
कुमार प्रशांत
सब तरफ़ तालियां हैं, शोर है, वाहवाही है कि हमारा सर्वोच्च न्यायालय दो सार्वजनिक, खुलेआम किए जा रहे बलात्कार के सामने आ खड़ा हुआ ! अब न कोई उन्नाव की पीड़िता को हाथ लगा सकता है, न अरावली की पर्वतश्रृंखला को बम लगा कर उड़ा सकता है. इसे कहते हैं संविधानसज्जित न्यायपालिका की हैसियत ! सभी की तालियां सभी के साथ शामिल हैं. इसी बहाने हम देख रहे हैं कि गोबरगणेश गोस्वामियों की उंगलियां भी उठने लगी हैं और सारे ज्ञानी ऐसे मौकापरस्तों के इशारों का अर्थ खोजने में व्यस्त हैं.
हमारे सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी सबकी सारी तालियां कबूल करते हुए, बड़ी बारीकी से अपनी सारी व्यवस्था का बचाव कर लिया कि हमारे जज सर्वश्रेष्ठ हैं लेकिन हैं तो इंसान ही न, सो गलती हो जाती है. बस, बात रफादफा हो गई. कोई यह याद नहीं कर रहा है कि उन्नाव की बलात्कार पीड़िता के फिर से सार्वजनिक बलात्कार की संभावना पैदा ही तब हुई जब हमारे सर्वश्रेष्ठ जजों ने इस मामले को अौरत से जघन्य बलात्कार और हत्या की नज़र से नहीं, कानूनी मीन-मेख की चतुराई से देखने व जांचने की कोशिश की. हम नहीं जानते हैं कि इसके पीछे किसी तरह का राजनीतिक इशारा था या नहीं लेकिन हम खूब जानते हैं कि यह मामला उस गहरी बीमारी में से पैदा हुआ है जिसमें न्यायपालिका भूल जाती है कि उसकी अपनी मर्यादाएं हैं.
औरत से बलात्कार का अपराध आज देश में जिस सीमा को पार कर रहा है, वह गहरे बीमार व राजनीतिक शह से बौराए समाज का वह दौर है जो न्यायपालिका के बस से बाहर का मामला है. न्यायपालिका को इसका विवेक होना ही चाहिए कि वह आखिरी बिंदु क्या है, जहां उसकी पहुंच नहीं है. हर स्वस्थ व संयमित न्यायपालिका को अपनी इस मर्यादा का अहसास होना चाहिए.
न्यायपालिका की मर्यादा यह है कि वह संविधान से बंधी है; और संविधान की मर्यादा यह है कि वह अपने जीवंत अनुभवों से आगे की बात नहीं कर सकता है. इसलिए जब कभी समाज या सत्ता का ऐसा चेहरा सामने आता है जिसका कोई सीधा प्रतिकार संविधान सुझाता नहीं है तब न्यायपालिका को संविधानसम्मत व्यवस्था दे कर, पीछे हट जाना चाहिए. आखिर कातिल, क्रूर, अमानवीय बलात्कार से गुजरती औरत का न्यायपालिका को क्या अनुभव है ? जब अदालत बलात्कार से गुजरी किसी औरत की सुनवाई करती है, तो औरत एक नये बलात्कार से गुजरने की दारुण पीड़ा से गुजरती है. कुल जमा यही अनुभव है जो बलात्कार के नाम पर न्यायपालिका की स्मृतियों में जमा होता है. लेकिन न्यायपालिका को यह खूब समझना चाहिए कि यह तकनीकी अनुभवों का नहीं, दारुण मानवीय अनुभव, अपमान व असहायता का सवाल है. इसका कोई अनुभव अदालत के पास नहीं है, इसकी कोई जीवंत कल्पना संविधान के पास नहीं है. दोनों जहां आ कर ठिठक जाते हैं वहां से औरत की यह त्रासदी शुरू होती है. इसलिए बलात्कार के किसी भी मामले के संदर्भ में न्यायपालिका की एक ही भूमिका हो सकती है कि वह औरत को संभलने-संयमित होने का पूरा अवकाश दे और तब तक उसके साथ खड़ी रहे जब तक वह अपना आपा न पा ले. यह लोकतांत्रिक सभ्यता है, मानवीय गरिमा है और यह संविधान की मर्यादा भी है.
