दो लघु कविताएं ।

मनीष शियाल
14-04-2021

१ दो कोड़ी के दाम ।

यह अवाम
अब बीक रही हैं;
दो कोड़ी के दाम।
वे ‘कठपुतलियांसी’ नाच रही है ।
उसकी न अब कोई दरकार।
क्योंकि
खरीदार है; सरकार।

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२ हम लोगों को ।

मैंने कई बार
सत्य का गला घोंटते देखा है;
‘हमारी ही गलियों मोहल्ले में;
स्त्री, दलितों, और नोकरो को पीट ते हुऐं’
और
हम लोगों को
आदत सी हो गई है,
आंखों पर पर्दा डालकर
झूठ चुनने की ।

48 Chamudanagar Main Road, UNCHA KOTDA Ta : Mahuva, Dist: Bhavnagar, Gujarat

Category :- Poetry