा लेकिन मैं तो उसे अपलक देख सकूंगा. बम उन सबको मार जाएगा जो बचने की कोशिश करेंगे; लेकिन वह उन सबको मार ही नहीं सकेगा जो मरने का भय छोड़ कर, उसकी आंखों-में-आंखें डाले सकेंगे ! … फिल्मी डायलॉग है : जो डर गया वो मर गया; गांधी कहते हैं : करो या मरो !
कायर सवाल पूछते ही रहते थे : ऐसा हो सकता है क्या ? सामने से आती मौत की तरफ कैसे देखता रह सकता है कोई ? गांधी कैसी अविश्वसनीय-अव्यवहारिक बात कह रहे हैं ! 7 अप्रैल 2026 के बाद कोई ऐसा नहीं कह सकेगा. ईरान की बहादुर जनता ने विनाश के समक्ष आत्मबल का सर्जन करने की गांधी की कल्पना के समर्थन में अपना वोट दे दिया है. जो कल तक अहिंसक कल्पना थी, आज हकीकत बन गई है. गांधी कहते हैं : छिप कर भी मारे जाओगे लेकिन उस मौत में से असहायता व कायरता निकलेगी; मौत की आंखों में आंखें डाल कर मरोगे तो उसमें से चरम वीरता निकलेगी जो मारने वालों को असहाय व व्यर्थ बना देगी.
युद्ध, हिंसा,विनाश और शत्रुता के खिलाफ जो सदा ही अपनी आवाज़ बुलंद करता रहा; मानव-मन में गहरी पैठी हिंसा व प्रतिशोध की भावना की जड़ें अहर्निश काटता रहा; जो इन सबके विरुद्ध आज तक मनुष्य द्वारा उठाई सबसे अटूट, सशक्त व सक्रिय आवाज है, उस गांधी के लिए युद्ध, हिंसा, प्रतिशोध अजनबी नहीं थे. वह युद्ध के मोर्चे पर फौजी अधिकारी बन कर उतरा था; दो-दो विश्वयुद्ध की विभीषिका उसने देखी व झेली थी; उसने अपने मुल्क की नवजात आजादी पर पड़ोसी का फौजी हमला देखा था और उससे युद्ध करने वाली फौज को आशीर्वाद भी दिया था; अपनी हत्या के पांच प्रयासों के बावजूद बगैर किसी कड़वाहट के उसने मानवीय अाजादी व गरिमा का अपना अभियान जारी रखा था; जैसा सांप्रदायिक उन्माद संसार ने पहले देखा नहीं था वैसे सांप्रदायिक उन्माद में पांव-पांव लगातार भटकता रहा था वह; सांप्रदायिक हिंसा के कई थपेड़े उसने झेले थे और फिर उसी सांप्रदायिक आग में जल कर वह भस्म हुआ था. तो हम कह सकते हैं कि गांधी ने युद्ध के खिलाफ तमाम उम्र युद्ध ही लड़ा ! आज ईरान ने कहा है : हर युद्ध के अंत में बचते हैं गांधी ही, क्योंकि वे हिंसा, घृणा व प्रतिशोध के सामने कभी सर नहीं झुकाते हैं.
(11.04.2026)
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