कुलदीप सिंह सैंगर का मामला बलात्कार, हत्या, राजनीतिक धौंस और अधमतर गुंडागर्दी की ऐसी खिंचड़ी है जो औरत के लिए तिनके का सहारा भी नहीं छोड़ती है. कहानी में पेंच बहुत हो सकते हैं लेकिन जो दृश्य है उसमें कोई पेंच नहीं है. ऐसे मामले को उलटने-पलटने का कोई नैतिक अनुभव न अदालतों के पास है, न संविधान के दायरे में आता है. यह वह मर्यादा है जिसे अदालत व संविधान, दोनों को स्वीकार कर चलना चाहिए. औरत पर यौन हिंसा संविधानसम्मत अंतिम सजा का अंतिम पड़ाव है – पुनर्विचार या कानूनी पेंचीदगियों की यहां गुंजाइश ही नहीं है. यह उन्नाव की पीड़िता के संदर्भ में ही सच नहीं है, अंकिता भंडारियों के संदर्भ में भी सच है यानी हर औरत के संदर्भ में यही सच है. समाज व सत्ता को यह जीवंत अहसास होना चाहिए कि यौनिक हिंसा कानूनी पेंचीदगियों व संवैधानिक मीन-मेख से आगे की बात है. जो इसका अपराधी सिद्ध हुआ, उसे अंतिम सजा मिलेगी ही और उसे वह सजा अंतिम सांस तक भुगतनी पड़ेगी. बलात्कार औरत को उसकी अौकात बताने का अचूक हथियार मानने की मानसिकता वालों को अंतिम तौर पर यह बताना जरूरी हो चला है कि जिसे वे अचूक मानते हैं दरअसल वह दोधारी तलवार है. जिस हथियार से तुम औरत के अस्तित्व के टुकड़े करते हो, उसी हथियार से तुम्हारे अस्तित्व के भी टुकड़े हो जाते हैं. तुम्हें इससे बचाने न संविधान आगे आ सकता है, न न्यायपालिका; क्योंकि यह उस इंसान का मामला है जिसने यह संविधान भी रचा है और यह न्यायपालिका भी बनाई है. समय-समय पर इससे आगे का रास्ता समाज की सामूहिक चेतना में से उभरता रहेगा जिसे न्यायपालिका व संविधान को पहचानना व स्वीकार करना सीखना पड़ेगा. यह आधी आबादी – गांधी के शब्दों में ‘ बेहतर आधी आबादी !’ के लोकतांत्रिक अस्तित्व को अंतिम रूप से स्वीकार करना है.
ऐसी ही स्थिति पर्यावरणविनाश की है. करोड़ों-करोड़ साल पहले से प्रकृति ने संतुलन साधने की अपनी जो व्यवस्थाएं खड़ी की हैं फिर चाहे वह अरावली श्रृंखला हो कि नदियों की अपनी बुनावट हो कि हिमालय की नवजात पर्वतमाला हो कि अंदमान-निकोबार के जंगल आदि हों, इनके साथ बलात्कार करने की मर्यादा कोई अदालत कैसे तय कर सकती है ? क्या अनुभव है उसके पास कि जिसे वह अपने फैसले का आधार बना सकती है ? ये सारी पर्यावरणीय व्यवस्थाएं मनुष्य के अस्तित्व से पहले से बनी हुई हैं; ये जीवंत हैं, सक्रिय हैं और प्राणिमात्र का संरक्षण-संवर्धन करती आ रही हैं. संविधान में इनके प्रति कोई निश्चित नजरिया हमें नहीं मिलता है, क्योंकि संविधान तो अभी-अभी पैदा हुआ है. इस पर्यावरणीय व्यवस्था में वह अपनी जगह भी और अपना संदर्भ भी तलाशने में लगा हुआ है जैसे कोई शिशु अपनी मां की गोद में अपनी जगह बनाने में लगा रहता है.
फिर कैसे कोई अदालत यह फैसला कर गुजरती है कि अरावली पर्वतश्रृंखला पर 100 मीटर की मर्यादा लादी जाए ? और फिर सामाजिक दवाब के बाद, वह अपने ही फैसले पर रोक भी लगाती है कि अभी इस मामले में ज्यादा विमर्श की जरूरत है. किससे विमर्श करेंगे आप श्रीमान ? जिसकी 100 मीटर की सिफारिश आपने क़बूल कर ली थी, वह कौन था ? वह सत्ता की सिफारिश थी- वही सत्ता जो सर्वभक्षी है. सारी दुनिया में यह सब कुछ लीलती जा रही है. श्रीमान, यह आपको भी और आपको जिसे संरक्षित करना है उस संविधान को भी लीलती जा रही है. क्या यह आपको दिखाई नहीं दे रहा है कि हमारा पर्यावरण हर कहीं, हर जगह तार-तार हुआ जा रहा है. सत्ताकेंद्रित विकास वह अंतरराष्ट्रीय राक्षस बन गया है जिसे हर दिन मूल्यों-मर्यादाओं, संविधान-लोकतंत्र का निवाला न मिले तो वह जी नहीं सकता है. आखिर क्यों दुनिया भर की सड़कों पर लोग उतर आए हैं और उनकी बनाई सत्ता ही लाठी-बंदूक से उन्हें कुचलने पर आमादा है ? लोगों व लोगों की बनाई सत्ता के बीच यह कैसी रस्साकशी है ? यह सर्वभक्षी सत्ता से अपने समाज को बचाने की लड़ाई चल रही है जिसे आप पहचान नहीं पा रहे हैं श्रीमान !
आपकी परेशानी हम समझते हैं. आपके पास ऐसा कोई जीवंत अनुभव कोष नहीं है कि जिसमें उतर कर आप इस रस्साकशी का असली मतलब जान-पहचान सकें. आप भी विकास की उसी शब्दावली के मारे हैं जिसकी मार से दुनिया बेहाल है. इसलिए तो अदालतें यह कहती मिलती हैं कि हम सारा विकास ठप्प तो नहीं कर दे सकते ? किसका विकास और किसकी कीमत पर विकास, इसका जवाब अदालत से कभी नहीं मिलता है, क्योंकि उसके पास भी विकास की पूरी अवधारणा, सत्ता की छलनी से छन कर ही पहुंचती है.
पर्यावरण की लड़ाई आज सारे संसार में स्वायत्त समाज के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई में बदल गई है. इसे पहचानने के लिए श्रीमान ज्यादा द्राविड़ी प्राणायाम करने की जरूरत नहीं है, अपने ही गांधी को उलटने-पलटने की मेहनत करने की जरूरत है. बहुत पीछे हम न भी जाएं तो 1920 से वे लगातार विकास के इस राक्षस से सीधी लड़ाई में लगे मिलते हैं. वे देश की राजनीतिक आजादी के लिए प्राणपन से जूझते हुए भी, मनुष्य की स्वायत्त जिंदगी की लड़ाई को कमजोर पड़ने नहीं देते हैं. जिस बात को समझने व कहने की हिकमत व हिम्मत आप नहीं दिखा पा रहे, निहत्थे व गुलाम देश की आजादी की लड़ाई लड़ते हुए इस आदमी ने कही और इस तरह कही कि उसका कहा वक्त की सलीब पर आज भी दीपता है : “ आप देखते हैं कि ये राष्ट्र ( यूरोप व अमरीका) संसार की तथाकथित कमजोर व असंगठित जातियों का शोषण करने में समर्थ हैं… मैं साफ शब्दों में अपना यह विश्वास जाहिर कर देना चाहता हूं कि बड़े पैमाने पर माल तैयार करने का पागलपन ही आज के विश्व-संकट के लिए जिम्मेदार है. उद्योग (आप इसे ‘विकास’ पढ़ें ! ) मानव-जाति के लिए अभिशाप बन जाने वाला है. उद्योगवाद (आज का विकासवाद ! ) सर्वथा इस बात पर निर्भर है कि आपमें शोषण करने की कितनी शक्ति है; विदेशी मंडियां आपके लिए कहां तक खुली हैं और प्रतिस्पर्धियों का कितना अभाव है. चूंकि इंग्लैंड के लिए ये बातें दिनोंदिन कम हो रही हैं, इसलिए उनके यहां बेकारों की संख्या रोज बढ़ रही है. जब इंग्लैंड की यह हालत है तो भारत जैसे विशाल देश को तो उद्योगीकरण से लाभ होने की आशा की ही नहीं जा सकती. सच तो यह है कि भारत जब दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने लगेगा – और उसके यहां उद्योगीकरण हो गया तो वह जरूर शोषण करेगा – तब वह अन्य राष्ट्रों के लिए शाप व संसार के लिए खतरा बन जाएगा. तब दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने के लिए भारत में कल-कारखाने बढ़ाने का मैं क्यों विचार करूं ? क्या आप यह करुण स्थिति नहीं देख रहे कि हम अपने 30 करोड़ बेकारों के लिए काम जुटा सकते हैं परंतु इंग्लैंड अपने 30 लाख के लिए कोई काम मुहैया नहीं कर सकता; और उसके सामने ऐसी समस्या खड़ी है जिसके अागे इंग्लैंड के बड़े-से-बड़े बुद्धिमान चक्कर खा रहे हैं. उद्योगवाद का भविष्य अंधकारमय है. अमरीका, जापान, फ्रांस अौर जर्मनी इंग्लैंड के सफल प्रतिस्पर्धी हैं. भारत की मुट्ठी भर मिलें भी उनकी प्रतिद्वंद्वी हैं; और जैसे भारत में जागृति हो गई है, वैसे ही दक्षिण अफ्रीका में भी होगी, और वहां तो प्राकृतिक, खनिज और मानवीय साधन भी कहीं अधिक विपुल हैं. अफ्रीका की बलवान जातियों के सामने जबरदस्त अंग्रेज बिल्कुल पिद्दी दिखाई देते हैं. औप कहेंगे कि अंत में तो वे जंगली ही हैं ! वे भले हैं, जंगली नहीं; और शायद कुछ ही साल में पश्चिमी राष्ट्रों को अफ्रीका में अपने माल का सस्ता बाजार मिलना बंद हो सकता है. यदि उद्योगवाद का भविष्य पश्चिम के लिए अंधकारमय है, तो क्या भारत के लिए वह और भी अंधकारमय नहीं होगा ?”
12 नवंबर 1931 को ‘यंग इंडिया’ में यह सब लिखने से पहले भी, कई-कई बार वे ऐसी चुनौती उछालते मिलते हैं. 3 नवंबर 1921 को वे ‘यंग इंडिया’ में सवाल खड़ा करते हैं : “यदि संयोग से कोई एक आदमी अपने किसी यांत्रिक आविष्कार द्वारा भारत की सारी भूमि जोत सके और खेती की तमाम पैदावार पर नियंत्रण कर ले, और यदि करोड़ों लोगों के पास कोई और धंधा न हो, तो वे सब भूखों मरेंगे और निकम्मे हो जाने के कारण जड़ बन जाएंगे, जैसे कि आज भी बहुत लोग बन गए हैं … मैं जानता हूं कि विद्युत-शक्ति से चलने वाले तकुए जारी कर के, हाथ से कातने वालों को हटा देना जुर्म है.”
वे आंखों-में-आंखें डालकर उस दौर में भी हर आरोप का जवाब देते हैं : “मुझे आपत्ति स्वयं मशीनों पर नहीं बल्कि उनके लिए पागल बनने पर है. यह पागलपन श्रम बचाने वाले यंत्रों के लिए है … यहां तक कि हजारों लोगों को बेकार कर के, भूख से मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. मैं भी समय और श्रम बचाना चाहता हूं मगर मानव-समाज के एक अंश के लिए नहीं, बल्कि सबके लिए; मैं भी धन इकट्ठा करना चाहता हूं मगर थोड़े से आदमियों के हाथों में नहीं, बल्कि सबके हाथों में. आज तो मशीनें मुट्ठी भर लोगों को करोड़ों की पीठ पर सवार होने में मदद करती हैं. इन सबके पीछे प्रेरक शक्ति श्रम बचाने की उदात्त भावना नहीं, बल्कि लोभ है. मैं इस प्रकार की व्यवस्था के विरुद्ध अपनी सारी शक्ति लगा कर लड़ रहा हूं … मैं थोक उत्पादन की कल्पना जरूर करता हूं मगर उसका आधार मनुष्य का हनन नहीं होगा. आखिर चरखे का संदेश तो यही है ! यह थोक उत्पादन ही है परंतु लोगों के अपने घरों में है. यदि आप व्यक्तिगत उत्पादन को लाखों गुना बढ़ा दें तो क्या वह विशाल पैमाने पर थोक उत्पादन नहीं हो जाएगा ? … चरखा-संघ ने सफलतापूर्वक दिखा दिया है कि देहातों में भारत की जरूरत का सारा कपड़ा तैयार किया जा सकता है और इसके लिए राष्ट्र का केवल अवकाश का समय ही कताई और उसके बाद की क्रियाओं में लगाना पड़ेगा. हमें इस बात पर सारी शक्ति केंद्रित करनी होगी कि गांव स्वाश्रयी बनें और माल मुख्यतः: अपने उपयोग के लिए ही तैयार करें … मुझे विशेषाधिकार और एकाधिकार से घृणा है. मेरे लिए वह चीज निषिद्ध है जिसमें सबका हिस्सा न हो.”
यह गांधी उन्नाव की पीड़िता के साथ खड़ा होता है, क्योंकि शक्ति का एकाधिकार पुरुषों के लिए संरक्षित है; यह गांधी अरावली के साथ खड़ा होता है, क्योंकि यह विकास पूंजी के साथ ही कदमताल करता है. इसलिए जरूरी है कि लोग, समाज, संविधान, न्यायपालिका सभी गांधी के साथ खड़ी हों और कहें कि हमें वह विकास चाहिए ही नहीं जो विशेषाधिकार व एकाधिकार के बिना पंगु है, लंगड़ा व गूंगा है. यह नई लक्ष्मण-रेखा है जो कहती है कि किसी बलात्कारपीड़िता की छाया भी छूने की कोशिश न करना फिर चाहे व औरत हो कि पर्यावरण.
(07.01.2026)
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